Latest Article :
Home » , , » पुस्तक समीक्षा:कैमरा नकली यंत्र नहीं, मेरी तीसरी आँख है– पुखराज जाँगिड़

पुस्तक समीक्षा:कैमरा नकली यंत्र नहीं, मेरी तीसरी आँख है– पुखराज जाँगिड़

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, जून 13, 2011 | सोमवार, जून 13, 2011

सिनेमा हमारे समय का सबसे लोकप्रिय और जीवंत कला माध्यम है दृश्य-श्रव्य होने के कारण यह व्यापक जनसमुदाय अपना असीमित प्रभाव छोड़ता है। ऐसा इसलिए भी है कि अन्य कलाओं की अपेक्षा उसने हमारे परंपरागत कलारूपों को अधिक सहजता से स्वीकार किया है और कलाओं के इस अंतर्गुंफन या आत्मसातीकरण ने सिनेमा व्यापकता प्रदान की, उसे एक नई भाषा और तेवर प्रदान किया। चित्रकला (एनीमेटेड कार्टून, बैकड्रॉप्स), संगीत (ध्वनिशास्त्र), रंगमंच (अभिनय), साहित्य (कथा-पटकथा) की विशेषताओं को अंगीकार करते हुए उसने अपने आप समय के सांचे में ढाला है। सिनेमा में इन सबको समग्रता में पिरोने का काम सिनेमेटोग्राफर करता है।कैमरा : मेरी तीसरी आँख भारतीय सिनेमा के उत्कृष्ट सिनेमेटोग्राफर राधू करमाकर की आत्मकथा है जिसे उनके निधन (5 अक्टूबर 1993) के बारह साल बाद उनकी डायरियों और निबंधों के आधार पर उनकी पत्नी वाणी करमाकर और उनके बड़े बेटे ने प्रस्तुत किया है। चार भागों में विभाजित इस आत्मकथा के शीर्षक (फ्लैश बैक, लाइट्स ऑन, स्टार्ट पकैमरा, कट एंड पैक अप) राधू करमाकर के जीवन को एक संपूर्ण फिल्म के रूप में बयां करते है । यह आत्मकथा फिल्म निर्माण से जुड़े हजारों तकनीशियनों और फिल्मकर्मियों को समर्पित है जो सपने और फिल्मों को रचते है। राधू करमाकर भी ऐसे ही स्वप्नजीवी कलाकार थे और यह आत्मकथा हमें उनके जीवन के छूए-अनछुए पहलुओं को, उनके सिनेमाई अवदान को, उनके समय को बड़ी ही बेबाकी के साथ एक उत्कृष्ट फिल्म की तरह रील-दर-रील हमारे सामने रखती है। मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद कवि-कथाकार विनोद दास ने किया है।


इसके पहले भाग फलैश बैक में उन्होंने 1896 से 1960 तक के भारतीय सिनेमा का संक्षिप्त मगर सटीक इतिहास प्रस्तुत किया है तो दूसरे भाग स्वयं राधू करमाकर के निर्माण का लाइट्स ऑन है जिसकी शुरूआत बंगाल में तंगहालियों में बीते उनके बचपन और कैशोर्य जीवन के संघर्ष, अवमानना और गरीबी के दिनों से होती है। इसमें भागवत वाशीकर, जतिन दास व नितिन बोस के साथ के उनके प्रारंभिक कामों का जीवंत चित्रण है। राधू करमाकर ने 1936 से 1960 तक के सिनेमा को भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम युग कहा है और उस समय का बारीकी से विश्लेषण किया है कि किस तरह स्टूडियों प्रणाली का उदय हुआ? उन्होंने उस समय के कुछेक महत्त्वपूर्ण स्टूडियो (रणजीत स्टूडियो, इंपीरियल स्टूडियो, वाडिया मूवीटोन, प्रभात फिल्म्स, न्यू थिएटर्स व बाँबे टाकीज) के सबल पक्ष (उसका पारिवारिक वातावरण) और उसके पतन के कारणों (काले धन का प्रवेश, निजी उद्यमियों का चातुर्य और आतंरिक ईर्ष्या और नापसंदगी, अहं का टकराद आदि), तत्त्कालीन परिस्थितियों और सितारा प्रणाली के उदय के कारणों का तार्किक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इसमें उन्होंने बहुत ही शालीनता और तटस्थता के साथ अपने समकालीनों के सिनेमाई योगदान को रेखांकित किया है। राजकपूर को उन्होंने उनकी शक्ति व सीमा के साथ हमारे सामने रेखांकित किया है। नर्गिस और राजकपूर के सिनेमाई साथ को भी उन्होंने ईमानदारी से उकेरा है। असहमति का साहस और सहमति का विवेक उनकी निजी विशेषता है। राधू करमाकर ने बतौर सिनेमेटोग्राफर 33 फिल्मों में काम किया। वे अपने दौर के विश्व के दस सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफरों में एक रहे और अपना सर्वश्रेष्ठ काम राजकपूर के साथ किया। आवाराऔर श्री 420 की नायाब फोटोग्राफी हिंदी सिनेमा की विशिष्ट उपलब्धियां है। सोवियत रूस में तो ये सिनेमेटोग्राफी के पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण हिस्सा भी रही है। दरअसल उनकी फोटोग्राफी व सिनेमेटोग्राफी आज भी हमें अपनी ओर खिंचती है, फ्रेम-दर-फ्रेम विश्लेषण के लिए चुनौती देती है।

