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दिलीप भाटिया का निबंध 'समय उवाच'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जून 02, 2011 | गुरुवार, जून 02, 2011


मै समय हूँ। अंग्रेजी में मुझे ‘‘टाइम‘‘ कहते हैं। इस भौतिक प्रदूषित तनावग्रस्त वातावरण में मेरे लिए भी विकट मंदी का दौर चल रहा है। संजय भैया को वृद्ध पिताजी केा डॉक्टर के पास ले जाने के लिए समय नही है। कमला बाई को एक काम और बता दिया तो अभी टाइम नहीं है मेमसाहब कहकर चल देंगी। रचनादी के पास भाई की तबियत पूछने के लिए समय नही हैं। युवराज क्लब पार्टी से आकर रात केा दो बजे नींद की गोली खाकर सोया है, इसलिए उसके पास सुबह प्राणायाम करने के लिए समय नहीं है। मंजरी बेटी सहेलियों से मोबाइल पर इतनी अधिक डूबी रहती है कि उसे पापा के दुखते सिर या मम्मी के दर्द से छटपटाने पर भी दो घड़ी बात करने का समय नहीं है। चेतन मोटरबाइक पर लडकियों के पीछे चक्कर काटने में इतना पागल है, कि उसे यह भी ध्यान नहीं है कि सुबह बहन ने शाम को मन्दिर जाने के लिए कहा था। डॉली मेमसाहब को किटी पार्टी में जाना है, इसलिए बच्चों के स्कूल से लौटने वाले समय पर घर पर नही रह सकती। शेखर साहब ऑफिस में ही डूबे रहते हैं, कि किसी प्रकार इस वर्ष चीफ इंजीनियर बन जाएं, इसलिए उन्होने एक सप्ताह से अपने बच्चों तक से बात करने का समय नहीं निकाला। बेटा बहू पोता पोती भरा पूरा परिवार होते हुए भी बूढ़ी मां सबके हाथ जोड़ती रहती है कि किसी के पास समय हो तो उसका टूटा चश्मा ठीक करवा दे।

देखा आपने, सच तो कड़वा लगा ना, पर बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ा था कि समय डॉक्टर है, दवा है, मरहम है, मूल्यवान है, बीता हुआ समय लौट कर नहीं आता इत्यादि भूल गए क्या ? समय यानी मैं निरन्तर गतिमान हूँ। गांधी, टेरेसा, कलाम, नेहरू, शिक्षक, गृहिणी, छात्र, पुजारी, बाई, मजदूर, क्लर्क, सी.एम.डी. सभी केा प्रकृति समान रूप से प्रतिदिन 24 घंटे ही देती है एवं रहेगी। इस नश्वर संसार में हर व्यक्ति के जीवन में मेरा काल निश्चित है। मैं सबको सुलभ हूँ। यह आप पर निर्भर है कि मेरा सदुपयोग करते हो या दुरूपयोग। मुझ पर कई पुस्तकें लिखी जा रही हैं। मुझ पर लिखी पुस्तकें आजकल ‘‘हॉट केक‘‘ की तरह खरीदी जा रही हैं, पर उन्हें पढ़ने का समय कहां है किसी के पास। मैं अलमारी के पिंजडे़ में कैद हो कर रह जाती हूँ।

विद्यार्थियों ! समय-सारिणी बनाकर हर विषय पढ़ो। मेरा दुरूपयोग टी.वी., कम्प्यूटर गेम, मोबाइल पर मत करो, पढ़ाई पर ध्यान दो, पूरा कोर्स करो, नोट्स बनाओं। मेरा प्रातःकाल तुम्हारी पढ़ाई के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परीक्षा में भी मेरा पूरा ध्यान रखो। जितना पूछा है, उतना ही लिखोगे तो मेरी कमी कभी महसूस नहीं होगी, उत्तर एक बार स्वंय चेक कर लो, मुझ पर नियंत्रण अपने पास रखो। सात्विक आहार लो, स्वास्थ्य ठीक रखो, अच्छे कार्याें में मुझे लगााओं, अच्छी पुस्ताकें पढो़, रचनात्मक कार्य करो, अच्छे गुण सीखो, हर कक्षा में मैं तुम्हे एक वर्ष के लिए ही उपलब्ध हूँ। मुझे नष्ट करोगे तो पीछे रह जाओगे। चरित्र, स्वास्थ्य, पढ़ाई इन तीन मुख्य बातों पर ध्यान दोगे तो मैं तुम्हें कम समय में भी अच्छे मीठे स्वादिष्ट फल दूंगा।

