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परमाणु ऊर्जा :मामला,प्रभाव,भ्रांतियां और परिणाम

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जून 09, 2011 | गुरुवार, जून 09, 2011

मानव जाति ने अपने उदगम् से लेकर आज तक के सफर में अपनी ही इस प्रकृति के छोटे- बड़े,अच्छे-बुरे, विशाल व भयानक परिवर्तनों की उथल-पुथलता देखी है-भोगी है।एक अकाट्य सत्य, जीवन के बाद मृत्यु अवश्यंभावी है। मानव ने प्रकृति के प्रथम जलजले के बाद जीने का निश्चय किया था न कि मौत को अपनाने का। जापान पर प्रकृति की दौहरी यह मार ने उसकी जीवनचर्या को तहस-नहस कर दिया है। मानव यह भी जानता है कि ऐसे जलजले फिर भी आएंगें लेकिन वह जीने की ओर भी तेज उमंग के साथ ओर भी ऊर्जावान बनकर अपनी दिनचर्या को ज्यादा विकसित एवं सुखद बनाने के प्रयासों में लिप्त, जीवन के अपने पथ पर निरंतर आगे बढ़ता ही रहता है और यही मानवीय प्रवृति भी है। मरने से पहले वह अपने जीवन को बेहत्तर से बेहत्तर ढ़ंग से जीने की अपनी प्रवृति को नहीं त्याग सकता, क्योंकि, इसी में जीवन की सत्ता  है और उसकी यह प्रवृति तब तक चलती रहेगी जब तक कि पृथ्वी है, हवा है, पानी है, और वातावरण है।

मानव ने अपने जीवन को अंधेरे से उजाले की तरफ ले जाने के लिए अर्थात, अपने विकास के आरोही सोपानों को समय के साथ-साथ चलकर पार किया है।किसी भी देश का समुचित विकास, यथा, उसमें रहने वाले लोगों का विकास, उस देश की अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है। इस अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष तौर पर, कृषि, उद्योग, यातायात, संचार, शक्ति, खनन एवं अप्रत्यक्ष तौर पर चिकित्सा, शिक्षा, रक्षा, प्रशासन इत्यादि आते हैं और इनके सुचारु रुप से क्रियान्वयन के लिए विद्युत मुख्य आधार है अर्थात, हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ विद्युत ऊर्जा ही है। जितना ज्यादा विद्युत का उत्पादन व खपत, उतना ही ज्यादा सकल घरेलू उत्पाद, यथा, उतनी ही ज्यादा मजबूत आपकी अर्थव्यवस्था।

भारत में प्रति-व्यक्ति विद्युत उत्पादन 700 यूनिट प्रतिवर्ष है जबकि विकसित राष्ट्रों में यह 5000-13000 यूनिट है। सबसे पहले तो हमें यह जानना है कि विकास के स्तर पर हम कहाँ आते हैं? स्पष्ट है कि हम स्तर से बहुत नीचे हैं। अब, मानवीय प्रवृतिवश हम भी विकास के स्तर तक आना चाहेंगे, अर्थात, हमें भी विद्युत उत्पादन के स्त्रोत बढ़ाने होंगे। भारत में कुल 700 यूनिट, जिसमें से 378 यूनिट कोयले से, 28 यूनिट नाभिकीय से, हाइड्रो से-154 यूनिट, हाइड्रोकार्बन से-77 यूनिट, वायु से 42 यूनिट व अन्य से-21 यूनिट पैदा होती है। स्पष्ट है कि हमारे देश में विकसित देशों की तुलना में प्रतिव्यक्ति विद्युत का उत्पादन स्तर बहुत ही कम है और उसमें भी परमाणु ऊर्जा से उत्पाादित विद्युत की भागीदारी तो सिर्फ 4 प्रतिशत ही है जबकि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा से विद्युत की भागीदारी 20 से 70 प्रतिशत तक है।

