छायाचित्र:-नागार्जुन की कविता नुक्कड़ पर आ, तन गयी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

छायाचित्र:-नागार्जुन की कविता नुक्कड़ पर आ, तन गयी

बाबा की कविताओं को लेकर सीधे जनता के बीच जाना है और बारिश है कि होड़ लिए हुए है

जनकवि कृष्ण कुमार निर्मोही 


पावना में अपनी बात कहते हुए जसम कार्यकर्ता 
 अकाल और उसके बाद
कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त

दाने आए घर के अंदर कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौए ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद


बादल को घिरते देखा है


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,

बादल को घिरते देखा है।

पावना में लोग सड़क पर सुनते  हुए 
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से -आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
खेत मजदूर नेता सिद्धनाथ राम अपनी बात कहते हुए 



जसम कार्यकर्ता सुनील चौधरी












































































 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सुधीर सुमन,
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
sudhir.suman@yahoo.co.in

1 टिप्पणी:

  1. बाबा की चर्चा होते ही उनके साथ कुछ घंटो का प्रवास जीवंत हो उठता है... बहुत दिनों तक चक्की... वाली कविता उनके मुख से सुनने का अवसर मिला है मुझे...

    उत्तर देंहटाएं

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here