अशोक जमनानी की दो नई कवितायेँ - अपनी माटी Apni Maati

India's Leading Hindi E-Magazine भारत की प्रसिद्द साहित्यिक ई-पत्रिका ('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

अशोक जमनानी की दो नई कवितायेँ


कितना अँधेरा है




मैं जानता  हूँ
मुझे देखकर लोग
मुस्कराते हैं 
तुम्हें देखकर भी लोग
मुस्कराते होंगे 
पर कितना अँधेरा है 
इन मुस्कराहटों के पीछे 
जिसे पाकर खुश हैं वो  
और  न जाने क्यों 
किसी ने नहीं लिया 
कुछ भी 
हमारे बेशकीमती
उजाले से ......


'मैं नग्न हूँ'


मैं नग्न हूँ

मुझे नहीं मिल रहा आसमान 
निर्वस्त्र
भयभीत
लज्जित
प्रतीक्षारत
कि मिलेगा जब
ओढ़कर उसे 
स्वयं को निहार सकूँगा 
मैं तब 
साथ ही समस्त संसार की
चकित दृष्टि 
देखेगी 
मेरी देह 
अंत:करण 
और आत्मा पर 
अनंत कोटि आकाश सा 

वह वस्त्र प्रेम का ...........


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
प्रबंध सम्पादक अशोक जमनानी 

1 टिप्पणी:

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here