जहिर सी बात है कि, वर्तमान में हमें इन्ही में से ऐसे स्त्रोत ढूढ़ने होंगे जो हमें 13000 यूनिट तो नही लेकिन 4 से 5 हजार यूनिट बिजली का उत्पादन दे सके ताकि हमारे देश की कृषि, जो अभी तक भी प्रकृति पर निर्भर है, को इतना उन्नत कर सके की वह प्रकृति पर निर्भर न रहकर बिजली पर निर्भर होने लगे साथ ही और फिर खाद्यान फसलों के साथ-साथ व्यापारिक फसलें भी देने लगे।हमारे यातायात के साधन उस स्तर तक पहुँचे की आज जो कार्य हम 3 दिन में पूरा करते हैं उसे हम 1 दिन में ही पूरा कर पाये या फिर उस इंसान के सामने, उद्योगपति के सामने, प्रशासन के सामने यातायात के साधन सम्बन्धी कोई मजबूरी न रहे क्योकि उसकी प्रवृति और बुद्धि बहुत कुछ करने की रहती है।

उद्योग- हमारा आम आदमी छोटे-छोटे कारखानों से लेकर बड़े-बड़े कल-कारखानों का सपना देखता है और उसमें सपनों को पूरा करने की योग्यता भी है लेकिन उसके पास इन सपनों को जीवन्त करने के लिए बिजली नही है।
मेरी उपर्यक्त व्याख्या से हमें यह समझना है कि हमें बिजली की महत्ती आवश्यकता है।

अब बात आती है कि आखिर में हमारे पास क्या-क्या स्त्रोत हैं व उनकी क्या-क्या सीमाऐं हैं?
कोयले से-वर्तमान में मिलने वाली कुल विद्युत 378 यूनिट प्रति व्यक्ति-प्रति वर्ष।

1. इसके लिए 43.172 करोड़ टन कोयले का प्रति वर्ष उत्पादन। 
2. इसके लिए प्रतिदिन 2000 टन लादान वाली तकरीबन 405 रेलगाड़ीयों की
  आवश्यकता। 
3. भविष्य में 5000 यूनिट की दर के लिए प्रतिदिन 2000 टन लादान वाली तकरीबन 5000     रेलगाड़ीयों की आवश्यकता। 
4. कोयले का कुल भंड़ार 60 अरब टन। अर्थात कुल विद्युत क्षमता 2000 यूनिट प्रतिवर्ष 
(1.5 बिलियन लोगों में ), सिर्फ 30 वर्षो के लिए।
4000 से 5000 यूनिट की दर के लिए आवश्यक अतिरिक्त कोयले का आयात-1.6 बिलियन टन प्रतिवर्ष।

सम्बन्धित प्रश्नः-

क. क्या इतनी मात्रा में कोयले का आयात सम्भव हो सकेगा?
ख. क्या इससे होने वाली टोक्सिक गैसों- ब्व्2 दृ 7770 मिलियन टन, 
छव्ग्. 22ण्2 मिलियन टन, ैव्2. 5 मिलियन टन, राख -133 मिलियन टन, इत्यादि से मिलाकर उत्पन्न कुल कचरे को वातावरण में विसर्जित करने की इजाजत मिल पाएगी?
ग. क्या 5000 रेलगाड़ीयों का यातायात संम्भव हो सकेगा? इन प्रश्नों का उत्तर हमारे पास आज भी है।
जल से- हाइड्रो ऊर्जा जिसकी क्षमता 90 हजार मेगावाट है जिसमें से 22 प्रतिशत का योगदान है इसको स्थापित करने में बहुत ज्यादा धन व जमीन की आवश्यकता होती है इसके अलावा उपजाऊ भूमि का उपयोग करना पड़ता है साथ ही कई वर्षों का समय लगता है जिससे लागत बहुत आती है। यानि हम हमारी कुल क्ष्मता का प्रयोग भी अगर कर पायें तो भी हम 485 यूनिट की दर से(1.5 बिलियन लोगों में) ही दे पायेगें एवं इसकी एवज में शीर्ष से भी अधिक वनों एवं उपजाऊ भूमि का संहार करना पड़ेगा।
(स.) हाइड्रोकार्बन से- इससे विद्युत का उत्पादन 20 से 30 वर्षों तक कर सकते है। जिसमें से 11 प्रतिशत का योगदान है।
(द.) सौर ऊर्जा से- वर्तमान में उपलब्ध तकनीकि व्यवस्था के अनुरुप सौर ऊर्जा से 1 प्रतिशत का योगदान है। साथ ही इससे बिजली के उत्पादन में 18 रुपये प्रतियूनिट का खर्चा आता है व उपभोक्ता तक पहुँचने में इसकी कीमत 26 रुपये प्रतियूनिट हो जाती है।
 सम्बन्धित प्रश्नः-
(क.) क्या हमारा उपभोक्ता इतनी महंगी बिजली खरीदने के लिए सक्षम है?
(ख.) यह सही है कि इस दिशा में रिसर्च चल रहे है कि इस टेक्नोलॉजी को हम अपनी पहँुच के संगत बना पाये, परंतु तब तक क्या हमें हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहना है ?

