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आलेख :दो सबसे दुःखद प्रवृतियॉ:-भारतीय समाज सदा असंख्य स्वार्थी समूहो में विभक्त रहता है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जून 11, 2011 | शनिवार, जून 11, 2011


डॉ. लोहिया जी 

भारतीय समाज के दो सबसे दुःखद प्रवृतियॉ हैं एक यह कि वह सदा असंख्य स्वार्थी समूहो में विभक्त रहता है तथा दूसरा यह कि व्यवस्था को खतरा बन सकने वाले किसी भी व्यक्ति को नीचे खींच लेता है। यह बात केवल सत्ता से जुड़ी व्यवस्था जो सरकार में होती हैं केवल उस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता के सभी संरचनाओं में चाहे वह जाति, धर्म या पितृ सत्ता से जुड़ी क्यों न हो, सभी में देखी जा सकती है यहॉ तक कि जिन वंचित समूहो के बारे में डॉ. राममनोहर लोहिया ने आशंका व्यक्त की थी, वे वास्तविक तौर पर उन सभी ज्यादतियों तथा कमियों को प्रतिबिम्बित कर रहा है। जिसके चलते जाति उन्मूलन का पूरा ध्येय ही पराजित होता नजर आता हैं। उच्च जातियों के पुरूष, महिलाओं को कुछ दिखलाई पड़ने वाली स्वतंत्रता की अनुमति देते है। सामंतवाद और पुरूषो के आधिपत्य में महिलाओं को वास्तविक स्वतंत्रता जिसमें कि वे अपनी स्वंय की पसन्द से आगे बढ़ सके से महिलाओं को अलग रखा जाता है। पिछड़ी जातियो में जो हाल ही में शक्ति सम्पन्न हुई है वे भी उच्च जातियो के पुरूषो के तौर तरीको को और अधिक तीव्रता से अपनाती दिखलाई पड़ती हैं। जब डॉ. लोहिया, आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायण जी ने  नीतियो तथा पार्टी संरचना से जुड़े मुद्दो पर श्री जवाहरलाल नेहरू से असहमत होना शुरू किया तब समाजवादियो द्वारा वास्तविक तौर पर सत्ताकेन्द्र को चुनौती देने के चलते तनाव पैदा होना शुरू हो गया। इसी के चलते पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बाद में सोशलिस्ट पार्टी तथा उसके बाद जनता दल, समाजवादी पार्टी, समता पार्टी और अन्य संगठन इसी प्रक्रिया से खड़े होते गए। भारत की आजादी के बाद के दिनों में नेहरू परिवार की इन उच्च ब्राम्हणवादी सामंती एवं परिवारवादी तौर तरीको को देखना सम्भव नहीं हो सका। महात्मा गांधी को यह एहसास हो गया था कि जनता के ऊपर उनकी जो पकड़ है वह पकड़ पार्टी में बनना कठिन है। उन्होंने नए राजनीतिक ढांचे को खड़ा करने तथा कांग्रेस को पार्टी के तौर पर भंग करने की सलाह दी थी। उनके लिए उन सभी बातों को समझना, चिन्हिंत करना सम्भव था क्योंकि वे न तो राजनीतिक पद चाहते थे न ही उसके साथ जुड़ी भौतिक और वित्तीय सुविधाओं को चाहते थे। गांधी जी ऐसे स्वतंत्र भारत का निर्माण करना चाहते थे जिसकी रीढ़ मजबूत नैतिक बल पर टिकी हो तथा जिसका नेतृत्व गरीबो तथा सर्वाधिक वंचित समूहो के आकंाक्षाओं के अनुसार हो। दलित, आर्थिक तौर पर कमजोर  समूह तथा महिलाऐ उनके सोच की प्राथमिक केन्द्र थे। वे हिन्दु और मुसलमानांे के दिलो को एक करना चाहते थे। वे चाहते थे कि राष्ट्र के विकास के लिए ठोस ग्रामीण संरचना की नीवं पडे़, निजी तथा सभी सार्वजनिक क्षेत्रो में कार्य की प्रमाणिकता हो। इसीलिए यह आश्चर्यजनक नहीं था कि गांधी और लोहिया के बीच इन मुद्दो को लेकर गहरा रिश्ता बना। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को अपने विचारो से अवगत कराने के लिए गांधी जी ने लोहिया का उपयोग किया। सबसे बड़ा विभाजन समाज में जो नेहरू और अन्य बुजुर्ग नेताओं ने पैदा किया वह विभाजन के लिए सहमति का बनना था। जिसके चलते हिन्दू और मुसलमानो के दिल और दिमाग का बंटवारा हुआ। केवल सत्ता का स्वाद चखने के उद्देश्य का पता लिओनार्ड मोसले और नेहरू की आपसी बातचीत से नेहरू जी के दिमाग में उस समय चल रहे सोच का पता चलता है। उन्होंने कहा था ’’सच यह है कि हम थके हुए लोग है  जिनके पास समय बहुत कम है हम में से कुछ ही लोग बार बार जेल जाने के उत्सुक है यदि हम एकीकृत भारत के लिए खड़े रहते तो जेल हमारा इन्तजार कर  ही रही थी। हमने पंजाब में लगी आग तथा रोज हो रही हत्याओं के बारे में देखा और सुना। विभाजन की योजना ने हमारे समक्ष बाहर निकलने का रास्ता प्रस्तुत कर दिया जिसे हमने अपनाया। हम यह मानकर चल रहे थे कि विभाजन अस्थाई हैं तथा पाकिस्तान हमारे पास वापस आ जाऐगा’’। डॉ0 राममनोहर लोहिया ने भारत के विभाजन के अपराधी नामक पुस्तिका में अपनी नेहरू जी के साथ गांधी जी के पहल पर सन् 1946 के आखरी सप्ताह में नोआखली में हुई चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा है कि नेहरू जी पूर्वी बंगाल की हालत से इतने ज्यादा खफा थे कि उनकी इच्छा पूर्वी बंगाल को शेष भारत से अलग करने की होने लगी थी। लोहिया जी को लगता था कि यह केवल गुप्त रूप से लिए गए फैसले के पीछे छिपी ग्लानिभाव की भावना को व्याख्यातित करने का प्रयास मात्र कर रहे थे। लोहिया जी ने अपने लिए टिप्पणी की थी कि उन्हें पूर्वी बंगाल की महिलाओं की खुशनुमा हंसी दुनिया में अतुलनीय दिखलाई पड़ी। उन्होंने आखिर में यह टिप्पणी की कि यह सही है कि ये लोग बुजुर्ग एवं थके हुए थे वे अपनी मृत्यु के करीब थे या वे कम से कम ऐसा समझ रहे थे। यह सही है कि उनका पदों के बिना रहना मुश्किल था। 