राधू ने कई द्विभाषी फिल्मों में भी काम किया। इससे पता चलता है कि हिंदी सिनेमा केवल हिंदी का ही सिनेमा नहीं है वरन सभी भारतीय भाषाओँ के श्रेष्ठ साहित्य को अपने भीतर समेट लेने की अथाह संवेदनात्मक गहराई और समग्र भारत को एक सूत्र में पिरोने की दृष्टि से एक सशक्त कला माध्यम के रूप मे उभरा है। दरअसल सिनेमा हमारा मनोरंजन करने के साथ-साथ हमारे समय और समाज की झलक भी प्रस्‍तुत करता है। उनकी आत्मकथा में हम उनके समय को जीवंत रूप में देख सकते है। पिता की इजाजत से चौदह साल की उम्र में उन्होंने पहली बार सिनेमा (बायस्कोप) देखा जोकि ग्यारहवीं सदी के कवि जयदेव के जीवन पर आधारित एक मूक फिल्म थी। उस समय का सिनेमा घुमंतु सिनेमा होता था और दर्शक जमीन पर बैठकर अंधेरे में रोशन हुए पर्दे के जादू में खो जाते थे। पर्दे के इस रामांचित कर देने वाले जादू ने राधू के मन में जिज्ञासाओं के एक समुद्र को जन्म दिया कि यह कैसे किया गया था और कैसे तस्वीरें चलती फिरती है?’(पृ.42-43), उसे इस रहस्य को जानने-समझने और फिल्म संसार से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। यह भी एक संयोग ही था कि उनकी देखी पहली फिल्म की फोटोग्राफी बाद में बने उनके गुरू जतिन दास ने ही की थी। लेकिन सिनेमेटोग्राफर बनने के लिए अभी उन्हें घाट-घाट का पानी पीना बदा था। लेकिन मूवी कैमरा कभी भी मुझे नकली यंत्र नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक साधन लगा। यह मेरे लिए तीसरी आँख जैसा था।(पृ.43)

विद्यालय की सालभर की फीस (चार रूपए) न दे पाने के कारण आठवें दर्जे से उनका नाम काट दिया गया। उनके दोनों बड़े भाईयों की कुव्यवस्था के चलते पारिवारिक स्वर्ण-आभूषण की दुकान बंद होने के कगार पर थी और आमदनी का कोई जरिया न होने से 1931 में राधू को कमाई करने और आगे पढने के लिए अपने तीसरे भाई के पास कलकत्ता जाना पड़ा। लेकिन वहाँ लंबे समय तक बीमार रहने के कारण उनकी पढने की इच्छा छोड़कर (जिसे बाद में उन्होंने एक आत्मघाती निर्णय माना) और 1933 में वे जेवरातों के कारोबार से जुड़ गए। 1944 में वाणी से विवाह के बाद उनकेप्यार व अपनत्व का स्त्रोत उनकी माँ और 1950 में विभाजन का सदमे के चलते उनके पिता भी चल बसे। शुरूआती दिनों में जब उन्होंने स्वर्णकारी के पारिवारिक कारोबार को छोड़कर फिल्म के अनिश्चिक भविष्य की ओर जाने की घोषणा की तो...घर में खूब हंगामा हुआ...लेकिन मेंरे माता-पिता ने आश्चर्यजनक ढंग से मेरा साथ दिया क्योंकि मेरी पूर्व पत्रों से उन्हें खबर लग गई थी कि मेरे मन जेवरात के काम में नहीं लग रहा है।(पृ.46) राधू ने पहले तो मैंने यह जानते हुए कि फिल्म लैब में काम करने वालों की जिंदगी बहुत अधिक नहीं होती (क्योंकि एसिड के धुंओं से फेफड़े नष्ट हो जाते थे) के बावजूद फिल्म लेबोरेट्री में निगेटिव को हाथ से धोने का काम किया लेकिन अच्छे शारीरिक गठन व सिनेमाई पृष्ठभूमि के अभाव में कैमरा विभाग में काम करने के लिए लैब सहायक का काम उनके लिए जरूरी था। उससे वे यह भी समझा कि कैमरामैन क्या गलतियां करते है और वे क्यों होती है?’ खाली समय में वे कैमरे की गतिविधियों को बहुत ही बारीकी से देखा करते। उनके प्रारंभिक मार्गदर्शक वे कैमरामैन थे जिनके साभिप्राय अथवा अज्ञात हरकतों को मैं बाज की तरह गौर से देखा करता था।(पृ.46) स्टूडियों की वीरानगी में वे कैमरामैन भागवत वाशीकर के कैमरे के अंगो को राधू बड़े ही प्रेम और पवित्र भाव से छूते और फिल्मविहीन को इधर-उधर घुमाते। एक दिन वे पकड़े गए लेकिन उनके दृढ निश्चय, जिज्ञासुवृत्ति और लगन से प्रभावित होकर भागवत वाशीकर ने जो कुछ अत्यंत कठिनाई से सीखा था, उसे बहुत प्यार से सीखाया। सिनेमेटोग्राफी की कला के पहले गुरू भागवत वाशीकर उनके लिए हमेशा पिता सरीखे उद्दात व्यक्ति बने रहे। दिसंबर 1936 तक वे भागवत वाशीकर से उनका श्रेष्ठतम सीख चुके थे और जतीन दास जैसे कैमरे के उस्ताद के साथ काम करने के इच्छुक थे।

