'सच यह है कि नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते':- आलोकधन्वा - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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'सच यह है कि नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते':- आलोकधन्वा

समस्तीपुर और बाबा नागार्जुन के गांव तरौनी से जसम ने उनके जन्मशताब्दी समारोहों की शुरुआत की थी और यह निर्णय किया था कि इस सिलसिले का समापन भोजपुर में किया जाएगा। उसी फैसले के अनुरूप नागरी प्रचारिणी सभागार, आरा में विगत 25 जून 2011 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समापन समारोह का आयोजन किया गया।  जनता, जनांदोलन, राजनीति, इंकलाब और कविता के साथ गहन रिश्ते की जो नागार्जुन की परंपरा है, उसी के अनुरूप यह समारोह आयोजित हुआ। लगभग एक सप्ताह तक जनकवि नागार्जुन की कविताएं और उनका राजनीतिक-सामाजिक स्वप्न लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। अखबारों की भी भूमिका काफी साकारात्मक रही। समारोह की तैयारी के दौरान आरा शहर और गड़हनी व पवना नामक ग्रामीण बाजारों में चार नुक्कड़ कविता पाठ आयोजित किए गए, जिनमें नागार्जुन के महत्व और उनकी प्रासंगिकता के बारे में बताया गया तथा उनकी कविताएं आम लोगों को सुनाई गईं। अपने जीवन के संकटों और शासकवर्गीय राजनीति व संस्कृति के जरिए बने विभ्रमों से घिरे आम मेहनतकश जन इस तरह अपने संघर्षों और अपने जीवन की बेहतरी के पक्ष में आजीवन सक्रिय रहने वाले कवि की कविताओं से मिले। यह महसूस हुआ कि जो जनता के हित में रचा गया साहित्य है उसे जनता तक ले जाने का काम सांस्कृतिक संगठनों को प्रमुखता से करना चाहिए। यह एक तरह से जनता को उसी की मूल्यवान थाती उसे सौंपने की तरह था। 

नागार्जुन का भोजपुर से पुराना जुड़ाव था। साठ के दशक में वे पूर्वांचल नाम की संस्था के अध्यक्ष बनाए गए थे। जनांदोलनों में शामिल होने के कारण उन्हें बक्सर जेल में भी रखा गया था। नागार्जुन ने तेलंगाना से लेकर जे.पी. के संपूर्ण क्रांति आंदोलन तक पर लिखा, लेकिन भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन में तो जैसे उन्हें अपना जीवन-स्वप्न साकार होता दिखता था। ‘हरिजन गाथा’ और ‘भोजपुर’ जैसी कविताएं इसकी बानगी हैं।

बारिश दस्तक दे चुकी थी, उससे समारोह की तैयारी थोड़ी प्रभावित भी हुई। लेकिन इसके बावजूद 25 जून को नागरी प्रचारिणी सभागार में लोगों की अच्छी-खासी मौजूदगी के बीच समारोह की शुरुआत हुई। सभागार के बाहर और अंदर की दीवारों पर लगाए गए  नागार्जुन, शमशेर, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे कवियों की कविताओं पर आधारित राधिका  और अर्जुन द्वारा निर्मित आदमकद कविता-पोस्टर और बाबा नागार्जुन की कविताओं व चित्रों वाले बैनर समारोह स्थल को भव्य बना रहे थे। कैंपस और सभागार में बाबा की दो बड़ी तस्वीरें लगी हुई थीं। बाबा के चित्रों वाली सैकड़ों झंडियां हवा में लहरा रही थीं। 