 रजनीकान्त वर्मा ने डॉ0 लोहिया पर लिखी गई किताब में जो 1996 में प्रकाशित हुई में डॉ0 लोहिया की जिन्दगी के कहानी को सम्बन्ध में संक्षेप में कहा था कि डॉ0 राममनोहर लोहिया की पूरी कहानी आंसुओं, असमंजस, विद्रोह, रोमांच, जोखिम, साहस से भरी हुई हैं। उनकी पूरी जिन्दगी ऐसे युद्धक्षेत्र में बीती जहॉ उन्होंने सबसे ताकतवर के खिलाफ युद्ध किया तथा पुरानी रूढ़ियो के खिलाफ जिनका भारतीय मस्तिष्क के ऊपर गहरा प्रभाव और पकड़ थी के खिलाफ सत्त युद्ध किया। यह सब जानने के बावजूद लोहिया कभी एक पल के लिए भी झिझके नहीं। वास्तविकता यह है कि उन्होंने सभी को चुनौती दी तथा वे सब पर भारी पडे़। 

यह सही है कि उन्होंने सभी को चुनौती दी लेकिन सभी मुद्दो पर वे भारी पडे यह कहना कठिन है। अमरीका के नागरिक अधिकार आन्दोलन में उनकी भागीदारी अत्याधिक स्मरणीय है जो गांधी जी के अलावा किसी भी भारतीय नेता ने किसी अन्य देश के सामाजिक ताने बाने को लेकर नहीं दी। उनका जाति को नष्ट करने के लिए सकारात्मक भेदभाव का रास्ता अभी सतही तौर पर ही सफल कहा जा सकता है। परिवारवाद को लेकर उन्होंने जो विचार दिए उन्हें स्वीकारने वाले आज की राजनीति में भी बहुत कम है।

