राजेश भंडारी की एक मालवी कविता - अपनी माटी Apni Maati

Indian's Leading Hindi E-Magazine भारत में हिंदी की प्रसिद्द ई-पत्रिका ('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

राजेश भंडारी की एक मालवी कविता

 (इस कविता के ज़रिए भले ही राजेश जी ने अपनी बात कही है मगर ये बात पाठक साथियों,आपको कितनी सच लगती है..अगर ये सच भी है तो क्या उन्हें अपनी रुचियाँ पूरने का हक नहीं है.जिस देश में सब व्यस्त  हैं  अपने घर बनाने में तो भला उस मस्त मौला खेतिहर-किसान जात के लोगों को कभी तो हाट-बाज़ार का आनंद लेने दे हम-आपकी प्रतिक्रियाओं के इंतज़ार में हम और ये कविता भी -सम्पादक )

अन बाटक्या के बाट्की मिली गी तो पानी पि पि के मरे 

हाट  करने अनाज की पोटली माथा पे ली के जाता 
एक हाथ में तेल को डब्बोंए दूसरा हाथ में  छाता
चार  आना की जलेबी ली के बाट पे  बठी के खाता
अब तो पन्दरा लाख की गाड़ी में मॉल से खरीदी करे 
अन बाटक्या के बाट्की मिली गी तो पानी पि पि के मरे 

नि मिलतो थो  कदी साबू सोडो एअबे शेम्पू से नाहवे 
देक्वा में मुंडो हे  तवा को पेन्दोए खूब पावडर लगावे 
अरे कई गधा  के न्ह्वावावा से कई घोडा को काम करे 
अन बाटक्या के बाट्की मिली गी तो पानी पि पि के मरे 

पेला पेरता था लठ्ठा की धोती ने पाव में चमारी जूती
पोप्लिन को कमीज पेरता ने अन्दर होती बंडी  सूती 
अब तो पिट्टर इंग्लेंड ने रीबोक से निचे पाव नि धरे 
अन बाटक्या के बाट्की मिली गी तो पानी पि पि के मरे 

रोज सवेरे बक्खर ली के खेत जोतवा जाता 
माथा पे चारा को भारो रोज उठाई के लाता
अब तो सगळा का सगळा साब  हुइग्या 
आई  को लोट्यो आई नि धरे 
अन बाटक्या के बाट्की मिली गी तो पानी पि पि के मरे 


  राजेश भंडारी 'बाबू' १०४,
 महावीर नगर ,इंदौर   फ़ोन ९००९५०२७३४

1 टिप्पणी:

मुलाक़ात विद माणिक


ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here