नाभिकीय ऊर्जा - अभी इसका योगदान 4 प्रतिशत ही है। हमारे देश में कुल विश्व का 1/3 हिस्सा थोरियम है जो कि 5 लाख 18 हजार टन है एवं कोयले के 600 अरब टन के बराबर है, इस प्रकार यह कोयले से 8 से 10 गुणा है और इससे प्रदूषण का कोई खतरा भी नहीं है। इस प्रकार, यूरेनियम, थोरियम व प्लूटोनियम से मिलाकर प्रतिवर्ष, तकरीबन, 2000 यूनिट 570 वर्षों (1.5 बिलियन लोगों में ), तक प्राप्त कर सकते हैं।

आज विद्युत के अतिरिक्त, परमाणु ऊर्जा का मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण योगदान हैं।उसके अस्वस्थ होने पर, उसके रोग के निदान व इलाज में,कृषि में उसकी पैदावार को उन्नत बनाने में,उद्योगों को सफल बनाने में एवं उत्पादन को बढ़ाने इत्यादि में, रेडियेशन का महत्वपूर्ण योगदान है।नाभिकीय विद्युत को मैं आज भी इन हालातों में जब कि जापान में परमाणु रिएक्टरों की परिस्थितियों से वाकिफ होते हुए भी यह कहना चाहूँगी कि नाभिकीय ऊर्जा सर्वोत्तम है और ऐसा कहने के पीछे गहरे कारण हैंः-

जापान में एक दोहरा जलजला आया है व इसने पूरी तरह से वहॉँ के जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है एवं कई लोग इसमें हताहत हुए हैं। लाखों परिवार, हजारों उद्योग, यातायात, संचार सब कुछ काफी हद तक तहस-नहस, अस्त-व्यस्त हो गये हैं। इस विशाल विनाश की परिस्थिति में भी इंसान कहता है कि वह स्वयं को पुनः सुचारु रुप से व्यवस्थित कर लेगा।उस इंसान ने मरने से पहले मृत्यु का वरण नही किया है अपितु सृजन की राह पर ही चलने की अपनी प्रवृति का दावा किया है। कहने का अर्थ है कि उसने अपने विकास में हर तरह की व्यवस्था कर रखी थी लेकिन प्राकृतिक जलजले ने वह सब तहस-नहस कर दिया है। इसका मतलब यह तो नही लगाया जा सकता की उसने विकास के उन प्रयासों से जिनके होने से वह अपने जीवन के विकास के उत्तरोत्तर सोपानों पर चढ़ा है वह सब गलत थे, झूँठ थे, विनाशात्मक थे! इसी प्रकार, उन परमाणु रिएक्टरों से उसने इतनी तादात में साफ एवं स्वच्छ ढ़ंग से बिजली पैदा की है कि जिसकी वजह से वह विकास के विभिन्न सौपानों पर चढ़ पाया है।

आज जब प्रकृति की भयावह मार ने उस को भी छेड़ा है। यह मानव आज उसी को गलत ठहरानें में लग गया, उसी के विरोध में लग गया है। क्यूँ नही वह प्रकृति का ही विरोध करता, वास्तव में, जिसने उसे बर्बाद किया है, उसका जीवन हरन किया है, उसकी दिनचर्या को तहस-नहस किया है। हम अंजान लोग इन परमाणु बिजलीघरों का जोर-शोर से कुप्रचार करने में लग गये हैं जबकि इस खतरे से निपटने की मानव में शक्ति है और वह इतना सक्षम भी है की प्रकृति की इस दोहरी एवं विकराल आपदा से उत्पन्न हुए खतरे को बहुत जल्दी दूर कर लेगा।मैं आपको बहुत ही सत्य बात बताना चाहूँंगी कि चर्नोबिल दर्घटना, जो कि एक विशाल  दुर्घटना के रुप में मानी जाती है, में सिर्फ 30 लोग जिनमें फायर फायटर्स भी थे हताहत हुए, बाकी लोग अपनी अकर्मण्यता, आलसी, शराबी, प्रवृति की वजह से अवसाद की स्थ्तिि में आ जाने की वजह से हताहत हुए थे। मिडिया ने उन लोगों को भयभीत, दूसरों पर आश्रित और बिना मेहनत किये हुए धन पर जीने की प्रवृति में ला दिया था जिससे वो लोग अवसाद की स्थिति को प्राप्त होकर हताहत हो गये।