 वे राजनीति में व्यक्ति पूजा के खिलाफ थे। लेकिन कांग्रेस इस बीमारी से अत्यधिक संक्रमित थी और है। नेहरू के खिलाफ उनका प्रखर राजनीतिक विरोध उनके भीतर व्यक्ति पूजा तथा स्तूति गान के प्रति नफरत से उपजा था ’’इसलिए उन्होंने स्वयं इसका वर्णन कुछ इस प्रकार किया’’ परन्तु राजनीति करने वाला व्यक्ति और किस तरह का काम कर सकता है जबकि देश की राजनीति केवल एक व्यक्ति और तीन तरह के चूहो को ही जानती हो कुछ वो जो चाटते हैं और कुछ वे जो कभी चाटते है कभी काटते भी है और कुछ वे जो काटते है। जो कुछ काटते है वो बहुत कम पाये जाते हैं उनमें से कुछ मनुष्य के तौर पर शायद कभी विकसित हो सकते हैं। जब देश की संगठित राजनीति में इस तरह से नेहरू का स्वार्थपूर्ण पूजा किया जाना बंद हो जाएगा तब मैं भी अपना जुनून खत्म कर दूंगा जो राजनैतिक से अधिक भावनात्मक है। ’’देश को अभी जैसा लोहिया ने कहा था वैसा स्वीकार करना बाकी है। कभी भी मीडिया प्रबुद्ध वर्ग का सामंती एवं उपनिवेशवादी दिमाग के लोग तथा कांग्रेस पार्टी के भीतर इसी तरह के चापलूसों तथा स्लेविशनेस की प्रवृत्ति बनी हुई है। एक परिवार के शासन की रणनीतिक स्वीकरोक्ति, लोकतंत्र में उन प्रबुद्ध और अन्य ऐसे लोगो के द्वारा बढ़ाई जा रही है जो अपने परिवारो को आगे ले जाने को प्राथमिकता देते हैं। आज के समय में बहुत कम ऐसे चूहे दिखलाई पड़ते हैं जो काटने को तैयार हो। ऐसे अपवाद स्वरूप महिला और पुरूष नेहरू के वंशवाद के खिलाफ बोलते हैं। इसलिए नहीं कि उनके परिवार और व्यक्ति दूसरो से बद्तर है। लेकिन इसलिए की वंशवाद व्यक्ति के आत्मसम्मान और लोकतंत्र के खिलाफ है। विशेष तौर पर ऐसे समाज में जो बराबरी को लेकर प्रयासरत है। लोहिया की सोच के अनुसार ऐसे लोगों को आज भी उन परिवारो के दरबारियों द्वारा नीचा दिखाया जाता है। 

आईये हम लौटकर उस समय के बारे में देखे जब लोहिया कांग्रेस के समाजवादी समूह के हिस्सा थे। नेहरू ने लोहिया के सामने कांग्रेस पार्टी के महामंत्री होने का प्रस्ताव रखा था। लोहिया ने तीन शर्ते रखी। पहली शर्त यह थी कि पार्टी यह स्वीकार करे कि कांग्रेस का अध्यक्ष प्रधानमंत्री या केबिनेट के मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं होगा तथा कोई भी मंत्री कांग्रेस कार्यसमिति का सदस्य नही होगा इसके साथ साथ वे चाहते थे कि कांग्रेस कार्यसमिति को सरकार की आलोचना का अधिकार होगा। नेहरू ने लोहिया की शर्ताे को अस्वीकार कर दिया। इस कारण लोहिया तैयार नहीं हुए। इससे उन्हें यह स्पष्ट हो गया कि नेहरू अपनी बेटी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते हैं तथा पार्टी की संरचना में ऐसा कोई भी परिवर्तन करने को तैयार नहीं हैं जो इसमें बाधा बने। जब लोहिया ने इंदिरा गांधी पर हमला किया तब वह हमला इसलिए नहीं किया था कि वह एक महिला थी बल्कि इसलिए किया क्योंकि वे वंशवाद के खिलाफ थे। असल में लोहिया महिलाओं के बारे में एक सांस में वैसा ही बोलते थे जैसा वे वंचितो के बारे में बोलते थे। उनके विचार से महिलाओं को जाति के आधार पर विभाजित नहीं किया जा सकता था। क्योंकि हर स्तर पर उन्हें पितृ सत्तात्मक का शोषण झेलना पड़ता है। उन्होंने कहा था कि मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि महिला और जाति के दो कटघरे प्राथमिक तौर पर भारतीय लोगो की आत्मा (स्प्रीट) के पतन के लिए जिम्मेंदार हैं ये दोनो कटघरे इतने शक्तिशाली हैं कि इनके भीतर खुशी और रोमांच खत्म करने की ताकत है। गरीबी के खिलाफ कोई भी युद्ध के साथ जब तक सुनियोजित तौर पर इन दो कटघरो के खिलाफ मूहीम नहीं छेड़ी जाती तब तक गरीबी के खिलाफ युद्ध केवल दिखावा है। डॉ0 लोहिया अपने समय से बहुत आगे थे जब वे अपने हर भाषण अथवा बातचीत में सामाजिक परिवर्तन के लिए महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन की बात पर जोर दे रहे थे। वे बार बार कहते थे कि जाति और योनि कटघरे एक दुसरे को पोषित करते है। एक बार उन्होंने काफी हाऊस में हो रही बहस में, जहॉ पर क्रांति की बात चल रही थी, के दौरान शूद्र और महिला की अनुपस्थिति में हो रही बहस को लेकर नाराजगी प्रगट की थी। 55 वर्ष पहले उन्होंने लिखा था कि देश की राजनीति में एक बड़ा राष्ट्रीय सहमति का क्षेत्र है, कांग्रेस, कम्युनिष्ट, पर सोशलिट चाहे परम्परा से हो या सुनियोजित सभी शूद्र और महिलाऐ, जो की आबादी का तीन चौथाई हिस्सा हैं, को नीचे रखना तथा उन्हें अपने अधिकारो से वंचित रखना चाहते हैं। 

