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आरा में नागार्जुन पर आयोजन और सुधीर सुमन की डायरी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, जून 21, 2011 | मंगलवार, जून 21, 2011

 आयोजन के पहले :-
तीन दिन से बारिश हो रही है। बादल बड़े प्रिय थे नागार्जुन को। बादल को हम घिरते हुए ही नहीं, बल्कि लगातार घेरा  डाले हुए देख रहे हैं। मौसम बदल गया है। आरा शहर में वार्ड पार्षद नगर निगम के गेट पर लगातार भ्रष्टाचार के सवाल पर धरना दिए हुए हैं, पूरे शहर की सफाई की मांग कर रहे हैं। बारिश होते ही नगर की नालियां सड़कों पर उमड़ पड़ी हैं। मुहल्लों में कीचड़ से होकर पहले भी गुजरना पड़ता था, आज भी गुजरना पड़ रहा है। बिजली तो वैसे भी किसी एहसान जताने वाले दोस्त की तरह आती है, जब तेज हवा के साथ बारिश हो, तब उसकी आंख-मिचैली देखने लायक होती है। मोबाइल भी पूरी तरह चार्ज नहीं हो पा रहा है। लेकिन गरमी से निजात मिली है, हरियाली से मन को सुकून मिल रहा है। बारिश अच्छी लग रही है, पर थोड़ी चिंता भी बढ़ रही है। 25 जून को  यहां के नागरी प्रचारिणी सभागार में बाबा नागार्जुन का जन्मशताब्दी समारोह होना है। पिछले साल 25-26 जून को समस्तीपुर और बाबा के गांव तरौनी से समारोहों के सफर की जो शुरुआत हुई थी, उसकी मंजिल हमने भोजपुर ही तय की थी। समारोह की तैयारी बाधित हो रही है, क्या करें! कितना अच्छा होता कि बादल रात में बरस के चले जाते और दिन हमारे लिए छोड़ देते, मगर उनकी तो अपनी गति है, अपना चाल है, अपनी मर्जी है।


बाबा की कविताओं का पाठ नुक्कड़ पर :-आज 20 जून है। आज से बाबा की कविताओं का नुक्कड़ों पर पाठ करना है। कल रविवार था। किसी भी आयोजन के लिए रविवार का दिन बड़ा अहम होना होता है। सहयोग जुटाने के लिए लोगों से मिलने जाइए, तो उनसे मुलाकात की संभावना रहती है। लेकिन रविवार की झमाझम बारिश, उसी में एक प्रेस कांफ्रेस। हम चाहते थे कि भोजपुर के  तमाम सांस्कृतिक संगठनों और स्वंतत्र लेखक-बुद्धिजीवी भी जनता को संबोधित करें, लेकिन बारिश में किस पर जोर डालें। हम आयोजक हैं, लिहाजा हमें तो किसी तरह पहुंचना ही था। अब बाबा की कविताओं को लेकर सीधे जनता के बीच जाना है और बारिश है कि होड़ लिए हुए है! दोपहर बाद तीन बजे का समय तय है, आरा रेलवे स्टेशन के परिसर में पहुंचना है।

