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राजस्थानी मांडने और शादी-ब्याह में ब्याणजी-ब्याईजी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on मंगलवार, मई 03, 2011 | मंगलवार, मई 03, 2011

नमस्कार पाठक साथियों ,आज हमने हमारे साथी सत्यनारायण जोशी के सहयोग से उदयपुर के रेल्वे स्टेशन पर बनी हुई कुछ चित्रकारियाँ छायाचित्रों के रूप में यहाँ पोस्ट कर रहे हैं.माफ़ करें बनाने वाले के बारे में कोई जानकारी नहीं है.इसी पोस्ट में साथ ही यहाँ कुछ और चित्र भी हैं.मेवाड़ में शादी-ब्याह के अवसर घरों के बाहर ब्याणजी और ब्याईजी बनाने का रिवाज़ है. चित्तौड़ के एक मकान के बाहर दीवार पर बने कुछ चित्र आपके साथ साझा कर रहे हैं.,जो सत्यनारायण जोशी और उनके बेटे दिलीप कुमार ने बनाए हैं.ये काम वे बरसों से करते आ रहे हैं. शहर में  मात्र वे ही ऐसे कलाकार हैं जो सपरिवार ये काम करते हैं.-सम्पादक 

पहले मांडने





अब दूजी कलाकारी 




संयोजन:-माणिक
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1 टिप्पणी:

  1. भूली बिसरी यादे हो गये ये मांडने और फड़ पेंटिंग. पहले बिना इन हाथी घोडो,ब्याईजी,ब्यानजी के बिना शादियाँ अधूरी होती थी.घरों के बाहर बने ये चित्र दूर से बता देते थे कि इस घर में शादी हुई है.रंगों का पुरानापन शादी के महीनों की गिनती भी बता देता थे.
    मजा आ गया आज यहाँ सब देख कर .मेरे स्कूल में मैं बच्चों को गेरू,खड़ी से मांडने बनाने सिखाती हूँ.जिससे ये कला जीवित रहे.

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