कभी भी ऐसा समय नही आया जब डॉ0 राममनोहर लोहिया ने जरूरतमंद तबको की सूची बनाते हुए उसमें महिलाओं का नाम न जोड़ा हो। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास की कार्य सूची (एजेन्डा) में अब जाति के खिलाफ वास्तविक संघर्ष का एजेण्डा आ गया हैं। इस संघर्ष का मक्सद समान रूप से उन पॉच समूहो को ऊपर उठाना हैं जिसमें महिला, शूद्र, दलित, मुसलमान और आदिवासी शामिल हो, उन्हें नेतृत्व में स्थान दिलाना है। चाहे योग्यता कुछ भी हो। जिस योग्यता की चर्चा आजकल बहुत होती है से बिना जोडे इन पॉच समूहों को नेतृत्व प्रदान करना है। अगर इस समूह में सभी महिलाओं को जोड दिया जाए जिसमें द्विज महिलाये भी हो। जिसे जोडा जाना एकदम ठीक भी है तब दबे कुचले समूहो की आबादी 90 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। मानवता के समुद्र में इन 10 में से 9 समूहो के पुरूष और महिलाओं को चुप्पी में डूबो दिया गया है कभी कभी इतनी आवाज उठाने की अनुमति दी जाती हैं कि जिससे उनके जिन्दा भर होने का आभास हो सके। दुर्भाग्य से महिलाओ के संसद में आरक्षण के माध्यम से उन्हें शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए राजनीतिक आरक्षण का बिल उन लोगो द्वारा आज रोका जा रहा है जो अपने को डॉ0 लोहिया का अनुयायी बताते हैं। ये वही लोग है जिन्हें डॉ0 लोहिया द्वारा जाति उन्मूलन के लिए चलाये गए अभियानो का लाभ मिला हैं उनका लोकतांत्रिक समाजवादी विचार के प्रति तिरस्कार का यह भाव जाति की स्वयं का स्वार्थ सिद्ध करने की वास्तविकता से निकला है जिसके बारे में डॉ0 लोहिया को भी अन्दाजा नही लगा सके। यह कहने में कोई गुरेज नहीं करना चाहिए कि जो अपने आपको समाजवादी कहते है तथा जो महिला आरक्षण विधेयक के माध्यम से महिलाओं के लिए विधायिका में 33 प्रतिशत आरक्षण के बिल को रोक रहे है वे लोहिया के वैचारिक अनुयायी नही कहे जा सकते। 
डॉ0 लोहिया को भेदभाव किसी भी स्वरूप में नापसन्द था। वे कहते थे कि मैं राष्ट्रीय और अर्न्तराष्ट्रीय हर स्तर पर जाति व्यवस्था से नफरत करता हूं। उनके लिए भारत में जाति व्यवस्था अमरीका में रंग के आधार पर सर्वाेच्चता, संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में तथा स्थायी सदस्यो को वीटों का अधिकार, जो कि पॉच बडे देशो को दिया गया हैं वे एक ही भेदभावपूर्ण दष्ष्टि के परिचायक है। लोहिया की मान्यता थी कि इस तरह के भेदभाव दिमागी बीमारी के परिचायक है लेकिन स्वस्थ्य व्यक्ति के दिमाग से इस बीमारी को निकाला जा सकता है। 

