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दिलीप भाटिया की छ: लघु कथाएँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, जून 12, 2011 | रविवार, जून 12, 2011

1 =मनीआर्डर

रमेश बेटे,
आशीष, कल तेरा कार्ड मिला। पोस्टमेन बता रहा था कि आजकल मां के लिए भी मई का दूसरा रविवार निश्चित है, जिसका कार्ड तुमने भेजा है। बेटे, मेरे पास तो तुम्हारे लिए हर दिन हर रात पूरा जीवन ही रहा, तुम्हारे पास मेरे लिए वर्ष में एक दिन है। मैं कार्ड का क्या करूंगी? इस पचास रूपए के खूबसूरत कार्ड के स्थान पर तुम मनीआर्डर भेजते, तो मैं पिछले महीने का बनिए का उधार तो चुका देती। अगले साल कार्ड मत भेजना। हो सके, तो मनीआर्डर भेज दिया करो। बहूरानी की सहमति हो तो।
तुम्हारी - एक दिन की अम्मा

2 =शगुन

सुजाता दीदी,
प्रणाम, मेरी प्राइवेट नौकरी है, वेतन बहुत कम है, आपकी बेटी की शादी में मायरा लेकर आना तो आवश्यक है, पर मैं यहां दक्षिण भारत से 1000 किलोमीटर दूर आऊं, तो सारा पैसा तो किराए में ही खर्च हो जाएगा। फिर मायरे का शगुन कैसे करूंगा? इसलिए, मैं नही आ पा रहा हूँ। शगुन का चेक भेज रहा हूँ। मनीषा को बधाई, जीजाजी से प्रणाम-
बेबस भाई - रोहित

3 =बेवकूफ

सरला,
हाय! तेरे बेटे की शादी में आ रही हूँ। गांव के सरकारी स्कूल में नौकरी करने का यही तो लाभ है। छुट्टी की कहां आवश्यकता है? हमने दो-दो दिन की शिफ्ट लगा रखी हैं। निरीक्षण वाले आते हैं, तो छुट्टी का प्रार्थना पत्र दिखा देते हैं, वरना आने पर रजिस्टर में साइन कर देते हैं। हाँ सुन , स्कूल में कल एक रिटायर्ड अंकल आए थे। फ्री में बच्चों को पढ़ाने को तैयार थे। हमारे हेडमास्टर ने स्पष्ट मना कर दिया, ‘‘पूरे वेतन वाली मास्टरनी तो पढ़ा नहीं पाती हैं, आधे बच्चे फेल हो रहे हैं, आप फ्री में क्या पढ़ाओगे?‘‘ बेचारे अंकल उदास हो कर चले गए। बाद में हम सब हंसती रहीं , कैसा बेवकूफ! है। फ्री में पढ़ाएगा, हमें नीचा दिखाएगा क्या? खैर शादी में मिलते हैं। ओके, बॉय।
तेरी सहेली - पुष्पा

४= एक उत्सव दो दृश्य

बंधु शंकरलाल जी,
नमस्कार। जीवन की शाम में तुम्हारा बधाई पत्र मिला, धन्यवाद। तुमने पिछले जन्म दिन की यादों को पत्र में लिखा है। भाई, पिछले साल का उत्सव, पार्टी, उपहार, फूल, पाठ इत्यादि तो इसलिए थे कि अगले दिन पे कमीशन के एरियर मिलने के लिए फार्म पर मेरे हस्ताक्षर की आवश्यकता थी। इस बार तो पता ही नहीं चला, जन्म दिन आया चला गया, वही आठ बजे चाय, दोपहर में सब्जी के साथ दो सूखी रोटी, शाम को तो ये लोग बाहर ही खाते हैं। सुबह की बची सब्जी या फिर खिचड़ी। इस बार तो जन्म दिन पर एक टुकड़ा मिठाई भी चखने को नहीं मिली। खैर, अब पे कमीशन तो दस पन्द्रह साल में आते हैं। अगले पे कमीशन तक तो शायद ऊपर वाला रिटर्न टिकिट भिजवा ही देगा। हाल पूछते देते रहना, यही एक सहारा हैं।
मित्र - जीवन प्रकाश