आज भी ऐसी परिस्थितियाँ प्रसार तन्त्र पैदा करने की कौशिश कर रहा है। ‘‘क्यांे नही वह ऐसा भी कहे कि इतने बड़े जलजले व कयामत के बाद भी जापान के उन परमाणु रिएक्टरों से कोई अमान्य स्तर की हानि नहीं हुई है और मानव में इतनी शक्ति है कि वह उन खतरों से निपट लेगा और आने वाले समय मंे इन्हें और भी बेहत्तर ढ़ंग से मजबूत बनाएगा क्यांेकि निरन्तर चलते रहना ही उसकी प्रवृति है?‘‘

आम जनता से मेरे प्रश्न:-
1. वायुयानों में, रेलगाड़ी में, स्कुटरों,बसों इत्यादि से दुर्घटना वश लाखों लोगों की जानें जाती रहती है। क्या इंसान इन पर हमेशा के लिए प्रतिबन्ध लगा सकता है ? या फिर ओर भी ज्यादा से ज्यादा इन साधनों का उपयोग करने लगा है क्यांे ? (यही न कि इंसान इन साधनों के उपयोग से जुड़े अपने सीधे-सीधे फायदों को देख सकता है और ये फायदे उसे, नुकसान की तुलना में,  गुणात्मक रूप से ज्यादा दिखाई देते हैं। ऐसे में, किसी भी प्रकार का प्रसार तंत्र उसे दिकभ्रमित नहीं कर पाता है।)   

2. जापान एक भूकंपित देश है, यह जानते हुए भी, तो क्यँू नहीं वहाँ के लोग हमेशा के लिये जापान से पलायन कर जाते हैं? (वहीं रहते हैं और हमसे ज्यादा विकसित स्तर में आते हैं।)
3. प्रकृति जिसने आपका बहुत कुछ खो दिया उससे निपटने के लिए और फिर से सही ढर्रे पर आने का आव्हान आप करते हो, जबकि, जिसने आपका अभी तक अमान्य स्तर पर भी कुछ नही खोया है, न ही बिगाड़ा ह,ै बल्कि, दिया ही दिया है तो फिर क्यूँ उसके होने का विरोध जोर-जोर से संचार माध्यमों के जरीये करतें हैं?
4. क्यूँ आदमी स्वयं ही प्रचार करने में लग गया है कि परमाणु रिएक्टरों से बहुत रेडिएशन निकलता है, उससेें जेनेटिक प्रभाव पड़ते हैं, पेड़-पौधे सुख रहे हैं, केंसर जैसे रोगांे को बढ़ावा मिल रहा है जबकि हकीकत है कि इन परमाणु रिएक्टरों से वहाँ के आस-पास की जनता को सालाना 1 मिलिरेम की ही रेडिएशन डोज मिलती है और यह डोज प्रकृति से मिलने वाली डोज का सिर्फ 200 वाँ हिस्सा है।

आज सुनने को मिलता है कि जैतापुर में वहाँ की जनता ने वहाँ आने वाले बिजलीघरों का विरोध किया है, आखिर क्यूँ ? 

क्या गलती है इन बिजलीघरों की जबकि ये तोे आप को बिजली देते हैं और इसी बिजली पर जबकि हमारी समूची अर्थव्यवस्था टिकी हुई है ?