डॉ0 लोहिया के खुलकर बोलने को लेकर एक और लेखक ओंकार शरद ने स्पष्ट किया है कि लोहिया दो टूक बोला करते थे कि उनके दिमाग में विचार की स्पष्टता थी। लोहिया बेबाक खुलकर बोलते थे क्योंकि उन्हें खुलकर बोलना पसन्द था। लोहिया सीधी सच्ची बात रखते थे क्योंकि वे ऐसा पसन्द करते थे। इन गुणों के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय, शहरी नारीवादियों की तुलना में डॉ0 लोहिया सच्चे नारीवादी थे। वे बहुत करूणा के भाव से उस महिला की स्थिति का वर्णन किया करते थे जिस स्थिति से उसे दैनिक आवश्यकताओं के चलते शौच हेतु गांव में गुजरना पड़ता है। महिलाओं का सुबह होने के पहले या शाम के अन्धेरे के बाद ही शौच करना सम्भव है। क्योंकि शौचालयों का अभाव है। 

अधिकतर पश्चिमी नारीवादी अपने लैगिंकता के अधिकार तथा अपनी उदारवादिता, शराब पीने, सिगरेट पीने के माध्यम से सिद्ध करते रहे हैं लेकिन लोहिया ने उन गरीब ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं को सार्वजनिक तौर पर रखा जो इन महिलाओं द्वारा सार्वजनिक तौर पर बोली ही नही जा सकती थी। मार्च, अपै्रल 1961 में जाति खत्म करो नामक राष्ट्रीय अधिवेशन में महिलाओं को लेकर एक प्रस्ताव पास कराया गया जिसमें कहा गया था कि महिला सम्मेलन शादी, सम्पत्ति के बंटवारे तथा महिलाओ के अधिकारो एवं पुरूष और महिलाओं के बीच अधिक बराबरी जैसे प्रस्तावों का समर्थन करते हुए, साफ पानी तथा महिलाओं के लिए शौचालय बनाने के सवाल को उठाना चाहता है। पीने का पानी सभी गांव और शहरो में हर घर में पहुंचाया जाना चाहिए। अगर यह सम्भव न हो तो सार्वजनिक नल कुछ घरो के बीच समूह बनाकर लगाना चाहिए। यह कार्य देश में पंचवर्षीय योजनाओं में 2 हजार रूपया करोड़ खर्च कर किया जा सकता है। इतनी राशि आमतौर पर राज्य सरकारो द्वारा 6 महिने में खर्च की जाती है। सम्मेलन ने गांव तथा जिला पंचायतो को ऐसे शौचालय बनाने का सुझाव दिया जिन्हें बाहरी व्यक्ति के द्वारा सफाई करने की जरूरत न पडे़। आज भी हम ऐसे किसी पुरूष राजनीतिज्ञ की कल्पना नहीं करते जो  इन मुद्दो को भाषण और प्रस्तावो में स्थान देता हो। नारीवादी भी इन मुद्दो पर चुप्पी बनाये रहते हैं। 