५= दूसरी पोती

अम्माजी,
प्रणाम। कल आपके लिए दूसरी पोती आई है। बुरा लग गया ना? क्षमा करना, मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर पाई। कन्या भ्रूण हत्या का पाप मैं नहीं लेना चाहती थी। मैं तो अपनी दोनों बेटियों केा खूब पढ़ा लिखा कर अच्छी इन्सान बनाऊंगी। मेरे बी.एड. करने पर भी आप मुझे नौकरी करने नहीं दे रही हैं। इनकी प्राइवेट नौकरी से बेटियों को रोटी खिला दूं, वही बहुत है। दूध फल तो सपना हैं, खैर सुनिए हम छोटी सी पार्टी दे रहे हैं, अगले सप्ताह सोमवार को। आप आशीर्वाद देने आऐंगी तो अच्छा लगेगा। दिल बड़ा कीजिए, अम्माजी। पोतियों को दादी का प्यार मिलेगा, तो सभी को अच्छा लगेगा, आऐंगी ना? प्रतीक्षा में 
आपकी बहू - मंजूषा


6= लीक से हटकर

सखी सुजाता,
पापा नहीं रहे। तुम्हारा फोन आया था, पर मैं क्या कहती ? इन तेरह दिनांे की कहानी कैसे लिखूं ? मम्मी छः वर्ष पूर्व ही चली गई थीं, भाई वहन हैं नहीं, सब कुछ मुझे ही तो करना था। पापा की इच्छानुसार आई बैंक को फोन कर नेत्र दान करवाया। दाह संस्कार वाले रूढ़िवादी पंडित से बहुत उलझना लड़ना पड़ा तब मैं पापा को अंतिम मुखाग्नि दे पाई। शव यात्रा प्रारम्भ होने से पूर्व घर पर अंतिम दर्शन के लिए स्कूलों के सैंकड़ों बेटे बेटियों ने पापा के शव पर फूल चढ़ाकर श्रद्धांजली दी। श्मशान स्थल पर बडों से अधिक बच्चे थे, पास  के बालिका स्कूल की 400 बेटियां तो थी हीं। रिश्तेदार खोखले आश्वासन देते रहे। जिन बेटियों की पापा ने तन मन धन से सहायता की थी, वे ही मेरे आंसू पोछने एवं एवं एक-दो रोटी खिलाने के लिए आती रहीं। यहां के सभी स्कूलों में शोक सभाऐं हुईं। ब्राह्मण भोजन की रूढ़िवादी परम्परा को तोड़कर जब तेरहवीं पर मैं बालिका स्कूल की 400 बेटियों के लिए डेªस का कपडा ले कर गई तो कई बेटियां कपड़ा लेते समय फूट-फूट कर रो रहीं थीं। पापा की आत्मा को सच्ची श्रद्धांजली देने हेतु हर पुण्य तिथि पर स्कूल की बेटियों के लिए पत्रं पुष्पं करती रहूंगी। उनके अप्रकाशित लेखों की पुस्तक प्रकाशित करवानी है। तुम्हें एक प्रति भेजूंगी। यही छोटी सी कथा है इन तेरह दिनांे की। पापा के जीवन का मूल मंत्र था ‘‘लीक पर वे चलें, जिनके चरण दुर्बल और हारे हैं। हमें तो जो हमारी यात्रा में बने, ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं।’’ अब लिखा नहीं जा रहा है, शेष फिर-

सहेली ममता




दिलीप भाटिया
7 घ 12, जवाहर नगर
जयपुर- 302004 (राजस्थान)
मोबाइल- 09461591498



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