इंसान कहता है कि नहीं चाहिए मुझे ऐसा खतरा ? या वैसा खतरा। मैं तो अंधेरे मे ही रह लूंगा। मैं पूछती हूँ कैसा खतरा ? क्या वैसा खतरा कि,  जब बाढ़ों में हर साल आदमी मरता है व तमाम फसलें चौपट हो जाती है, वैसा नहीं तो फिर कैसा, भुखमरी एवं हीन भावना से पीड़ीत होकर चोरी लूटपाट में लगने वाला जैसा खतरा या फिर सूखे के कारण किसानों का आत्महत्या कर लेने का खतरा, ये सभी नहीं तो फिर कैसा खतरा ? शीर्ष तक की आपातकालीन परिथिति में भी इन बिजलीघरों से अमान्य स्तर का कुछ भी खतरा पैदा नहीं हो सकता है। आज जापान के रियेक्टर के फटने से हम मान बैठें हैं कि ये परमाणु बम की तरह से फटा है! ये परमाणु बम नहीं है, अपितु, बिजली पैदा करने वालेे बिजलीघर हैं। एक इंसान की औलाद इंसान होती है लाखों नरभक्षी महाराक्षस तो कदापि नहीं। मैं पूछती हूँ कि क्या अन्य फैक्ट्रीयों, कारखानों, इत्यादि में आगें नहीं लगती है? अपितु, इनमें लगी आगों से उत्पन्न जन-माल हानि, परमाणु बिजलीघरों की अपेक्षाकत गुणात्मक रूप में बहुत ज्यादा होती है। अन्य फैक्ट्रीयों, कारखानों, इत्यादि से उत्पन्न कचरा गुणात्मक रूप में बहुत ज्यादा तो होता ही है साथ ही एक बार वातावरण में आ जाने के बाद हमेशा बना रहताा है, जबकि बिजलीघरों से तो, तुलनात्मक रूप से, नगण्य मात्रा में ही पैदा होता है और वह भी समय साथ क्षयित होता रहता है। 

आपके घरों, देहातों, क्षेत्रों, जिलों, राज्यों के लिये यदि बिजली की आपूर्ति नहीं है या जरूरत से बहुत ही कम है तो फिर कैसे कर इस वैश्वीकरण के दौर में आपकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव हो सकेगी? दिमाग के इस डर को निकालना होगा आलस्य को त्यागना होगा। नये-नये सुरक्षित प्रबंधों के द्वारा हमें नये-नये परमाणु बिजलीघरों की स्थापना करनी होगी, क्योंकि बिजली में ही हमारी उन्नति छिपी है और परमाणु उर्जा के द्वारा ही आने वाले समय में हम बिजली की, खपत के अनुसार, एक बहुत लंबे समय तक मानव-जाति को  बिजली का उत्पादन दे पाएगंे।

‘‘इंसान स्वभाववश आलसी होता है। लेकिन जब वह ज्ञान प्राप्त करता है तो विकास के विभिन्न सोपानों को पूरा करने में जुट जाता ह। बस, उसे एक बार ज्ञानी होना होता ह,ै क्यांेकि, जो ज्ञानी है वह विकसित है विशाल है। एक अज्ञानी इंसान इनके विकास को फरेब व धोखे की भाषा से नवाजता है जो गलत है।‘‘

एक बार, मैं एक गॉँंव में एक ऐसे परिवार से मिली जिसके परिवार के मुखिया के छोटे-छोटे 11 बच्चे थे। मेने प्रश्न किया कि आप स्वयं जब आर्थिक दृष्टि से कमजोर है तो कैसे कर इन बच्चों के भरण-पोषण, पढ़ाई-लिखाई इत्यादि का इंतजाम कर पाओग? उस इंसान का उत्तर था कि अन्य लोग जोे पढ़ लिखकर कमायेंगे उनके कमाये हुये पैसों को लूटकर ये अपना जीवन बसर कर लेंगे।