लोहिया तब हमे और अधिक प्रगतिशील दिखलाई पड़ते हैं जब वे महिलाओं से जुडी नैतिकता की खोखली अपेक्षाओं पर लिखते हैं। वे मार्च 1953 में आज ही के दिन यानी अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर लिखते हुए कहते हैं कि पाप और पुण्य के सवाल से बचा नहीं जा सकता। मैं जानता हू कि अध्यात्म, सम्पूर्ण है। लेकिन नैतिकता तुलनात्मक है। हर काल एवं यहॉ तक की हर व्यक्ति के लिए अपनी नैतिकता की खोज करनी चाहिए। उन दो महिलाआंे में से एक जिसने पूरी जिन्दगी में एक ही बच्चे को जन्म दिया हो लेकिन वह नाजायज औलाद हो और दुसरी वह महिला जिसने आधा दर्जन से अधिक बच्चे पैदा किए हो। दोनो में से कौन ज्यादा सभ्य और ज्यादा नैतिक है। वे तर्क देते थे कि पहले वाली ज्यादा सभ्य है। वे कहते थे कि एक महिला जिसे तीन बार तलाक दिया जा चुका हो उसका चौथी शादी करना ज्यादा नैतिक है। बनिस्बत उस आदमी के द्वारा चौथी शादी करने की तुलना में जिसकी पहली तीन बीबिया मर चुकी हो। संक्षेप में वे नैतिकता के सवाल के माध्यम से महिला पुरूष के सर्वाेत्तम सम्बन्धों की तलाश कर रहे थे। वे मानते थे कि शादीयांॅ नैतिकता होती है लेकिन उसमें दहेज तथा लड़कियों को घोडे़ की तरह से जॉचना, परखना अनैतिक है। वे साफ-साफ तौर पर कहते थे कि यह माँ बाप की जम्मेंदारी नहीं हैं कि वे अपने बच्चो की शादी करे। उनकी जिम्मेदारी अच्छी शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य का इंतजाम करने के बाद समाप्त हो जाती है। यदि कोई लड़की घर छोड़कर किसी के साथ भाग जाती है और कई बार वे सम्बन्ध नाजायज रिश्ते कहलाते हैं तो यह पुरूष और महिला के द्वारा साधारण सम्बन्धों की तलाश के दौरान रिश्ते बनाने की कीमत मानी जानी चाहिए जिसको लेकर कोई धब्बा लगाया जाना गलत है। यदि इस मापदण्ड के आधार पर देखा जाए तो ऐसे नैतिक फौज के तौर पर काम करने वाले तथाकथित धार्मिक संगठनो के द्वारा तय की गई नैतिकता को महिलाओं पर जबरदस्ती थोपने की औचित्यहीनता को समझा जा सकता है।

 डॉ. लोहिया आज से 55 वर्ष पहले अधिक प्रगतिशील थे। उन सभी प्रगतिशील लोगो की तुलना में जो आज सब तरफ दिखलाई पडते है। लोहिया मानते थे कि 3 बच्चो के मॉ बाप की नसबन्दी करा दी जाना चाहिए तथा वे मानते थे कि अविवाहित रहना एक जेल की तरह है तथा सभी वर्जिन उद्वार करने वाले की तलाश में रहते हैं उन्होंने बहुत खुलकर कहा है कि अब वह समय आ गया है कि पुरूष और महिलाये इस क्रिस्म की संकीर्णताओ के खिलाफ विद्रोह करे। सभी को यह याद रखना चाहिए की सैक्स के मामले में दो ही अपराध है एक बलात्कार, दूसरा झूठ के आधार पर संबंध या वायदा खिलाफी। वे कहते थे कि एक तीसरा अपराध भी हैं किसी दुसरे को दर्द या कष्ट पहुंचाना, ऐसी स्थिति को यथासम्भव टालना चाहिए। यदि उनकी सलाह मानने से युवा परेशानी में पड़ते हों तो उसके उत्तर के तौर पर वे कहते थे कि जो युवा लड़का या लड़की अपनी ईमानदारी के चलते बदनाम होते हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उन्हें पानी से काई हटाकर पानी को खुले तौर पर बहने की कीमत चुकानी पड़ रही है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि डॉ0 लोहिया रूढीवादी विचारों के खिलाफत करने वाले तथा मर्जी के मालिक थे। जो हजारो साल के स्थापित ढांचो को ध्वस्त करने की कोशिश कर रहे थे। 