गृहिणियों ! तुम पूरे परिवार की सेवा में डूबी रहती हो, तुम मुझे भी तो अपने लिए कुछ करने का सोचो। अपने लिए अपने स्वास्थ्य के लिए मुझे समझो। आधा घंटा मनपसंद संगीत-साहित्य में डूबों। स्वास्थ्य ठीक रखो, संतुलित आहार लो, तुम्हें भी मैं पूरे 24 घंटे सुलभ हूँ। अपने तन-मन को स्वस्थ रखने के लिए अपनी व्यस्त दिनचर्या में एक घंटा मुझे भी तो दो।

कामकाजी महिलाओ ! स्कूल एवं घर गृहस्थी की दो नावों पर पैर रखकर तुम निश्चय ही तन मन से थक जाती हो। मैं तुम्हारे पकड़ में ही नहीं आ पाता हूँ। मेरी कमी का सबसे अधिक रोना तुम ही रोती हो।क्यों इतनी तनावग्रस्त रहती हो ? तुम्हें कई काम समानान्तर करने होते हैं, फिर भी स्कूल में भी डांट खाती हो एवं घर में भी आंसू बहाती हो, मन को मारती हो, तन को गलाती हो, छोटे बच्चे क्रेच में पलते हैं, महीने भर का राशन बाई 15-20 दिन में खत्म कर देती है। तुम्हारी अपनी ही संतान तुम्हें ‘मिस‘ करती हैं। मैं तुम्हारे लिए बहुत मूल्यवान हूँ। वेतन के बजट के समान तुम स्वयं मेरा बजट भी बनाओं, सबके साथ स्वयं को भी समय दो, तुम तन मन से स्वस्थ रहोगी तभी दोनो नावों केा सही मंजिल तक पहुंचा सकोगी। अपने लिए सोचो एवं करो भी।
हे शक्तिमान पुरूष ! पत्नी बच्चांे को मेले में ले गए क्या ? बच्चों के स्कूल की कापी देखी क्या ? युवा पुत्र-पुत्री के मोबाइल में सेव हुए नम्बरों में से तुम उनके कितने साथियों-सहेलियों से परिचित हो ? पत्नी के जन्मदिन पर क्या तुम उन्हें मुझे 24 घंटे का उपहार देते हो ? क्या रात्रि भोजन पूरा परिवार एक साथ करता है ? घर-परिवार को एक घंटा ही सही पर दो। प्रातः काल घूमने जाओ। मैं तो चलता रहता हूँ। मुझे बांध नही सकते, पर संतुलित आहार के समान अपने जीवन में मेरा भी संतुलन रखो।

श्रद्धेय वृद्धजन ! आपकी समस्या अलग है, आप को समझ में नही आता कि आप मेरा क्या करें। आप सोचते हैं कि दिन में 24 नहीं 12 घंटे भी बहुत हैं। जीवन की संध्या में आप समाज सेवा करिए, छोटे बच्चों केा पढ़ाइए, अच्छी पुस्तकें पढ़िए, लिखने में रूचि हो तो लिखिए, योग-प्राणायाम सिखाइए, बेटे बहू पुत्री दामाद के कुछ काम स्वयं करके उन्हें राहत पहुंचाइए। समर्थ हो तो परिवार के छोटे बच्चों के लिए ट्यूटर बन जाइए। गृहस्थ-सेवा-व्यवसाय में जो काम नहीं कर पाए उन्हें अब करिए, फिर देखिए आप मुझ से ऊबेंगे नहीं, आप मेरा महत्व समझंेगे मुझे स्वीकार करेंगे।

हे पाठक-पाठिकाओं ! मैं क्रेडिट कार्ड पर उधार नही मिलता, मैं सेल में डिस्कांउट पर भी नहीं मिलता, मैं एक्सचेन्ज ऑफर में भी नहीं मिलता, एक के साथ मैं दूसरा फ्री नही मिलता, अपनी प्राथमिकता एवं आवश्यकतानुसार आप स्वयं मेरा बजट बनाऐं, जीवन को कर्फ्यू मत बनाइए, पर निरर्थक मत गंवाइए मुझे। व्यस्त रहिए, पर अस्त-व्यस्त मत रहिए। चिंतन मनन करके संतुलित जीवन जीने के लिए मेरा सदुपयोग करेंगे, तो मैं जितना आपके हिस्से में आया हूँ जीवन के सूर्यास्त के समय आप यहीं कहेंगे कि समय को मैंने खोया नहीं, समय से मैंने पाया ही पाया है। मुझे स्वीकार कीजिए, मैं समय टाइम तो हमेशा आपके साथ था, हूँ व  रहूंगा। इति.-   


दिलीप भाटिया
7 घ 12, जवाहर नगर
जयपुर- 302004 (राजस्थान)
मोबाइल- 09461591498



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