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अशोक जमनानी की दो नई कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जून 18, 2011 | शनिवार, जून 18, 2011


कितना अँधेरा है




मैं जानता  हूँ
मुझे देखकर लोग
मुस्कराते हैं 
तुम्हें देखकर भी लोग
मुस्कराते होंगे 
पर कितना अँधेरा है 
इन मुस्कराहटों के पीछे 
जिसे पाकर खुश हैं वो  
और  न जाने क्यों 
किसी ने नहीं लिया 
कुछ भी 
हमारे बेशकीमती
उजाले से ......


'मैं नग्न हूँ'


मैं नग्न हूँ

मुझे नहीं मिल रहा आसमान 
निर्वस्त्र
भयभीत
लज्जित
प्रतीक्षारत
कि मिलेगा जब
ओढ़कर उसे 
स्वयं को निहार सकूँगा 
मैं तब 
साथ ही समस्त संसार की
चकित दृष्टि 
देखेगी 
मेरी देह 
अंत:करण 
और आत्मा पर 
अनंत कोटि आकाश सा 

वह वस्त्र प्रेम का ...........


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
प्रबंध सम्पादक अशोक जमनानी 
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1 टिप्पणी:

  1. दोनों ही रचनायें बहुत गहन ...बहुत बढ़िया. आभार.

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'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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