जया द्विवेदी की दो कवितायेँ - अपनी माटी

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जया द्विवेदी की दो कवितायेँ


एक स्त्री की वसीयत
जीते जी बोटी-बोटी नोच डाला
इंसानों ने
क्या बिगाड़ा है परिंदो ने
कर देना उनके हवाले लाश मेरी!
  
बँटवारा
माना कि
ज़िंदगी होती है कड़ी धूप सी
पर मेरे हिस्से में तो
एक पेड़ भी न आया



जया द्विवेदी 
अंबिकापुर, छत्तीसगढ़
मो.-900998110

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