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डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध:-'रहम कीजिए सार्वजनिक उद्यानों पर'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जून 15, 2011 | बुधवार, जून 15, 2011


 तेज़ी से बढ़ते हुए शहरीकरण और यांत्रिकता के प्रभाव के बावजूद मानव का प्रकृति से पूरी तरह संबंध विच्छेद शायद कभी सम्भव नहीं है।   प्रकृति का साहचर्य आज भी मानव को ताज़गी देता है। वह उसे उन तनावों व दबावों से मुक्ति दिलाता है जो आज जीने की एक आवश्यक शर्त होते जा रहे हैं। किसी हरे भरे लॉन का विस्तार उसकी आंखों को ठंडक पहुंचाता है जबकि रंग-बिरंगे फूलों व नानाकार प्रकार  का सौन्दर्य, बदलती हुई ऋतुओं में विभिन्न वृक्षों पर खिलने वाले फूलों की गंध और कुंजों में चहचहाते-कूकते पक्षियों के स्वर उसके मन में आज भी जीवन को एक नयी उमंग से भर देते हैं। प्रकृति के साथ गोद शब्द का प्रयोग इसीलिए सार्थक लगता है कि उसमें गोद की ही भांति दुलराने तथा आराम व सांत्वना देने की क्षमता है। मां की गोद जैसे बच्चे को शारीरिक व मानसिक पोषण देती है उसी तरह प्रकृति की गोद भी मानव के लिए हर हाल में स्वास्थ्यवर्द्धक साबित होती है।

                         पर सभ्यता का विकास मनुष्य को प्रकृति से दूर ले जाता है। प्रकृति पर विजय का अभियान मानव को कृत्रिमता, असहजता और यांत्रिकता की दुनिया की ओर ले चलता है जहां वह प्रकृति-निर्मित वस्तुओं की जगह मानव -निर्मित वस्तुओं से घिरता जाता है। धूल, धुएं और शोर की यह दुनिया मनुष्य से अधिकाधिक स्पर्द्धा और भौतिक समृद्धि की मांग करती है जिसकी अंधी दौड़ में उसकी उन तमाम शक्तियों व क्षमताओं का ह्रास होता जाता है जो प्रकृति ने उसे उपहार में दी थी।

                         इसी तनाव भरे कृत्रिम जीवन से मुक्ति के लिए मानव एक बार पुनः प्रकृति की ओर लौटता है। प्रकृति के साहचर्य के लिए वह वनों, पर्वतों, नदियों या समुद्र-तट की ओर जाता है या फिर वह प्रकृति को ही अपने निकट लाने का प्रयास करता है। उसके मकान के आगे यदि थोड़ी खुली जगह हुई तो वह उसमें हरी दूब लगाता है और उसके आसपास फूलों की चार क्यारियां बनाता है। शहरों में ज़मीन की कमी के कारण वह यदि यह भी न कर पाए तो गमले में क्रोटन लगा कर अथवा बोन्साई से विशालकाय वृक्षों और वनों का भ्रम पैदा करके या कांच के किसी छोटे से एक्वेरियम में कुछ रंग-बिरंगी मछलियां रख कर वह फिर से किसी तरह   प्रकृति का साहचर्य पाने का प्रयास करता है।

                         सार्वजनिक उद्यान भी मनुष्य की प्रकृति के साहचर्य की इसी स्वाभाविक इच्छा का प्रतिफल हैं। मनुष्य को प्रकृति से काटने वाली सभ्यता के बीच वे जैसे इन दोनों को जोड़े रखने के लिए बनाए गये पुल हैं। तेज़ी से बढ़ती आबादी और ज़मीन को लीलती मानव निर्मितियों के बीच उन्हें मनुष्य ने जैसे प्रकृति के अभयारण्यों के रूप में सुरक्षित रख छोड़ा है। उन्हें प्रकृति और मानव के बीच की आवश्यक कड़ी मान कर ही शायद उनके लिए किसी भी नगर की तमाम आवासीय योजनाओं में थोड़ा-बहुत स्थान छोड़ना ज़रूरी समझा जाता रहा है।
                         पर उद्यान प्रकृति का उन्मुक्त, स्वाभाविक वन्य रूप नहीं है। वे उसका पालित और नियंत्रित रूप हैं। उद्यानों में प्रकृति को मानव अपनी आवश्यकतानुसार रखता है और उसे वहां बनाए रखने के लिए उसे स्वयं उसकी देखभाल करनी होती है। उद्यानों में प्रकृति का निवास-स्थान व स्वरूप किसी पालतू जानवर की तरह पूर्व-निर्धारित व नियोजित होता है। प्रकृति को पालतू बनाने के लिए उद्यान में माली पेड़-पौधों के विकास को उसी तरह नियंत्रित करके रखता है जिस तरह कोई पशु-पालक अपने पालतू पशुओं के स्वभाव और हरकतों को अपनी इच्छानुसार व आवश्यकतानुसार नियंत्रित करके रखता है।

