संस्मरण:-गायब होती बीन और जाते हुए बीनकार - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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संस्मरण:-गायब होती बीन और जाते हुए बीनकार

बहुत वजनदार वाद्ययन्त्र बजाने वाले एक जानकार कलाविद जो अपनी बुढाती उम्र के साथ अपनी प्रिय बीन को छोड़छाड़ कर चल बसे.यही कोई जनवरी के महिने  में पंद्रह दिन गुज़रने के बाद वाले पक्ष में मुझे सन दौ हज़ार छ; में इसी महान और उर्दू ज़बानी आदमी के साथ रहने का मौक़ा मिला. राजस्थान के होकर भी वे अपने उठने के दौर से लेकर चल बसने तक दिल्ली में रहे. ये देखा और महसूसा गया ही कि अमूमन कलाकारों को अपनी व्यावसायिकता की मज़बूरी के चलते मिट्टी और जन्म स्थान को पिछे छोड़,बड़े नगरों में जाकर रहना पड़ता  है.दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में इलाज के चलते अपनी ह्रदय गति रूक जाने से अल्लाह को प्यारे हुए उस्ताद असद अली खान साहेब के साथ गुज़ारे हुए वे सात-आठ दिन मुझे आज यादों की क्रमबद्द फिल्म के रूप में नजर आ रहे हैं.स्पिक मैके जैसे कलावादी आन्दोलन में प्रमुख दायित्व निर्वहन के साथ ही एक स्वयंसेवक की भूमिका में मैं उनके साथ पश्चिमी राजस्थान के दौरे पर रहा. रेतीले प्रदेश में संगीत की अलग जगाने की वो कोशिशें जहां लोक संगीत तो सर चढ़ कर बोलता रहा ही मगर ये सफ़र हमारे दल के लिए शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार का होने से कम जोखिमभरा नहीं रहा.

अपनी अर्द्ध सरकारी नौकरी के चलते स्कूल की  परवाह किए बगैर उस्तादजी के एक कहे पर उनकी क्वालिस में लगभग साफ़-सुथरे दिखते दो जोड़ी कपड़े, बेग में ठूंसकर चल पडा.नामालुमों को बता दूं कि ये यात्रा रूद्र वीणा जैसे कठिनतर वाद्ययंत्र के साधक पुरुष असद अली खान जी के साथ थी. इस यात्रा में और भी मझेदार बात ये है कि मुझे राजस्थान के ही एक और बड़े संगतकार पखावजी पंडित डालचंद शर्मा से बातों के ठठ्ठे लगाने का मौक़ा भी मिला.वे जानेमाने पखावज वादक जिन्हें पखवाज की तालीम नाथद्वारा में मिली.बहुत लम्बे समय तक ये दोनों ही साधक पुरुष, सरकारों के लोकप्रिय इनामों से मरहूम रहे.यात्रा में हमारे बीच चौथे इंसान के रूप  में  तानपुरे पर उस्ताद जी के एक नातिन ज़की अली थे,जो यात्रा के समाप्त होते होते उस्ताद के प्रबधक के रूप में ज्यादा अच्छी भूमिका में उभरे.वैसे भी उस साल में ही खान साहेब के बुढापे के चलते उनकी तबीयत और मिजाज़ के कारण उनकी सेवा-सुश्रुसा हेतु कोई जानकार रिश्तेदार साथ होना बेहद ज़रूरी लग रहा था.ज़की,उस्ताद जी के साथ सोते और मुझे मिलता डालचंद जी के के साथ का कमरा.दो गुरु और दो सेवक की भूमिका में.

रोज लगभग तीन सौ किलो मीटर की असहज  यात्रा,आलिशान होटलों में रात्रि विश्राम,अगले रोज़ सुबह प्रोग्राम और लंच के बाद फिर यात्रा.यहीं क्रम था उस्ताद जी के साथ दिन काटने का.खान साहेब वीणा बजाते,पंडित जी पखावज,ज़की अली तानपुरा.इस बीच मैं खुद को कुशल मंच संचालक समझने की गलतफहमी में कार्यक्रमों के संचालन करता हुआ भोंपू पर विचार साझा करता.विचार वही रटे रटाए या तो स्पिक मैके के बारे में  होते या फिर रूद्र वीणा और खान साहेब के बारे में.