अरे वाह! बारिश तो थम गई। रेलवे स्टेशन से करीब मैं ही हूं। अभी-अभी वरिष्ठ आलोचक रवींद्रनाथ राय का काॅल आया- मैं घर से निकल रहा हूं। तीन तो बज गए। पता नहीं, कोई आया है या नहीं, आएगा तो काॅल तो करेगा ही, लपककर निकल लूंगा, यही सोचकर मुख्य समारोह के आमंत्रण पत्र को लिफाफे में डालने में व्यस्त हो गया। अरे, साढ़े तीन बज गए, बारिश के कारण शुरुआत ही गड़बड़ाएगी क्या! चलो चला जाए, शायद लोग थोड़ी देर में आएं। बैनर उठाया और चल दिया। स्टेशन पर भारी भीड है़, लग रहा है, देर से कोई ट्रेन नहीं आई। इतनी भीड़ में कौन कहां है, कैसे पता चले। अचानक किसी का हाथ कंधे पर पड़ता है। अरे, मुझसे भी पहले जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन हाजिर हैं, एकदम हमेशा समय पर पहुंचने के अपने रिकार्ड को बरकरार रखते हुए। बाकी लोग कहां हैं, भाई। मिस्ड काॅल मारता हूं। 5 मिनट हो गए, किसी ने पलटकर काॅल नहीं किया। अरे यार तुम यहां क्या कर रहे हो, तुम्हें तो नगर निगम के गेट पर होना चाहिए था- अचानक सत्यदेव दिखाई पडत़े हैं, तो उनकी ओर लपकता हूं। छात्र राजनीति में रहे, हमलोगों के साथ नाटक भी किया। तो हम दो से तीन हो गए। और अब चार भी हो गए, दूर से ही नजर आने वाले हमारे लंबू साथी शमशाद प्रेम अपनी बाइक से उतरकर हमारी ओर रहे हैं। 

सबके पहुंचने के बाद पहुंचने के अपने रिकार्ड को उन्होंने ध्वस्त कर दिया। आखिरकार हमारे उत्साही साथी सुनील चैधरी भी गए। रवींद्रनाथ राय भी पहुंच गए। कवि सुमन कुमार सिंह कहां हैं, जल्दी बुलाइए भाई, बारिश थमी है, वर्ना फिर शुरू हो गई तो बड़ी मुश्किल होगी। सुमन तो स्कूल से घर गए होंगे, खाना खाकर चले होंगे। मोबाइल से बात होती है- रहे हैं, रास्ते में हैं। आखिर वह भी गए, लेकिन उनके पीछे-पीछे बारिश की हल्की फुहार भी आई। हम सब प्लेटफार्म की ओर भागे। लेकिन पांच मिनट बाद ही वापस बाहर गए। बारिश ने हमंे मोहलत दे दी। एक और शख्स का इंतजार है, उनकी नागार्जुन से मुलाकात हुई थी। काॅल करिए भाई, देखिए कहां हैं। सुनील बताते हैं- स्वीच आॅफ है। तो चलिए शुरू किया जाए।


बाबा मतलब नागार्जुन के हित चिंतन करने लोग पहूंचने लगे आरा:-रेलवे स्टेशन परिसर में दो पेड़ों से बैनर को बांध दिया जाता है। थोड़ी देर विचार-विमर्श चलता है। नागार्जुन के किसी गीत से शुरुआत की जाए या उनके बारे में कुछ बताते हुए कविता पाठ का सिलसिला शुरू किया जाए। दूसरा तरीका ही अपनाया जाता है। सुनील संचालन शुरू करते हैं- आज जबकि देश के हुक्मरान भ्रष्टाचार और लूट में डूबे हुए हैं और उसे बरकरार रखने के लिए हर किस्म की तिकड़म और दमन पर उतारू हैं, तब नागार्जुन जैसे जनकवि नए सिरे से प्रासंगिक लगने लगते हैं। इसी तिकड़म, भ्रष्टाचार और दमन के खिलाफ तो उन्होंने आजीवन लिखा। सुनील बोल रहे हैं, लोग धीरे-धीरे हमारे आस-पास जुट रहे हैं। सत्यदेव जन्मशताब्दी समारोह में लोगों के शामिल होने की अपील वाला पर्चा लोगों के बीच बांटने लगते हैं। इसी बीच वे पहुंच जाते हैं, जिनका हमें इंतजार था। माथे पर लाल पगड़ी बांधे, उघारे बदन, हाथ में एक छोटा डंडा लिए। थैला भी लाल रंग का। ये किसान नेता स्वामी सहजानंद सरस्वती के अनुयायी हैं, हमेशा इसी वेशभूषा में रहते हैं। अपने हर भाषण में वे नागार्जुन की कविताकिसकी है जनवरी, किसका अगस्त हैका बड़े प्रभावशाली अंदाज में इस्तेमाल करते हैं। किसान नेता आग्रेनंद चैधरी बोलना शुरू करते हैं, लोगों की तादाद बढ़ने लगती है। 

