'शिक्षा का बाजारीकरण पूंजीवादी लूट का ज़रिया': भवानीशंकर होता - अपनी माटी

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शनिवार, जून 11, 2011

'शिक्षा का बाजारीकरण पूंजीवादी लूट का ज़रिया': भवानीशंकर होता

उदयपुर।
 ‘‘युवा भारत के सपने’’ शिक्षा के बाजारीकरण से चकनाचूर हुए जा रहे हैं और युवा मात्र अपने अस्तिस्त्व में संघर्ष तक सीमित हो गए है। देश और समाज के बारे में सोचने और सपने देखने का अवकाश ही उनके पास इस पूंजीवादी व्यवस्था ने नहीं छोड़ा है। उपरोक्त विचार अखिल भारतीय अध्यक्ष व पूर्व सांसद भवानी शंकर होता ने विश्वविद्यालय शैक्षणोत्तर कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय में महावीर समता संदेश द्वारा युवा भारत के सपने विषय पर आयोजित एक संगोष्ठी के मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जेल में रह रहे बंदी पर सरकार 65 रूपया प्रतिदिन खर्च करती है। जबकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोन्टेक सिंह आहलूवालिया यह तर्क दे रहे हैं कि प्रति व्यक्ति 800 कैलोरी प्रतिदिन पर्याप्त है। और उसके लिए यदि 20 रूपया प्रतिदिन की आय है तो उसे पर्याप्त माना जाए। उन्होंने कहा कि 77 प्रतिशत ग्रामीण युवा के सामने आज अस्तित्व का प्रश्न सबसे बड़ा है। कृषि में, दस्तकारी में, महुआ व तेंदू पत्ता बीनने में जो युवा लगा है उसके सामने प्रश्न अब भी रोटी, कपड़ा और मकान है तथा उसी से उसके सपने भी निर्धारित होते है। 

उडीसा के संबलपुर क्षेत्र से सांसद रहे श्री होता ने बताया कि किस तरह उद्योगपतियों के इशारे पर सरकार माओवादियों को हिंसक व आतंकी बताकर बदनाम कर रही है। अपनी जमीन, जल व जंगल से बेदखल आदिवासी व ग्रामीण युवाओं के प्रतिरोध को माओवाद का नाम देकर कुचल दिया जा रहा है और राज्य एक निरंकुश सत्ता की तरह व्यवहार कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश भर में शिक्षा के सार्वजनिक संस्थानों को कमजोर बनाया जा रहा है, उनमें अध्यापकों की नियुक्तियां नहीं की जा रही है व वर्ल्ड बैंक के इशारे पर ऐसी परिस्थिति पैदा की जा रही है कि अध्यापक, अभिभावक व विद्यार्थियों में संघर्ष की स्थिति पैदा हो जाए। यह एक खतरनाक संकेत है जिसके विरूद्ध एकजुट होकर संघर्ष करना जरूरी है। 

संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए समाजवादी चिंतक डॉ. नरेश भार्गव ने कहा कि देश के युवा के पास अपने सपने देखने की स्वतन्त्रता ही नहीं है। मध्यमवर्गीय युवा अपने माता पिता के सपनों के शिकार है तो उच्च वर्गीय युवा अपने लूट के साधनों को बढ़ाने पर ही विचार करते है। गरीब व सीमान्त वर्ग के युवा का सपना अपने आपको जिन्दा रख पाने की जद्दो जहद में नष्ट हो जाता है। उन्होंने कहा कि तिरूपति नाथ से पशुपति नाथ तक युवा जिस तरह से संगठित हो रहे है। वह एक बड़े व्यापक परिवर्तन का संकेत भी है। संगोष्ठी के प्रारम्भ में अधिष्ठाता प्रो. हेमेन्द्र चण्डालिया ने विषय प्रवर्तन करते हुए राजस्थान विद्यापीठ के शैक्षिक योगदान की चर्चा की तथा बताया कि स्वतन्त्रता के पहले से समाज के सबसे वंचित वर्ग को शिक्षित करने का कार्य विद्यापीठ ने किया है। महावीर समता संदेश के प्रधान सम्पादक हिम्मत सेठ ने अतिथियों का स्वागत किया तथा आयोजन की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि भवानी शंकर होता का परिचय जनता दल एस के प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन दैथा ने दिया व कहा कि भारत सरकार पिछले छह वर्षों में 22 लाख करोड रूपये औद्योगिक घरानों के कर माफी में दे चुकी है। जबकि शिक्षा के लिए खर्च न हो इसके लिये बहाने बनाए जाते है। एडवोकेट मन्नराम डांगी ने कहा कि वैश्वीकरण से राष्ट्रवाद और मजबूत हुआ है जबकि लोगों का आपस में विश्व भर में जो मेल मिलाप बढ़ना चाहिए था वह नहीं हो पाया है।

 डॉ. हिमांशु पण्ड्या ने कहा कि शिक्षा के निजीकरण से हम सभी प्रभावित हो रहे है। किन्तु संघर्ष के केन्द्र में यह विषय जिस तरह रखा जाना चाहिए था, वैसा हो नहीं रहा है। शंकर लाल चौधरी ने कहा कि सबसे बड़ा संकट मध्यम वर्ग की अवसर वादिता है। यही पूंजीवाद की चरम परिणति साम्राज्यवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित होगा और ना समझी में इसी वर्ग के लोग अपने आपको सुरक्षित मानते हुए संषर्घ के रास्ते पर नहीं जाना चाहते। संगोष्ठी में शान्तिलाल भण्डारी, पूर्व पार्षद रियाज हुसैन, डॉ. फरहत बानो, इंजी. एसएल गोदावत, डॉ. एचएम कोठारी व दिनेश व्यास आदि ने भी चर्चा में भाग लिया। जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ अध्यापक परिषद के उपाध्यक्ष प्रो. प्रकाश जैन ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

वरिष्ठ साथी पत्रकार,
उदयपुर से प्रकाशित 'समता सन्देश' 
पत्र के सम्पादक और 
समतावादी लेखक हिम्मत सेठ

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