लंबा परिचय ख़ास कलाकार यानिकी उस्ताद जी के बारे में और उससे लगभग हमेशा थोड़ा छोटा परिचय संगत के वाद्ययन्त्र पखवाज के मालिक पंडित डालचंद जी का.ये दोगला व्यवहार ही मैंने शुरू में सिखा,पाया,किया,मगर अब मैं इसके विरोध में हूँ. परम्परा की बात करें तो आज भी सरोद,सारंगी,सितार,बांसुरी,वीणा,गिटार,वायलिन,संतूर बजाने वाले  मुख्य कलाकार होते हैं और तबला,पखावज,हारमोनियम,तानपुरा,घटम,मृदंगम,नटूवंगम,एडक्या,मृदला के वादक कितने ही तुरमखान क्यों न हों वे दूजे पायदान पर रखे जाते हैं. फिर पता नहीं ये भेदभाव कब तक.जबकि ये सभी वाद्ययंत्र एक दूजे के बगैर कभी भी नहीं बजाए जा सकते हैं.खैर ये लम्बी चर्चा मांगता हुआ विचार है.हाँ उस्ताद जी और पंडित जी के बीच बहुत पटती थी. वे देशभर और विदेश में हमेशा एक दूजे के साथ ही रहे,दिखे और बढ़े .वीणा के संगत में पखावज ही बजती है. या तो डालचंद जी साथ रहे या मनोहर श्याम जी.

जानने लायक बात ये है कि जयपुर बीनकार घराने के ख्यात बीनकार असद अली साहेब आज हमारे बीच नहीं हैं मगर आज भी सिरोही,बाड़मेर,जैसलमेर में हुए उनके प्रथम आयोजन और उनके स्वागत में गलों में डाली गयी मालाएं खासी याद हैं.ये सारी बातें बहुत ज्यादा पिछे की नहीं लगती हैं.बीन जैसा वाद्य हमेशा रियाज़ का वाद्य रहा जिसे वज्रासन में बैठकर कंधे पर रख बजाया जाता है.उसकी आवाज़ कानों तक ही आ सकती थी,मगर ये तो उस्ताद जी ही थे,जो अपनी विदेश यात्रा के दौरान चौबीस फेंटम पावर का माइक्रोफोन लाए और बाद में जाकर वही फोन  उनकी बीन को कई गुना आवाज़ दे गया.वे जब रात में सोते भी थे तो पहले बीन को सहलाते हुए उसके दोनों तुम्बे एक एककर  खोलते हैं.फिर सुबह रियाज़ के वक्त उसे कसते हैं.तैयार कर तार खींचते हैं. और बस सुर लगते ही ध्यान में चले जाते हैं.वैसे भी बीन हमेशा खुद के लिए सुनने लायक वाद्य ही रहा.श्रोताओं के लिए इसे सुनना बड़े धैर्य की परीक्षा होती रही.पहली बार सुनने वाले तो आलाप के दौरान बड़ी देर तक मन ही मन हंसते रहते.लेकिन ये बात पक्की है कि बहुत द्रुत में जाकर ये बड़ा आनंददायक रूप में बजता हुआ साबित होता है.

संगीत साधकों के सजीव आयोजनों के साथ के मेरे अपने लम्बे अनुभव में लगातार सात दिन तक का ये वैचारिक लेनदेन बहुत यादगार रहा.दिन में कार में ही सफ़र के दौरान उर्दू ज़बान के तकिया कलाम लगाते उस्ताद के तजुर्बों की फेहरिस्त मेरे कानों में पड़ती रहती और रात में पंडित जी की चस्केदार बातें.यही आलम था रात दिन.जी-हजुरी में दिन बीते.ज्यादा जानकारी के अभाव में एक सज्जन शिष्य की तरह हाँ भर देता था मैं भी.यूं मैं एक गाँव का वासे होकर मैं शहर के लोगों को भी पढ़ रहा था.उनके विचारों को करीब से देख-सुन रहा था.ये निरीक्षण मुझे बहुत रूपों में अच्छे से तैयार कर रहा था.एक आदमी के पकने की यात्रा में शायद ऐसे  पड़ावों का आना क्लाभी-कभी  बेहद ज़रूरी लगता है.