शहरों के बीच मानव द्वारा कृत्रिम रूप से स्थापित प्रकृति के इन द्वीपों का शहर  हमेशा किसी न किसी बहाने अतिक्रमण करने की कोशिश में रहता है। सार्वजनिक उद्यानों में चिड़ियाघरों के प्रवेश को शहरी सभ्यता और उसके मूल्यों द्वारा प्रकृति के इस पुनरातिक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिए। उद्यानों के बीच चिड़ियाघर बनाने वालों का सोच तो शायद यह रहा होगा कि वे वन्य प्रकृति में पाए जाने वाले  पशुओं को भी पालतू बना कर इस पालतू प्रकृति का हिस्सा बना रहे हैं पर चिड़ियाघरों के साथ वस्तुतः प्राणियों के प्रति निर्दयता ने भी उद्यानों में प्रवेश किया जिसे केवल वही देख पाया जिसके मन में पशुओं के लिए सच्ची हमदर्दी थी। उदाहरण के लिए उसे कवि विलियम ब्लेक ने देखा जिसने कहाः
                   
                           अ रोबिन रेडब्रेस्ट इन अ केज
                           पुट्स ऑल हेवन इन अ रेज
  
                         (पिंजड़े में बंद बना रखी ललमुनिया
                       क्रोध से भर देती है सारी स्वर्ग की दुनिया)

                         दुर्लभ और विचित्र के नाम पर पशु-पक्षियों के साथ ही अजायबघर ने भी सार्वजनिक उद्यानों में प्रवेश किया और फिर फु़र्सत और मनोरंजन के बहाने कहीं- कहीं वाचनालय, चित्र-वीथियां या थिएटर भी इनमें घुस आए। जैसे-जैसे शहरी सभ्यता के इन प्रतीकों का उद्यानों में प्रवेश होता गया वैसे-वैसे ही प्रकृति को उद्यानों में उनके लिए स्थान खाली करना पड़ा। बाल मनोरंजन के नाम पर कई मशीनों ने भी उद्यानों में अपने लिए जगह बना ली। पहले वे बच्चों के साधारण खेलों के नाम पर वहां आईं पर उद्यान यदि थोड़ा बड़ा हुआ तो आगे चल कर उन्होंने छोटी रेलगाड़ी तक का रूप ले लिया। उद्यान में किसी रेलगाड़ी के प्रवेश का अर्थ ही रेल्वे लाइन और उसके आसपास की उस तमाम भूमि से, जहां तक कि उसकी सीटी की आवाज़ जाती थी, प्रकृति-प्रदŸा शान्ति का सदैव के लिए निर्वासन था।

उद्यानों के रखवाले यदि सावधान व जागरूक न हुए तो उद्यान में कई बार किसी कीओस्क या रेस्टोरेंट के रूप में उस बाज़ार ने प्रवेश पा लिया जिससे त्राण पाने के लिए इन्सान उद्यान में जाता था। रेस्टोरेन्ट ने उद्यान में प्रवेश करते ही फिर से अपने आसपास गंध, धुआं और गंदगी फैलाना शुरू किया और प्रकृति के लिए एक बार फिर उतना स्थान उसके लिए छोड़ना ज़रूरी हो गया।