‘‘एक बार देखियें कि, जिस दिन आप शिक्षित होओगे उस दिन विकास के सारे    साधनों को एकत्रित करने लगोगे।‘‘
5. बिजली उत्पादन के ये केन्द्र कौन स्थापित करता है, क्यूँं स्थापित करता है और किसके लिए स्थापित करता है? (आप ही, आपके लिये बिजली की आवश्यकता की पूर्ति के लिये करते हैं। )
6. यदि बिजली नहीं होगी तो हम सरकार को दोषी ठहरायेंगे और यदि सरकार इसके उत्पादन का बेहत्तर विकल्प ढ़ूढ़ती है तो फिर उसमें कमियां ढूँढने लगेगें, क्यूँं?
7. इंसान निहित स्वार्थ की बात छोड़कर एक समग्र विकास की बात क्यूँ नही करता है?
8. क्या इंसान प्राकृतिक आपदाओं को रोक सकता है? यदि नही तो फिर भी जीने के क्या कारण है उसके पास?
9. क्यूँ नही मनुष्य प्रकृति की इस मार में घाायल हुए परमाणु बिजलीघरों की मरहम पट्टी करने की बात को जोर-शोर से करता है? क्यॅूँ नही वह यह कहता है कि यह एक शीर्ष आपातकालीन स्थिति है और इससे हम निपट लेंगे। अपितु भविष्य में इससे ओरभी बेहत्तर ढ़ंग से निपटने के लिए स्वयं को समर्थ बना लेंगे? ‘‘हमें निरंतर चलते रहना है मार्ग के पत्थर या अवरोध को देखकर लोटना नही है या वही नही खड़े रहना है चलते रहना है।‘‘
10. बहुत कुछ जान जाने से ही और उसकी व्याख्या तर्को-कुतर्को द्वारा ही करते रहने से तो अवसाद की स्थिति मिलती है सृजन की नही, तो फिर क्यूॅंँ आप अवसाद की स्थिति को छोड़कर सृजन की स्थिति में चलते है?

मेरा एक अहम् प्रश्न 
हमारे महान वैज्ञानिकों के पास इन परमाणु बिजलीघरों की स्थापना से लेकर इनके प्रचालन व सुरक्षा संबंधी सारे इंतजामात् हैं फिर क्यू हमारे अन्दर आम जनता को यह बतलाने में असक्षमता है कि हमारे ये बिजलीघर सर्वथा सार्थक है?

जबकि हमारे पास ऐसे साक्ष्य हैं जिस पर बाकि की सारी दुनिया खोज करने में जुट गई है।

पहलाः- भारत के एक परमाणु बिजलीघर की चालू अवस्था में बहुत पहले टरबाईन जल कर स्वाहा हो गई लेकिन रिएक्टर को ठंडा करना जरुरी था। उफ! पूरी तरह से ब्लैक आउट गुफ-अंधेरा होने पर भी हमारे ड्यूटी पर तैनात लोगों ने ग्रेविटी आधारित सुरक्षा का इंतजाम का प्रयोग करके रिएक्टर को कूल किया और यही नही आगे बहुत ही कम समय में उस रिएक्टर को पुनः चालू करके पूरे विश्व में उदाहरण पेश किया। इसके लिए कई बार कई दिनों तक विदेशों से प्रतिनिधि मण्डल आ-आकर भारत की इस क्षमता पर कायल हुए जाते थे।

दूसराः- जब ताज होटल में आतंकवादियों ने अपना कब्जा जमा लिया था तो वहाँ ड्यूटी पर तैनात लोग चाहते तो बहुत से छुपे हुए रास्तों के जरीये होटल से बहार भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने अपनी जान की परवाह न करके आतंकवादियों से डटकर मुकाबला किया और परिणाम स्वरुप कई लोगो को बचा पाये अपने प्राणों की बली देकर क्यूँ?क्या आज हम उन लोगो की बली को व्यर्थ जाने देते, नहीं और फिर देखिये फिर से ताज होटल अपनी पूर्व की पहचान के साथ-2 और भी निखर कर सामने आया।इस बात पर, कि ऐसी उन कर्मचारीयों की सोच क्या थी जिसने उन्हंे हालातों से डटकर मुकाबला करने का हौसला दिया एवं इनके कर्तव्य को निभाने का जोश बनाये रखा, विदेशों की सरकारी व गैर-सरकारी ऐजेंसीयाँ रिसर्च करने पर लगी हुई हैं।

अहा! हमारी ऐसी ही कर्तव्य पूर्ण एवं सृजनशील मनोवृत्ति ही तो हमारी सबसे बडी सुरक्षा है और इसके साथ हमारी तकनिकी सक्षमता व प्रबंधन-निपूर्णता मिलकर हमें हर लिहाज से सुरक्षित बनाते हैं।जब हम एक कूकर के फट जाने से या किसी गेस सिलिण्डर के फट जाने से इनके उत्पादन एवं प्रयोग को नही नकार सकते हैं तो फिर क्यों उन्हें? ’’जिन्होने आपको दिया ही दिया है और जो सिर्फ और सिर्फ आपके ही लिए आपके द्वारा ही बनाये गयें है जबकि उनकी शीर्षतम् की आपातकालीन परिस्थिति में भी मानव-जाति एवं वातावरण के लिए किसी भी प्रकार का अमान्य स्तर का खतरा नहीं है।’’