समारोह का उद्घाटन करते हुए नक्सलबाड़ी विद्रोह की धारा के मशहूर कवि आलोकधन्वा  ने खुद को भोजपुर में चल रहे सामाजिक न्याय की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मनुष्य के लिए जितनी उसकी आत्मा अनिवार्य है, राजनीति भी उसके लिए उतनी ही अनिवार्य है। बेशक हमारा आज का दौर बहुत मुश्किलों से भरा है, लेकिन इसी दौर में नागार्जुन के प्रति पूरे देश में जैसी उत्कंठा और सम्मान देखने को मिला है, वह उम्मीद जगाता है। संभव है हम चुनाव में हार गए हैं, लेकिन जो जीते हैं, अभी भी विरोध के मत का प्रतिशत उनसे अधिक है। वैसे भी दुनिया में तानाशाह बहुमत के रास्ते ही आते रहे हैं। लेकिन जो शहीदों के रास्ते पर चलते हैं, वे किसी तानाशाही से नहीं डरते और न ही तात्कालिक पराजयों से विचलित होते हैं। भोजपुर में जो कामरेड शहीद हुए उन्होंने कोई मुआवजा नहीं मांगा। उन्होंने तो एक रास्ता चुना, कि जो समाज लूट पर कायम है उसे बदलना है, और उसमें अपना जीवन लगा दिया। आलोकधन्वा  ने कहा कि नागार्जुन इसलिए बडे़ कवि हैं कि वे वर्ग-संघर्ष को जानते हैं। वे सबसे प्रत्यक्ष राजनीतिक कवि हैं। आज उन पर जो चर्चाएं हो रही हैं, उनमें उन्हें मार्क्सवाद से प्रायः काटकर देखा जा रहा है। जबकि सच यह है कि नागार्जुन नहीं होते तो हमलोग नहीं होते। और खुद हमारी परंपरा में कबीर और निराला नहीं होते तो नागार्जुन भी नहीं होते। नागार्जुन की कविता बुर्जुआ से सबसे ज्यादा जिरह करती है। उनकी कविताएं आधुनिक भारतीय समाज के सारे अंतर्विरोधों की शिनाख्त करती हैं। नागार्जुन की काव्य धारा हिंदी कविता की मुख्य-धारा है। उनकी जो काव्य-चेतना है, वही जनचेतना है।

विचार-विमर्श के सत्र में ‘प्रगतिशील आंदोलन और नागार्जुन की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए जसम के राष्ट्रीय महासचिव प्रणय कृष्ण ने कहा कि जिन्हें लगता है कि प्रगतिशीलता कहीं बाहर से आई उन्हें राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोशांबी, हजारी प्रसाद द्विवेदी  और नागार्जुन की परंपरा को समझना होगा। सारी परंपराओं को आत्मसात करके और उसका निचोड़ निकालकर प्रगतिशील आंदोलन को विकसित किया गया। हिंदी कविता में तो बाबा प्रगतिशीलता की नींव रखने वालों में से हैं। नागार्जुन की काव्य यात्रा के विभिन्न पड़ावों का जिक्र करते हुए प्रणय कृष्ण ने कहा कि वे प्रगतिशीलता के आंदोलन के आत्मसंघर्ष के भी नुमाइंदे हैं। ऊंचे  से ऊंचे दर्शन को भी उन्होंने संशय से देखा। बुद्ध और गांधी पर भी सवाल किए। योगी अरविंद पर भी कटुक्ति की। वे किसी से नहीं डरते थे, इसलिए कि वे अपनी परंपरा में उतने ही गहरे धंसे हुए थे। बाबा शुरू से ही सत्ता के चरित्र को पहचानने वाले कवि रहे। नामवर सिंह 1962 के बाद के दौर को मोहभंग का दौर मानते हैं, लेकिन नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदार जैसे कवियों में 1947 की आजादी के प्रति कोई मोह नहीं था, कि मोहभंग होता। स्वाधीनता आंदोलन के कांग्रेसी नेतृत्व में महाजनों-जमींदारों के वर्चस्व को लेकर इन सबको आजादी के प्रति गहरा संशय था। नागार्जुन ने तो कांग्रेसी हुकूमत की लगातार आलोचना की। दरअसल प्रगतिशीलता की प्रामाणिक दृष्टि हमें इन्हीं कवियों से मिलती है। तेलंगाना के बाद साठ के दशक के अंत में नक्सलबाड़ी विद्रोह के जरिए किसानों की खुदमुख्तारी का जो संघर्ष नए सिरे से सामने आया, उसने प्रगतिशीलता और वर्ग संघर्ष को नई जमीन मुहैया की और सत्तर के दशक में जनांदोलनों ने नागार्जुन सरीखे कवियों को नए सिरे से प्रासंगिक बना दिया। बीसवीं सदी के हिंदुस्तान में जितने भी जनांदोलन हुए, नागार्जुन प्रायः उनके साथ रहे और उनकी कमजोरियों और गड़बडि़यों की आलोचना भी की। लेकिन नक्सलबाड़ी के स्वागत के बाद पलटकर कभी उसकी आलोचना नहीं की। जबकि संपूर्ण क्रांति के भ्रांति में बदल जाने की विडंबना पर उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा। आज जिस तरीके से पूरी की पूरी राजनीति को जनता से काटकर रख दिया गया है और जनता को आंदोलन की शक्ति न बनने देने और बगैर संघर्ष के सत्ता में भागीदारी की राजनीति चल रही है, तब जनता की सत्ता  कायम करने के लिहाज से नागार्जुन पिछले किसी दौर से अधिक प्रांसगिक हो उठे हैं। 

