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भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी की आशु कविता-'किलकारी पर तमाचे'

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on बुधवार, जून 01, 2011 | बुधवार, जून 01, 2011


वे भाग्यशाली हैं 
जिनके घर-आंगन 
मासूमों की
किलकारियों से गूँजते रहते हैं।
मैं भी भाग्यशाली हूँ
फिर भीं
कभीं-कभीं मुझे
किलकारियों पर क्रोध आता है
और मासूम कपोलों पर 
अपने हाथों की कठोर
अंगुलियों की छाप
छोड़ देता हूँ। 
आखिर मुझे क्या हो जाता है-?
इस पर पश्चाताप भी 
करता हूँ
मैं माँ नहीं-
स्त्री नहीं- 
एक पुरूष हूँ 
शायद इसीलिए ऐसा करता हूँ। 
माँ होता तो स्त्री होता
और कलेजे के 
टुकड़ों पर हाथ 
नहीं उठाता। 
मैं कभी-कभीं असामान्य 
क्यों हो जाया करता हूँ?
मैंने आज ही
मासूम की किलकारियों पर 
अंकुश लगाया।
खिलखिलाते मासूम के
मुँह पर तमाचे जड़ दिए।
माँ कभीं कुमाता
नहीं होती
जन्म देने वाली से लेकर 
पालने वाली माँ
देवकी या फिर यशोदा-
स्त्री थीं, भाग्यशाली भी। 
इन दोनों ने 
मासूमो के लिए 
कितने कष्ट सहे।
वह स्त्री थीं
ममता की मूरत 
‘वात्सल्य की खान।
मासूम कपोलों पर अंगुलियों
की स्पष्ट छाप देखकर
मैं आत्मग्लानि 
से भर जाता हूँ।
मुँह विसूरतें
आँखों से अश्रुधारा बहाते
कलेजे के टुकड़े को
अपनी छाती से 
चिपकाता हूँ।
सिसकियों के स्थान पर
किलकारियाँ लाने का प्रयास
करता हूँ।
फिर धीरे-धीरे 
सिसकियाँ बन्द होने लगती हैं
मासूम के साथ मासूम 
बनकर तोतली
भाषा बोलते हुए खेलने लगता हूँ।
मासूम का
चेहरा खिलने लगता है
हँसी वापस होती है
फिर किलकारियाँ गूँजने लगती हैं।
और मुझे भी अपराध बोध
से मुक्ति मिलती है।
सोचता हूँ-
वात्सल्य और ममता 
की मूरत 
माँ ही होती है
हम पुरूष नहीं,
वर्ना मासूमों की किलकारियों 
पर नियंत्रण लगाने 
के बारे में सोचता ही न।
बावजूद इन सबके 
मैं बहुत 
भाग्यशाली हूँ। 

भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ0प्र0)
मो0नं0.09454908400

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