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बदलते जीवन मूल्य पर कटाक्ष करती दिलीप भाटिया की तीन लघु कथाएँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जून 02, 2011 | गुरुवार, जून 02, 2011

1. शिक्षा

नेहा बेटी, हैलो ! तुम्हें पब्लिक स्कूल मे इसलिए पढ़ा रही हूं कि तुम्हारी पढ़ाई अच्छी हो. तुमने अपने ई-मेल मे आज लिखा कि तुम भी मेरे ही सरकारी स्कूल मे पढ़ लेती एवं घर पर साथ भी रह लेती, पर नेहा तुम्हें बतलाते हुए मुझे संकोच भी हो रहा है कि हम सरकारी स्कूल के टीचर गांव वाले गरीब बच्चों को पढ़ाने की मात्र औपचारिकता भर निभा रहे हैं. बेटी, इंडिया के मम्मी-पापा के लाडले प्राइवेट पब्लिक स्कूलों मे पढ़ रहें हैं सरकारी स्कूल तो गरीब भारत के मुन्ना-मुन्नी के लिए हैं. बस
-तुम्हारी मम्मी- नीलम

2. जय माता दी
नीरज भाई, नमस्ते. मोबाइल पर तुम्हारा मैसेज मिला. अम्मा सीरियस है पर यहां मैं नवरात्रि मे माताजी के नौ दिन के उपवास कर रही हूं. फिर अम्मा तो कोमा मे हैं, मै उनसे बात तो कर नही पाउंगी, माताजी के उपवास कैसे छोड़ूं ? डॉक्टर तो इस समय ऑक्सीजन से मोटा बिल बनाते हं.ै तुम 24 घंटे अस्पताल मे क्यों रहते हो ? एक बाई रख लो. हॉस्पिटल मे उसकी ड्यूटी लगा दो. अम्मा तुम्हे प्रशस्ति पत्र तो देने से रही. ज्यादा श्रवण क्यो बन रहे हो ? हां, तीये की बैठक की सूचना अखबार मे दोगे, तो मेरा व तुम्हारे जीजाजी का नाम भी शोकाकुल मे छपवाना. ओ.के. बॉय
तुम्हारी बहन-सपना

3. समय
जयशिव भाई, नमस्ते. तुम्हारा ई-मेल मिला कि रिटायरमेन्ट के बाद फेस-बुक पर लिखा करो। मेरे मकान मालिक कहते हैं कि सुबह शाम पार्क मे चला करो, बूढे़ लोग राजनीति एवं नई पीढ़ी के आचरण पर खूब चर्चा करते हैं, अच्छा समय बीतेगा, पर भाई मै तो आसपास के स्कूलों में बच्चों को समय प्रबंधन, पर्यावरण, परमाणु ऊर्जा, गुणवत्ता इत्यादि पर वार्ता देने जाता रहता हूं, रिटायरमेन्ट के पश्चात ज्ञान-दान कर जीवन की सार्थकता महसूस करता हूं। साहित्य, संगीत मेरे मित्र हैं ही, साथ ही बच्चों के साथ समय का सदुपयोग हो जाता है, बिना गोली खाए नींद भी अच्छी आती है. तुम ई-मेल भेजते रहना।
तुम्हारा मित्र- राजकमल


दिलीप भाटिया
7 घ 12, जवाहर नगर
जयपुर- 302004 (राजस्थान)
मोबाइल- 09461591498



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