आग्रेनंद जी बताते हैं कि 1982 में पहली बार उनकी मुलाकात नागार्जुन जी से हुई थी। वे बताते हैं कि वे किसान मजदूर के कवि थे और उन्हीं की तरह रहते थे। सचमुच जनता के कवि थे। हमारे इर्द-गिर्द जो जनसमूह मौजूद है, मानो उसके दुख-ददर्, उसके मन की बात, उसके ही अनुभवों को आग्रेनंद जी के भाषण में सामने रहा है, यह उनके चेहरे और प्रतिक्रियाओं से जाहिर हो रहा है। आग्रेनंद जी कहते हैं कि जितनी भी सरकारें हैं वे किसान विरोधी हैं। वे अमीरों और गरीबों के बीच भेदभाव को बढ़ा रही हैं। बाबा नागार्जुन ने इसी भेदभाव के खिलाफ लिखा था। जनता के इतने बड़े कवि के जन्म की सौंवी वर्षगांठ की याद सरकारों को नहीं आती। जनता के लिए वे जरूरी हैं, इसलिए वह उनको याद कर रही है। आग्रेनंद जी, अपने छोटे-से वक्तव्य में भारत में व्यवस्थाजनित व्यवस्थाओं पर बड़े प्रभावशाली ढंग से सवाल उठाते हैं। 

इस सिलसिले को प्रलेस, बिहार के राज्य उपाध्यक्ष रवींद्रनाथ राय आगे बढ़ाते हैं। बाबा को जनता का महान राजनैतिक कवि बताते हुए वे लोगोें को याद दिलाते हैं कि नागार्जुन ने हमेशा भारतीय राजनीति के गरीब-विरोधी प्रवृत्तियों, परिवारवाद, मौकापरस्ती, लूट, भ्रष्टाचार और तानाशाही का विरोध किया। अपने वक्तव्य के अनुरूप ही वे बापू के बंदरों के कारनामों को लेकर लिखी गई नागार्जुन की कविता सुनाते हैं। भाषण तो हमने उनका प्रायः सुना है नुक्कड़ों और चैराहों पर, पर इतने प्रभावी ढंग से कविता का पाठ करते हुए पहली बार सुन रहे हैं।

सामने जनता है और रचनाकार जैसे अपने जकड़न को झाड़कर नए आवेग से खड़े हो रहे हैं। सुमन कुमार सिंह पाठ के लिहाज से एक कठिन कविता चुनते हैं- मंत्र और उसी पूरी ताकत से प्रस्तुत करते हैं। वे ध्यान दिलाते हैं कि बाबा हर तरह के पाखंड और छद्म के विरोधी थे। युवा कवि ओमप्रकाश मिश्र मानो नई पीढ़ी के रचनाकारों की तरफ से हिंदी कविता और समाज को आश्वासन देते हैं कि उसने अपनी प्रगतिशील-जनवादी परंपरा से नाता नहीं तोड़ा है, उसके प्रेरणास्रोत नागार्जुन जैसे कवि ही है। वे सुनाते हैं- जो नहीं हो सके पूर्ण काम, मैं उनको करता हूं प्रणाम।