रामायण राम ने नागार्जुन की कविता ‘हरिजन-गाथा’ को एक सचेत वर्ग-दृष्टि का उदाहरण बताते हुए कहा कि इसमें जनसंहार को लेकर कोई भावुक अपील नहीं है, बल्कि एक भविष्य की राजनैतिक शक्ति के उभार की ओर संकेत है। उत्तर भारत में दलित आंदोलन जिस पतन के रास्ते पर आज चला गया है, उससे अलग दिशा है इस कविता में। एक सचेत राजनैतिक वर्ग दृष्टि के मामले में इससे साहित्य और राजनीति दोनों को सही दिशा मिलती है। 

समकालीन जनमत के प्रधन संपादक रामजी राय ने ‘भोजपुर’ और नागार्जुन का जीवन-स्वप्न विषय पर बोलते हुए कहा कि नागार्जुन अपने भीतर अपने समय के तूफान को बांधे हुए थे। मार्क्सवाद में उनकी गहन आस्था थी। अपनी एक कविता में उन्होंने कहा था कि बाजारू बीजों की निर्मम छंटाई करूंगा। जाहिर है उनके लिए कविता एक खेती थी, खेती- समाजवाद के सपनों की। भोजपुर उन्हें उन्हीं सपनों के लिए होने वाले जनसंघर्षों के कारण बेहद अपना लगता था और इसी कारण भगतसिंह उन्हें प्यारे थे। वे भारत में इंकलाब चाहते थे। उसे पूरा करना हम सबका कार्यभार है। 

अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन
विचार-विमर्श सत्र की अध्यक्षता डा. गदाधर सिंह, जलेस के राज्य सचिव कथाकार डा. नीरज सिंह, प्रलेस के राज्य उपाध्यक्ष आलोचक डा. रवींद्रनाथ राय और जसम के राज्य अध्यक्ष आलोचक रामनिहाल गुंजन ने की। संचालन सुधीर सुमन ने किया। डा.रवींद्रनाथ राय ने समारोह की शुरुआत में स्वागत वक्तव्य दिया और जनता के राजनैतिक कवि नागार्जुन के जन्मशताब्दी पर भोजपुर में समारोह होने के महत्व के बारे में चर्चा की। डा. गदाधर  सिंह ने छात्र जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए कहा कि उनके कविता पाठ में छात्रों की भारी उपस्थिति रहती थी। वे एक स्वतंत्रचेत्ता प्रगतिशील कवि थे।  उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल, मजाज और गोपाल सिंह गोपाली पर केंद्रित समकालीन चुनौती के विशेषांक का लोकार्पण भी किया। डा. नीरज सिंह ने कहा कि बाबा नागार्जुन सीधे-सीधे किसान आंदोलन में शामिल हुए और किसान-मजदूरों की मानसिकता को जिया। वे चाहते थे कि परिवर्तन जब भी हो, मजदूर-किसानों के लिए हो। बाबा ने अपनी कविताओं के जरिए जनांदोलनों को शक्ति दी। रामनिहाल गुंजन ने कहा कि बाबा हमारे दौर के जनपक्षध्र साहित्यकारों और जनता की राजनीति करने वालों के लिए बड़े प्रेरणास्रोत हैं। सही मायने में उन्होंने ही कविता को जनता के संघर्षों का औजार बनाया। कथाकार सुरेश कांटक ने एक संस्मरण सुनाया कि किस तरह बाबा को जब खून की जरूरत पड़ी, तो संयोगवश जिस नौजवान का खून उनसे मिला, वह भोजपुर का निवासी था। इस नाते भी बाबा कहते थे कि उनकी रगों में भोजपुर का खून दौड़ता है।