1962 मंे लोहिया सोशलिस्ट पार्टी के फुलपूर से कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार थे। कांग्रेस ने नेहरू के नाम और जाति को लेकर नारेबाजी करनी शुरू की तथा लोहिया पर आरोप लगाया कि वे एक लोहे के व्यापारी हैं तथा उन्हें काला बाजारी करने के लिए पकडा गया था। कांग्रेसियो ने पैसे बाटे, पद बाटे, सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया। शासकीय स्कूल के शिक्षको से चुनाव अभियान चलवाया, उधर दुसरी तरफ डॉ0 लोहिया लोगो के बीच जाकर उन्हें एक ही शपथ दिलाया करते थे कि वे अपनी पत्नी को नही पीटेेगे। वे उन्हें बताते थे कि भारत की महिलाए सबसे ज्यादा पुरूषों के गुस्से का शिकार बनती है। सामाजिक आर्थिक गैरबराबरी से सबसे ज्यादा पीड़ित होने के साथ-साथ वे लगभग रोज पुरूषों के द्वारा पीटी जाती है। वे कहते थे कि यदि तुम मुझसे वायदो करो की तुम अपनी पत्नी को नहीं पीटोगे बहुत कम समय में अपना भविष्य बदल सकते हो। वे चुनाव अभियान के दौरान मतदाताओं को समझाते थे कि ऐसे लोग जो कार्यस्थल पर तिरस्कृत किए जाते थे जिनके अन्दर जवाब देने की हिम्मत नही होती। वे घर जाकर अपनी पत्नि को पीटते है। यदि उनमें अपने बॉस को यह कहने की हिम्मत होती कि वह तरीके से पेश आऐं या खामियाजा भुगतें। लोहिया कहते थे कि इसका नतीजा यह होगा कि क्रांतिकारी बदलाव आएगा तथा नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण होगा। 

महिला के मामले में लोहिया का सोच कोरा प्रदर्शन अथवा छिछोरापन लिए नहीं था। उन्होंने अपनी शादी को लेकर कभी गंभीरता से नही सोचा, लेकिन उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि दुनिया में दो पाने योग्य हैं - भगवान और महिला। लेकिन व्यक्तिगत तौर पर वे भगवान को नही मानते थे और वे कभी महिला को पा नहीं सके।हालाकि उनका अत्यन्त गहरा बौद्धिक मित्रतापूर्ण संबंध डॉक्टर रमा मित्रा और शांतिनायक से था। उनके साथ वे राजनीतिक, दार्शनिक एवं महत्वपूर्ण सवालों पर बहस किया करते थे। एक बार इंग्लैण्ड में जब एक महिला बैरा ने उनसे उनकी पत्नि के बारे में पूछा तब उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी शादी पर ख्याल नहीं दिया क्योंकि इससे अधिक बडी समस्याओं में फसे रहे। उन्होंने कभी भी महिला को उपभोग की वस्तु, खेलने वाली गुिडया नहीं समझा। उन्होंने सदा गांधी के राम राज्य की जगह सीताराम राज्य को प्राथमिकता दी। 

दिसम्बर 1957 में लोहिया राजनीतिक आन्दोलन के चलते जेल में थे तब उन्होंने जेल मंत्री को जेल की विभिन्न समस्याओं को लेकर विस्तृत पत्र लिखा। उन्होंने अपने मित्र के द्वारा जेल में भेजी गई किताब जिसे बाद में जेल अधिकारियो ने जब्त कर लिया - भूमि कन्या सीता जो  प्रसिद्ध नाटक श्री वारेरकर द्वारा लिखा गया था, के सम्बन्ध में काफी लिखा। यह किताब धरती मॉ की बेटी सीता के इर्द गिर्द तथा धरती मॉ के बेटे शम्भूक के इर्द गिर्द घुमती है। लोहिया ने जेल मंत्री को लिखे गए अपने पत्र में महिला और शूद्र को धूरी माना। नाटक की चार महिला नायिकाओं सीता, उर्मिला, वासंति और कुशिका का व्यक्तित्व बहुत ताकतवर और जीवन्त दिखलाया गया। शम्भूक का व्यक्तित्व अप्राकृतिक एवं कमजोरी से पीड़ित बताया गया। उन्होंने लिखा कि स्वंय श्री वरेरकर को यह सोचना चाहिए कि इतने ताकतवर शूद्र का व्यक्तित्व उनके हाथो इतना कमजोर कैसे हो गया। राम का व्यक्तित्व भी अधिकता की गलती से प्रभावित है। अपने उसी पत्र के दुसरे हिस्से में उन्होंने वर्तमान समय के उच्च जाति के पुरूषो के सम्बन्ध में लिखा है। पॉच हजार साल पहले राम ने सीता पर तमाम किस्म के अंकुश लगाकर यह मांग की थी कि उन्हें अपना निर्दाेष होना अग्नि में कूदकर साबित करना होगा। आज के राम हो सकता है कि सीता को उन बेडियो से मुक्त कर दें। लेकिन निचली जातियों के वासंती और कुशिका से वह अपनी मनोकामना और अपने सुख की पूर्ति की अपेक्षा रखते है, उन्हें बराबरी के सिद्धान्त से वंचित रखते है। 