क्यू नहीं यह बता दिया जाये कि कोई भी कार्य उसके शुद्ध लाभ के बगैर नहीं अपनाया जाता है?
सब चीजों में रेडिएशन है, दूध, मकान, अनाज सब से हमें सालाना 240 मिलिरेम विकिरण डोज मिलती है, तो क्यूँ नहीं इंसान अस्वस्थ्य या बीमार हो जाता है या उसकी संतति प्रभावित होती है? और यदि ऐसा कोई नकारात्मक प्रभाव नही देखता है तो फिर क्यँूूं 1 मिलिरेम के पीछे पड़ गया है?

परमाणु बिजलीघरों में कार्यरत लोगों की अपनी ही एक टाउनशिप होती है एवं इसमें इनके रहने-सहने की उत्तम व्यवस्था रहती है। विद्यालय, अस्पताल, बैंक, पोस्ट-ऑफिस, कॉपरेटिव-सोसाइटी, स्वीमिंग-पूल, बारात घर, सामुदायिक केंद्र, क्रीड़ा-स्थल, जिम, भिन्न-भिन्न खेलों के लिये क्लब्स, इत्यादि उत्कृष्ठ श्रेणीं के होते हैं। अर्थात, इन बिजलीघरों में कार्यरत इंसान, भारतीय स्तर पर, श्रेष्ठतम् रूप में अपना जीवन-यापन करता तो ही है, साथ ही, अपनी संतति को बेहत्तर से बेहत्तर शिक्षा दिला पाने में समर्थ हो पाने की वजह से आरोही विकास की सीढ़ीयाँ बनता है। आम जनता के लिये यह सब एक सपने जैसा है परन्तु हकीकत तो नहीं झुठलाई जा सकती हे न!!! 

भारत के तमाम अस्पतालों में हमें लाखों मरीज केंसर से पीड़ीत मिलेंगें। वो सब मरीज ओर भिन्न-भिन्न कारणों से उस अवस्था को प्राप्त हुये होंगे लेकिन इन परमाणु बिजलीघरों के कारणों से तो कदापि नहीं!!! 
आलस्य त्यागो मेरे देश वासी और स्वस्थ्य एवं सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ो। देखो मंजिले आपका इंतजार कर रही हैं।

अन्त में मैं आम जनता से यह अपील करना चाहूंँगी कि बहुत कम थोड़े समय में ही जापान के परमाणु रिएक्टरों की वर्तमान की रेडियोलॉजीकल परिस्थिति को सामान्य कर लिया जाएगा। लेकिन इस समय अन्तराल में हमारा प्रसारतन्त्र हमारी आम जनता के कोमल ह्दय को इन परमाणु बिजलीघरों के प्रति इतनी नकारात्मक बातों एवं भ्रांतियों को भर चुका होगा कि आम जनता अपने ही विकास की दिशा में एक ऊँॅची दीवार खड़ी कर लेगी। ऐसा नही होने देना चाहिए, हम ही हमारे दुर्भाग्य का कारण बन जाते हैं। इसका आरोप भी हम सरकार पर मड़ देते हैं।विशेषतौर पर, महाराष्ट्र के जैतापुर, हरियाणा के हिसार वासियों को भी मैं यह बतलाना चाहूगी कि अपने ही विकास के इस मार्ग में अवरोध मत कीजिए।

 यह हिप्पोक्रेटिक बातों से दूर रहिए। सच्चाई को पहचानिए और हाथ से हाथ मिलाकर विद्युत उत्पादन के इन केन्दों को विकसित होने दीजिए इसमें आपका व समूचे देश का विकास है।एक ही वाक्य में पूरा निष्कर्ष एक साथ कह देना चाहूंगी कि अंततः विकास है विनाश नहीं !!!इन परमाणु बिजलीघरों से बिजली बनती है परमाणु बम नहीं !!! 

डॉ. नीलम गोयल
अध्यक्ष-परमाणु ऊर्जा विकास जागरुकता संस्थान
सी-199,ए, महेश नगर, जयपुर
राजस्थान
neel071@gmail.com
Contact no.: 9928130702
Website:  www.apeaf.org



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