                         उद्यान यदि शहर के किसी मुख्य मार्ग के निकट स्थित हुआ तो उसे उस मार्ग पर बहने वाले ट्रेफिक को बराबर किसी मज़बूत फाटक से बंद रखना पड़ा। इस फाटक की सुरक्षा में कोई कमी आते ही उद्यान की भीतरी सड़कों पर भी हल्के दुपहिया और चौपहिया वाहनों की दौड़ शुरू हो गयी। उद्यान के दूसरी ओर भी बदकिस्मती से यदि कोई मुख्य सड़क हुई तब तो समझिए गजब ही हो गया। उद्यान के बीच तब जैसे किसी ने चाकू चला कर उसे दो हिस्सों में बांट दिया। जो पहले कभी एक बंद और सुरक्षित उपवन रहा था वह अब एक सड़क के आसपास हरियाली की सिर्फ़ दो चौड़ी पट्टियों में तब्दील हो गया।

बड़े उद्यानों के स्वामी और निर्माता पहले अक्सर राजे-महाराजे हुआ करते थे जिनके आदेश का उल्लंघन करने की अथवा जिनके अधिकारों कां चुनौती देने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन उद्यानों के रख-रखाव का काम जब नये प्रशासकों के जिम्मे आया तब उनसे प्रेम करने वाले और उनके हितों को सुरक्षित रख सकने वाले लोगों का स्थाई रूप से उनका संरक्षक बने रहना कई कारणों से असंभव हो गया। शहरों की बढ़ती हुई आबादी और लोगों के निजी स्वार्थों के दबाव में सार्वजनिक उद्यान चारों ओर घनी बस्तियों या दुकानों से घिर गये और इस तरह जो स्थान मूलतः व्यक्ति को उन्मुक्तता व स्वतंत्रता का आभास कराने में सक्षम थे वहां शनैः शनैः प्रकृति स्वयं जैसे किसी जेलखाने मे बंद लगने लगी।

                         आवासीय योजनाओं के प्रशासनिक अनुमोदन हेतु आज भी सामान्यतः उनमें किसी सार्वजनिक उद्यान का दिखाया जाना आवश्यक होता है किन्तु आवासीय योजना का यह उद्यान आजकल कई बार महज खानापूरी बन कर रह जाता है। आत्मकेन्द्रितता की वृद्धि और लोकोपकार की भावना के दिनों दिन होते ह्रास के परिणामस्वरूप  इन आवासीय योजनाओं का लाभ उठाने वाले अपने निजी मकानों की परवाह तो कर लेते हैं पर उनमें दिखाए इन सार्वजनिक उद्यानों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता और वे धीरे धीरे उजाड़ भूखण्डों या किसी बहुत बड़े सार्वजनिक घूरे में बदल जाते हैं।

उद्यानों के इस ह्रास के पीछे मुख्यतः क्या कारण ज़िम्मेदार रहे हैं ?अधिकांश सार्वजनिक उद्योगों या संस्थानों की गुणवŸाा का जिस तरह धीरे-धीरे ह्रास हुआ है उसी तरह सार्वजनिक उद्यान भी धीरे-धीरे लोगों की अकर्मण्यता, उपेक्षा और स्वार्थपरता का शिकार होते गये हैं। उनकी स्थिति बहुत कुछ उन नगरवधुओं की सी हो गयी है जिन पर अधिकार तो सभी समझते हैं पर जिन्हें संरक्षण कोई नहीं देता। उन्हें नष्ट करने वाले तमाम तत्वों का प्रभाव उन पर बढ़ता ही जाता है और अंततः वे प्रकृति के मानव निर्मित अभयारण्यों के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान ही खो बैठते हैं।

अनेक अन्य कारणों ने भी हमारे समय में उद्यानों के रखरखाव को कठिन बना दिया है। नलों द्वारा पानी के सार्वजनिक वितरण और उसके आम अपव्यय के कारण अब हर जगह पानी का जो अभाव महसूस किया जाने लगा है उससे सार्वजनिक उद्यानों की हरियाली को बनाये रखना भी मुश्किल होता जा रहा है। किन्तु हरियाली के लिए उद्यानों में उन वृक्षों को जीवित रखना अब भी शायद बहुत मुश्किल नहीं है जिनकी बदौलत उन्हें आज भी उद्यान का नाम दिया जा सकता है।