भागवत वाशीकर से मिले प्रशिक्षण की बदौलत अगस्त 1937 में वे जतीन दास के तीसरे सहायक बने। 1939 में वे जतिन दास के साथ उनके पहले सहायक के रूप में मुंबई आए और ए.के. कामदार के निर्देशन में सिरको प्रोडक्शन के साथ स्वामीव नई दुनिया में काम किया। उन्होंने उस समय अभिनेत्रियों के कैमरामैनों से होने वाले प्रेमसंबंधों का कारण अभिनेत्रियों द्वारा आत्मरक्षा में किया प्रयास बताया क्योंकिकैमरामैन खराब कोण से किसी हीरोइन को लगातार दिखाकर उसका भविष्य चौपट कर सकता था।(पृ.56) ऐसा इसलिए होता था कि हर चेहरे, कुछ खास कोणों से सिनेमाई और फोटोजेनिक लगते है। अजय कार व कानन देवी के सात-साथ खुद शांता आप्टे के साथ अपने संबंधों को भी वे इसी रूप में देखते है। उन्होंने ने भी भारत छोड़ो आंदोलन भाग लिया। बकौल राधू  उन दिनों संवाद लेखकों का आकलन इस बात से होता था कि सेंसर बोर्ड की सतर्क नजर से बचते हुए किस तरह वह राजनीतिक रूप से अर्थगर्भित द्विअर्थी संवाद लिख सकते है।(पृ.59) इसके ठीक विपरित आज के गीत अश्लील और द्विअर्थी होते है


(लेखक के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करिएगा.)
1946 में वे नितिन बोस से जुड़े। नितिन बोस हमेशा उन्हें प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते। लेकिन कम तनख्वाह और बोंबे टाकीज में प्रोडक्शन हाउस को लेकर चलते सत्ता संघर्ष के कारण वे राजकपूर से जुड़े और आर.के. स्टूडियो के कैमरा विभाग संभाला। समय के एक दौर में उन्होंने बांबे टाकिज जैस स्थापित स्टूडियों और नितिन बोस के साथ छोड़कर आर.के. स्टूडियों के साथ अनिश्चित भविष्य का चुनाव किया और समय ने उन्हें साबित किया। आवारा का प्रसिद्ध स्वप्न दृश्यबंध उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी जिस पर रूसी तकनीशियनों द्वारा फिल्माने की अफवाहें भी फैलाई गई। आवारा के प्रिंट की प्रोसेसिंग से निकले प्रारंभिक नतीजों व तकनीकी खामियों के संबंध में जो कुछ लिखा है वह सिनेमा जगत में विद्यमान सत्ता संघर्ष को रूपायित करत है कि कितनी आसानी से उदीयमान प्रतिभा की हत्या की जा सकती है। उन्होंनें जैक कारडिफ से आधुनिक रंगीन सिनेमेटोग्राफी सीखी और जाना कि सिनेमाई तकनीक के मामले में हम उनसे कम-से-कम बास साल पीछे थे। बकौल राधू करमाकर दूसरे देशों की तकनीकि प्रगति का मुकाबला भारत सिर्फ अपने हुनर और नए-नए प्रयोगों से कर पाया।(पृ.14) श्री 420 (1955) में पहली बार फोसर्ड पर्सपेक्टिवको आजमाया गया और इसके लिए उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। वे हमेशा सिनेमा के एक सामान्य विद्यार्थी की तरह सीखते रहने और प्रयोग करने के लिए जाने गए। उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य ओरसेन वैलेस की सिटीजन केन जैसी एक संपूर्ण फिल्म बनाना था। दुर्भाग्यवश 5 अक्टूबर 1993 को हुई एक सड़क दुर्घटना में वे हमसे बिछड़ गए और उनके स्वप्न से वंचित रह गए। लेकिन एक सामान्य किसान परिवार से निकला सिनेमा का यह कुशल चितेरा अपने नायाब सिनेमाई कर्म विशेषतः अपनी फोटोग्राफी और सिनेमेटोग्राफी से भारतीय सिनेमा पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ गया जिसके लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। कुल मिलाकर सिने-जिज्ञासुओं और विधार्थियों के लिए एक अनिवार्य पुस्तक।

पुस्तक :कैमरा : मेरी तीसरी आंख, लेखक – राधू करमाकर, अनुवाद – विनोद दास, पहला संस्करण-2010, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., 1-बी, नेताजी सुबाष मार्ग, नई दिल्ली-110002मूल्य-250 रूपए, पृष्ठ-164



Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template