लघु समीक्षा:प्रबन्ध काव्य ‘मैं अट्ठारह सौ सत्तावन बोल रहा हूँ’ - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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लघु समीक्षा:प्रबन्ध काव्य ‘मैं अट्ठारह सौ सत्तावन बोल रहा हूँ’


मैं अट्ठारह सौ सत्तावन हूँ...... और
अट्ठारह सौ सत्तावन अट्ठारह सौ अट्ठावन के
आने से खतम हुआ था और
वह खतम होगा....

मुक्ति-युद्ध जारी है
और जारी रहेगा तब तक
जब तक यह पूरी धरती
पूँजीवादी शोषण से
सामन्ती उत्पीड़न से
साम्राज्यवादी आतंक से .........
पूरी तरह मुक्त नहीं हो जाती

.....मैं मरूँगा नहीं....
क्रान्ति का इतिहास इतनी जल्दी नहीं मरता
बलिदान के रक्त की ललाई को
धूप सुखा सकती है,
हवा और वक्त

इसलिए, मैं फिर कहता हूँ -
मैं जिन्दा हूँ, जिन्दा रहूँगा
भेष बदल सकता हूँ,
उद्देश्य नहीं,
चित्र बदल सकता हूँ,
चरित्र नहीं......

ये पंक्तियाँ ब्रहमनारायण गौड़विप्लव बिड़हरीके प्रबन्ध काव्यमैं अट्ठारह सौ सत्तावन बोल रहा हूँकी हैं जो अभी अभी प्रकाशित होकर आया है। विप्लव बिड़हरी के काव्य की यही विशेषता है कि वे जनता के इतिहास को, उसके नायकों को, काल को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं। वे अस्सी की ओर बढ़ रहे है, पर उनके अन्दर नौजवानों सा उत्साह है। यह नई काव्यकृति इसी का प्रमाण है। अपनी इस नई रचना के द्वारा वे सिर्फ अपने अन्दर की आग को जलाये हुए हैं बल्कि हमारे अन्दर भी क्रान्ति की आग जलाये रखना चाहते हैं।

पिछले दिनों विप्लव बिडहरी ने समाजवादी क्रान्ति के महानायक लेनिन के जीवन विचारों पर केन्द्रित महाकाव्यक्रान्तिरथीकी रचना की थी। उन्होंने इस महाकाव्य की रचना ऐसे वक्त में की जब कहा जा रहा था विचारधारा का अन्त हो चुका है, समाजवाद अतीत की गाथा है।क्रान्तिरथीइन विचारों के विरुद्ध संघर्ष करता है। हमारे अन्तर को परिवर्तन के विचारों से आलोकित करता है।

आज उनके नये प्रबन्ध काव्य का नायकअट्ठारह सौ सत्तावनभी हमसे संवाद कर रहा है। यह कहना गलत होगा किअट्ठारह सौ सत्तावनमात्र इतिहास है। यह कहानीअट्ठारह सौ सत्तावनसे बहुत पहले शुरू होती है, वर्तमान से टकराती है और हमारे भविष्य तक जाती है। यह चम्पू प्रबन्ध काव्य है। इसमें कविता के विविध रूपों का दर्शन होता है। इसमें पद्य, गद्य, तुकान्त, अतुकान्त, नाटक, कहानी, दोहे, चौपाई, नाटक, भाषण आदि है। इसे कविता की तरह पढ़ा जा सकता है तो ढ़ोल-मजीरा पर आल्हा की तरह गाया भी जा सकता है। गायन मंडलियाँ इसे गाकर अट्ठारह सौ सत्तावन को लोगों तक पहुँचा सकती हैं। करीब 130 पृष्ठों के इस प्रबन्ध काव्य की कीमत एक सौ रुपये है तथा इसे जन संस्कृति प्रकाशन, एफ-3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017, मो - 08400208031 से प्राप्त किया जा सकता है।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
लखनऊ-कवि,लेखक

और संस्कर्तिकर्मी
कौशल किशोर 

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