इस बात को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि हर सुंदर उद्यान के पीछे कहीं न कहीं एक कुशल माली की कल्पनाशीलता की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक प्रतिभासंपन्न माली में किसी पौधे की आत्मा को समझने की जन्मजात और रहस्यमय प्रतिभा होती है। जो माली अपनी सहज अंतर्दृष्टि से पौधे की भूख-प्यास का तथा उसकी खाद, पानी ,धूप और सुरक्षा की ज़रूरतों का अनुमान लगा लेता है उसी माली के हाथों का स्नेहपूर्ण स्पर्श पाकर कोई पौधा तेजी़ से फलता-फूलता है। पौधे के प्रति जन्मजात सहानुभूति और कलात्मक रुझान के सहज संयोग से ही एक कुशल माली बनता है। पर दुर्भाग्य से ऐसे किसी माली की प्रतिभा को हमारी सामान्य नौकरशाही कोई विशेष मान्यता नहीं देती। वह यदि किसी नगरपालिका का कर्मचारी हुआ तो यह संभव है कि उसे किसी दिन बगीचे से हटा कर दमकल पर लगा दिया जाये और वह यदि किसी विद्यालय के उद्यान की देखभाल कर रहा हो तो हो सकता है उसे किसी दिन पौधों के बजाय परीक्षार्थियों को पानी पिलाने का आदेश दे दिया जाए। उसकी विशिष्ट कुशलता की उपेक्षा के फलस्वरूप अब एक प्रतिभासम्पन्न माली भी किसी उद्यान की देखभाल करने के बजाय अध्यापक या कार्यालय कर्मचारी बन जाना ज़्यादा पसंद करता है। मालियों की कुशलता और प्रतिभा को पर्याप्त रूप से पुरस्कृत किए बिना हम उद्यानों के समुचित उद्धार की उम्मीद नहीं कर सकते। 
                         जिन बड़े उद्यानों का रख-रखाव इसी उद्देश्य से बने किसी अलग विभाग को सौंपा गया है वे तो फिर भी व्यक्तिगत स्वार्थों द्वारा किए जाने वाले उनके अतिक्रमण से सुरक्षित हैं ,पर जिन छोटे उद्यानों की देखभाल अन्य स्थानीय संस्थाओं पर निर्भर  है उनकी हालत तो कई बार बाड़ द्वारा खाए जाने वाले खेतों जैसी हो गई है। इनमें से नगरपालिका जैसी कुछ संस्थाएं तो अपने दफ्तर ही इन उद्यानों में ले आई है। कुछ ने इनके बाहरी भागों पर दूकानें बनवा कर उन्हें किराये पर उठा दिया है ताकि उनकी आय में वृद्धि हो जाए। आय में वृद्धि के नाम पर तो इन संस्थाओं को इन उद्यानों के विनाश की जैसे खुली छूट मिल गयी है।

उद्यानों के संबंध में कही गयी उपर्युक्त बातों के उदाहरण ढूंढने के लिए हमें बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। राजस्थान के अधिकांश शहरों और कस्बों में हमें ये उदाहरण आसानी से मिल जायेंगे। जयपुर का रामनिवास बाग़ हो या कोटा की किसी आवासीय योजना के अंतर्गत बना कोई बाग़, चित्तौड़ का नेहरू बाल उद्यान हो या नाथद्वारा का गांधी पार्क - पिछले वर्षों में सभी उद्यानों का प्राकृतिक सौन्दर्य गम्भीर रूप से प्रभावित हुआ है। हमारे अधिकतर उद्यान अब हमें किसी प्रकृति की गोद का अहसास करवाने के बजाय केवल शोभा बढ़ाने वाली कृत्रिम निर्मितियों में बदलते जा रहे हैं। यांत्रिक उत्पादनों की खपत के लिए नित्य नये बाज़ार ढूंढने की चेष्टा में लगी औद्योगिक सभ्यता का प्रभाव अब इन पर भी  स्पष्ट देखा जा सकता है। चमकीले रंगों के इस्तेमाल या सजावटी रोशनियों से उद्यानों की मूल आत्मा के ह्रास को छिपाया नहीं जा सकता। जो लोग प्रकृति को और उद्यानों को अब भी प्यार करते हैं उनके लिए उस छù को पहचानना और तोड़ना ज़रूरी है जिसकी आड़ में स्वार्थी तत्व आज उन्हें नष्ट करने पर तुले हैं।




डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय,नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से दिसंबर ,1991 में 'रचनाकाल ' में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )
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