क्या आप जेल में, आज के किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के बारे में यह कल्पना कर सकते हैं कि वह किसी ऐसे नाटक का साहित्यिक आलोचना करने का काम करेगा जिसका केन्द्रीय चरित्र महिला हो। अधिक सम्भावना इस बात की है कि आज का राजनैतिक कैदी, जो की मूलतः अपराधी है, अपना पूरा दिन मोबाईल फोन से दूर दूर तक अपने काले कारनामों को आगे बढ़ाने में समय लगायेगा। उसे इस तरह के उच्च विचारो की जरूरत नहीं पडेगी क्योंकि वह सार्वजनिक धन से हवाईजहाज से संसद में वोट करने के लिए ले जाया जायेगा। उसके लिए औरत के नाम का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक ताकत को अपनी पत्नी के माध्यम से जिन्दा रखना होगा। वह भी तब तक जब तक की वह कानूनी अडचनो में फंसा हुआ है।

 लोहिया के राजनीतिक विचारो में निरन्तरता रही। चाहे वे कही भी गए हो। नवम्बर 1961 में उन्हें एथेन्स् में शांति सम्मेलन के लिए बुलाया गया उन्होंने इस बात को बहुत ध्यान से देखा कि लोग एक महान जर्नल एलेक्झेण्डर दी ग्रेट की तमाम विशेषताओ को लेकर जश्न मनाते हैं लेकिन वे लोग महान दार्शनिक सुकरात को लगभग भूल चुके है। उन्हें यह विश्व शांति सम्मेलन के सन्दर्भ में विचित्र लगा उन्हें निराशा हुई। उस कान्फ्रेस में जस्टिस डगलस तथा वरिष्ठ मानवतावादी जीनथियोवाल्ड थे। वहॉ उन्होंने अपना विचार रखा की अन्याय के गर्भ से हथियार पैदा होते हैं जिसे सम्मेंलन द्वारा स्वीकार किया गया। उन्होंने दुनिया के सामने इस मंच से पहली बार सप्तक्रांति का सिद्धान्त रखा। उन्होंने कहा कि दुनिया को हथियारो से मुक्त बनाने के लिये दुनिया का न्यायपूर्ण होना जरूरी है तथा यह तभी संभव है जब सात क्रांतियां हो। 

1- महिला और पुरूष के बीच में बराबरी 2- राजनीतिक गुलामी तथा साम्रज्यवाद का खात्मा 3- राष्ट्रीय और अर्न्तराष्ट्रीय आर्थिक बराबरी 4- जातिभेद के खात्मे के लिए वंचित तबको को विशेष अवसर दिया जाना 5- राज्य के द्वारा व्यक्ति के निजी अधिकारो में हस्तक्षेप से रक्षा 6- निरस्त्रीकरण के लिए सत्याग्रह के माध्यम से प्रयास 7- रंगभेद का खात्मा, नस्लो की बराबरी तथा सुन्दरता के लिए समान मापदण्ड यहॉ यह ध्यान देने योग्य है कि उन्होंने सप्तक्रांति में भी महिला को प्राथमिता दी यहा तक कि महिला की सुन्दरता और रंग के सवाल के प्रति भी अपनी चिन्ता व्यक्त की। 

डॉ0 लोहिया को जाति उन्मूलन तथा महिलाओं को शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए अनवरत संघर्ष करने हेतु याद किया जाएगा।  8 मार्च को पूरी दुनिया में तमाम समारोह अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस को लेकर होते है तथा हर वर्ष 23 मार्च को समाजवादी डॉ0 लोहिया का जन्म दिवस मानते है। भारतीय समाज में सामाजिक क्रांति लाने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम दोनो समारोहो को जोड दे तथा यह स्वीकार कर लंे कि सामाजिक क्रांति तभी लाई जा सकती है जब महिलाओं और दबी कुचली जातियो को एकसाथ शक्ति सम्पन्न बनाने का कार्य किया जायेगा।


जया जेटली 
सामाजिक विचारक 
मोबा. 09810080134
(ये आलेख हमें हमारे वरिष्ठ साथी पत्रकार,उदयपुर से प्रकाशित 'समता सन्देश' पत्र के सम्पादक और समतावादी लेखक हिम्मत सेठ के सहयोग से प्राप्त हुआ है.-सम्पादक )
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