संचालक मुझे भी मौका देते हैं और मैं मेहनतकश जनता के राष्ट्र निर्माण के लिए इंकलाब का सपना देखने वाले इस कवि की मशहूर कविताभोजपुरसुनाता हूं।हम सब लगातार लोगों से अपील करते हैं कि वे 25 जून को बाबा नागार्जुन जन्मशताब्दी समारोह में ज्यादा से ज्यादा संख्या में शामिल हों। कोई माइक और लाउडस्पीकर नहीं है, पूरी ताकत से बोलना पड़ता है। उसी उंची पिच पर कविता का पाठ भी किया गया। बीच-बीच में रेलवे की उद्घोषणाएं भी होती रहीं, लेकिन कोई बाधा कविता और जनता के बीच के रिश्ते के आड़े नहीं पाई।

कविता पाठ अपनी मंजिल पर पहुंचता है और बादलों द्वारा तय समय सीमा मानो खत्म होती है। मेघ बज नहीं रहे, बरस रहे हैं।अलावपत्रिका में छपे एक सज्जन का लेख की याद हो आती है, जिसमें उन्होंने साबित करने की कोशिश की है कि नागार्जुन जनकवि होने पर बार-बार जोर देते हैं, पर वे जनकवि नहीं हैं। सवाल तो यह भी है कि वे किस तरह के जनकवि हैं। अगर ऐसी परिस्थितियां हैं जो जनता को उसके लिए हितकर कविता से दूर करती हैं, तो मामला तो उन परिस्थितियों को बदलने का और उस कविता को जनता तक ले जाने का भी है। लौटते वक्त एक पढ़े-लिखे परिचित मित्र धीरे से बताते हैं कि इतनी बारकिसकी जनवरी है किसका अगस्त सुना है, पर नहीं पता था कि यह नागार्जुन का लिखा हुआ है।


जनता के कवि के लिए जनता के पैसों से आयोजन :-कविता पाठ सफल रहा, पर अभी बहुत कुछ करना है। समारोह के लिए जो धन जुटा है, वह अभी बिल्कुल अपर्याप्त लग रहा है। सारे लोग सोच रहे हैं कि और सहयोग कैसे जुटाया जाए। कल से सीधे लोगों के बीच चंदे का डब्बा लेकर जाना है और हर छोटा-बड़ा सहयोग जुटाना है। जनता के कवि के लिए समारोह तो जनसहयोग से ही होगा। हमारे लिए यह कोई रस्मी आयोजन नहीं है। बेशक मौका बाबा के जन्मशताब्दी वर्ष के समापन का है। मगर हमारा मकसद तो जनता की कविता को जनता तक ले जाना है, इस दिशा में मिली हर सफलता हमारे लिए सार्थकता है। अखबार हमारे इस अभियान को महत्व दे रहे हैं, यह सुखद लग रहा है। पिछले दो तीन दिन से लगातार जन्मशताब्दी समारोह की खबरें अखबारों में रही हैं। आखिर बाबा सिर्फ जन संस्कृति मंच के तो हैं नहीं, वे तो सबके हैं, उन सबके जो इस व्यवस्था से असंतुष्ट हैं, जो इस देश और देश की मेहनतकश जनता की जिंदगी को बेहतर बनाना चाहते हैं, जिन्हें इस धरती से सचमुच प्यार है। पहलकदमी जरूर जसम की है, लेकिन भोजपुर में यह आयोजन जनता का अपना आयोजन बन जाए, इसके लिए हम सब प्रयासरत हैं। हम तो चाहते हैं कि अखबार खुद बाबा नागार्जुन के महत्व पर अपनी ओर से कुछ दें, उनके जमाने के लोगों के संस्मरणों को प्रकाशित करे, उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा करवाएं। हमें तो जो करना है, अपनी क्षमता अनुसार कर ही रहे हैं।जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष रामनिहाल गुंजन नागार्जुन पर केंद्रित अपनी कविता सुनाते हैं, जिसमें उनकी कई रचनाओं के पात्रों का नाम भी आता है। गुंजन जी उनको हमारे वर्तमान दौर के लिए बेहद प्रासंगिक कवि बताते हैं।

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



सुधीर सुमन,
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
sudhir.suman@yahoo.co.in
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