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सुमीत द्विवेदी की कविता:-गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं

Written By Manik Chittorgarh on शुक्रवार, जून 24, 2011 | शुक्रवार, जून 24, 2011

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
ग्राम प्रधान, बीडीओ, तहसीलदार से लेकर
डीएम, सचिव और मंत्री जी
सभी रिश्वत खा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और दलाल बन बैठे वकील, जज साहिबान
अदालतों मे हत्यारों-अपराधियों को बेझिझक छुड़ा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और आईजी, डीआईजी से लेकर
एसपी, एसएसपी और थानेदार तक
चोर-उचक्कों, डाकुओं को निर्दोष,
तो मासूम भोले-भाले लोगों को शातिर अपराधी बता
एनकाउंटर का खेल चला रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और बड.ी-बड.ी अटटालिकाओं में बैठे
सेठ-साहूकार पब्लिक को चूतिया बना रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और धरती के भगवान बन बैठे डाक्टर साहब
सरकारी अस्पताल छोड., नर्सिंग होम में
सौ का हजार दस हजार बना रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और तीस परसेंट ओवरडोज के चक्कर में इंजीनियर साहब
रददी माल को एकदम परफेक्ट बता
कान्ट्रेक्ट पर कान्ट्रैक्ट पास किए जा रहे हैं।

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और उनकोे मुस्कुराता देख, हम भी जम के मुस्कुरा रहे हैं
धोती कुर्ता स्वदेशी कौन कहे
विदेशी ब्रांड, सुपर-ब्रांड के चक्कर में, सब पगलाए जा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
नेता जी घोटालों की रिटेल चेन चला रहे हैं
और देश निकाला देकर गांधी जी को ही स्विस बैंक भेजवा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
धर्म जाति के नाम पर बंटे देश में
स्वार्थवश गुलाब के फूल के साथ मिठाई के डिब्बे
तो निःस्वार्थ भाव से चाकू तलवार गोली के गिफ्ट
खुद-ब-खुद पहुंचाए जा रहे हैं

नोटों पर छपे गांधी जी मुस्कुरा रहे हैं
और लगातार मुस्कुरा रहे हैं
मैने सोचा क्या वाकई मुस्कुरा रहे हैं
नोट को अलट-पलट कर देखा तो मुस्कुराते दिखे
ध्यान से झांक कर देखा तो भी मुस्कुराते दिखे

मैने सोचा राजघाट जाकर सीधे बापू से पूंछा जाए
आखिर क्यों मुस्कुरा रहे हैं,
जबकि देश और देशवासी सीधे गर्त की तरफ जा रहे हैं

राजघाट पहुंचा
देखा कि बापू की समाधि के चारों तरफ पानी ही पानी जमा है
सोचा बरसात का पानी होगा
पूंछा तो पता चला पानी गिरा ही नहीं, और नल वगैरह भी ठीक है
फिर ये पानी आया कैसे

ध्यान से देखा तो चौंक गया
बापू रो रहे थे
समाधि पर लिखे ’हे राम’ के नीचे से आंसू टपक रहे थे

मैने बापू से पूंछा
 यहां आप रो रहे हैं
लेकिन बाकी जगह तो मुस्कुरा रहे हैं
क्यों

बापू ने कहा - बेटा क्या करूं
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है
न चाहते हुए भी पहले राष्ट्रपिता बना दिया
फिर हर जगह हंसते हुए दिखा दिया
मैं तो 47 से ही रो रहा हूं
जब
देश बंटा, देश के लोग बंटे
आचार विचार व्यवहार बंटे
आजाद देश में
जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन में
जनता पर ही अत्याचार बढे.
फिरंगियों ने नहीं
अपनों ने ही ’अपनों के लिए’ अपनों का खून लिया चूस
फिर सब कुछ ठीक दिखे, इसलिए मुझे हर जगह दिया ठूंस

मुझे जहां जितना हंसाया
मैं वाकई में वहां उतना ज्यादा रोया

आज मैं तेरा शुक्रगुजार हूं ’नाथू’
तूने मुझे पल-पल मरने से बचाया
बस मैं उस दिन को कोसता हूं
जब मैनें कहा था कि -
’मेरी आत्मा इस देश के कण-कण में बसती है’
कहते-कहते
¬’हे राम’ के नीचे से आंसुओं  का सैलाब सा बहने लगा

मैं बैठा रहा, सोचता रहा

शायद
अब महात्मा की आत्मा
 देश के कण-कण में नहीं
केवल राजघाट पर ही बसती है



 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

‘द जर्नलिस्ट - ए मीडिया रिसर्च जर्नल‘ के संपादक हैं और साथ ही 
स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जाते हैं .पूरा परिचय 
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