भले ही मैं सैकड़ों कार्यक्रमों में शास्त्रीय संगीत देख और सुन चुका था मगर अभी तक भी मुझमें संगीत की विधिवत तालीम की कमी प्रोग्राम सुनते वक्त बहुत अखरती थी, जिसके कारण उस्ताद जी और उनकी बीन को  बहुत अन्दर तक नहीं समझ पाया.उनके तपस्वी चरित्र के कारण उनमें और उनके प्राचीन वाद्य के प्रति उसके पुरानेपन  के कारण मेरी श्रृद्धा रही.उन्हें सुनने का मौक़ा बाद में भी कई शहरों में हुए सजीव कार्यक्रमों में मुझे उन्हें सुनने का मौक़ा मिलता रहा,मगर इतना भरपेट एक साथ कभी भी नहीं सुन पाया..एक बात जो मुझे हमेशा चिंता में डालती रही कि उनके जैसी खंडारवाणी शैली की बीन बजाना किसी के बस का नहीं था. ज्यादातर घरानों की तरह उनके कोई बेटा तो था नहीं जो बीनकार बनना स्वीकारे और उसे आगे ले जाए. ले दे कर बस उनका नातिन ज़की अली ही उनकी नज़र में उनका शिष्य था.जाली अली अब इस बीन को कितना न्याय दे पाते है ये तो वक्त ही बताएगा.हालांकि ध्रुपद शैली में बजने वाली इस वाद्य परम्परा में बहाउद्दीन डागर एक प्रमुख युवा रत्न है जो इस वाद्य यन्त्र के साथ न्याय कर रहे हैं.ये बात बीन और उस्ताद असद अली खान साहेब के साथ सौ प्रतिशत सही साबित होती है की उनके साथ ही एक युग का अंत हो गया.

अपने स्वभाव से ही कुछ अस्वाभाविक असद अली खान साहेब कई बार अपने अंतिम समय में कार्यक्रमों को अपने स्वास्थ्य के चलते केंसल कर देते थे.हाँ एक और ज़रूरी बात कि उस यात्रा में भी वे सदैव आलोचना के लहेजे में देखे गए.और वे इस उम्र में भी इस बात में सहायक उनकी याददास्त,तब भी बहुत तेज़ थी.देश के लगभग सभी मंत्रियों संतरियों के साथ ही कार्यक्रमों आयोजक घरानों को वे खुद बखूबी जानते थे,यथासमय याद रखते थे..अन्य बड़े कलाकारों की तरह व्यावसायिक अंदाज़ से परे रहते हुए वे भी अक्सर अपने आयोजन की स्वीकृतियां अपने नातिन के सहारे लिया-दिया करते थे.मझेदार बात ये है कि हमने उस यात्रा में अनजाने में ही सही मगर हमने उन्हें उस रेगिस्तान में पद्मश्री से सम्मानित कलाकार के रूप में प्रस्तुत किया था, ये अलग बात है कि पद्मश्री उन्हें बाद के तीन सालों में भी नहीं मिल पाया.

आज उनके नहीं रहने पर राजस्थान को आने वाले वक्त में उनकी बहुत याद आएगी. और देश को एक अच्छे बीनकार की.मिर्च मसालेदार सब्जियों के शौक़ीन उस्ताद जी के साथ के वे दिन मैं कभी नहीं भूल पाउँगा.अजीब बात है कि बीन के साथ बजनेवाली पखावज के वादक डालचंद जी के लिए भी ये दोहरे रूप में एक बड़ा धक्का होगा.यादें बहुत सी हैं...बाकी फिर कभी............

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
माणिक,वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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