मदन कश्यप
दूसरे सत्र की शुरुआत युवानीति द्वारा बाबा की चर्चित कविता ‘भोजपुर’ की नाट्य प्रस्तुति से हुई। उसके बाद कवि जितेंद्र कुमार की अध्यक्षता और कवि सुमन कुमार सिंह के संचालन में कविता पाठ हुआ, जिसमें कृष्ण कुमार निर्मोही, श्रीराम तिवारी, रामनिहाल गुंजन, जगतनंदन सहाय, दीपक सिन्हा, कुमार वीरेंद्र, संतोष श्रेयांश, ओमप्रकाश मिश्र, सरदार जंग बहादुर, सुनील चैध्री, रहमत अली रहमत आदि ने अपनी कविताओं का पाठ किया। समारोह स्थल पर एक बुक स्टाल  भी लगाया गया था। समारोह में शामिल होने के लिए उत्तर बिहार के जसम के साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी सुरेंद्र प्रसाद सुमन के नेतृत्व में भोजपुर पहुंचे थे। 24 जून को इन लोगों ने अपनी सांस्कृतिक यात्रा की शुरुआत बाबा नागार्जुन के ननिहाल सतलखा चंद्रसेनपुर से की थी, जहां एक सभा में उनके ननिहाल के परिजनों ने उनकी मूर्ति स्थापना, पुस्तकालय और उनके नाम पर एक शोध संस्थान बनाने के लिए एक कट्ठा जमीन देने की घोषणा की। उसके बाद साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी दरभंगा और समस्तीपुर में सभा करते हुए पटना पहुचे  और फिर 25 को नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में शामिल हुए। समारोह में जसम राष्ट्रीय पार्षद संतोष सहर, जसम बिहार के सचिव संतोष झा, कवि राजेश कमल, संस्कृतिकर्मी समता राय, प्रो. पशुपतिनाथ सिंह आदि भी मौजूद थे। 

समारोह में बाबा नागार्जुन की कविता पाठ का वीडियो प्रदर्शन और कवि मदन कश्यप का काव्य-पाठ भी तय था। लेकिन ट्रेन में विलंब के कारण ये कार्यक्रम अगले दिन स्थानीय बाल हिंदी पुस्तकालय में आयोजित किए गए। कवि-फिल्मकार कुबेर दत्त द्वारा बनाई गई नागार्जुन के काव्य पाठ के वीडियो का संपादन रोहित कौशिक ने किया है और इसके लिए शोध कवि श्याम सुशील ने किया है। करीब 13 मिनट का यह वीडियो नागार्जुन के सरोकार और कविता व भाषा के प्रति उनके विचारों का बखूबी पता देता है। बाबा इसमें मैथिली और बांग्ला में भी अपनी कविताएं सुनाते हैं। एक जगह इसमें नागार्जुन कहते हैं कि कविता में अगर कवि को गुस्सा नहीं आता, अगर वह नीडर नहीं है, डरपोक है, तो बेकार है। मैं नहीं मानता हूं। इस वीडियो में बाबा नागार्जुन को कविता कविता पाठ करते देखना और उनके विचारों को सुनना नई पीढ़ी के लिए एक रोमांचक और उत्प्रेरक अनुभव था।  

मदन कश्यप के एकल कविता पाठ की अध्यक्षता नीरज सिंह और रामनिहाल गुंजन ने की तथा संचालन कवि जितेंद्र कुमार ने किया। उन्होंने गनीमत, चाहतें, थोड़ा-सा फाव, सपनों का अंत और चिडि़यों का क्या नामक अपनी कविताओं का पाठ किया। उनकी कुछ काव्य-पंक्तियां गौरतलब हैं- 

सपने के किसी अंत का मतलब
स्वप्न देखने की प्रक्रिया का अंत नहीं है।
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गनीमत है
कि पृथ्वी पर अब भी हवा है
और हवा मुफ्त है...
गनीमत है 
कि कई पार्कों में आप मुफ्त जा सकते हैं
बिना कुछ दिए समुद्र को छू सकते हैं
सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य देख सकते हैं
गनीमत है 
कि गनीमत है। 

इस तरह नागार्जुन जन्मशताब्दी  समारोह तीन दिनों तक चला, जो बाबा के जन्मस्थान सतलखा चंद्रसेनपुर से शुरू होकर भोजपुर में उनके महत्व और प्रासंगिकता पर विचार विमर्श से गुजरते हुए उनपर केंद्रित वीडियो के प्रदर्शन के साथ संपन्न हुआ। यद्यपि भोजपुर के सांस्कृतिक जगत के लिए तो पूरा हफ्ता ही नागार्जुनमय रहा।  

  योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सुधीर सुमन,
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
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