कवि,लेखक और अनुवादक अशोक कुमार पाण्डेय - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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कवि,लेखक और अनुवादक अशोक कुमार पाण्डेय


जन्म:-चौबीस जनवरी,उन्नीस सौ पिचहत्तर 
लेखक,कवि और अनुवादक
भाषा में पकड़:-हिंदी,भोजपुरी,गुजराती और अंग्रेज़ी 
वर्तमान में ग्वालियर,मध्य प्रदेश में निवास 
उनके ब्लॉग:http://naidakhal.blogspot.com/

आज के समय में एक विरल रचनाकार हैं। इस अर्थ में कि उनकी रचनाएं हर बार चलकर उस आदमी के पास पहुंचती है जो सदियों से शोषित और प्रताड़ित है। बाजार के दबाव से आहत इस समय में जब कविता और कहानी लिखना भी एक 'फैशन' की तरह हो गया है, आशोक हर बार कविता से एक सार्थक उम्मीद तक की यात्रा करते हैं, बिना थके और लागातार। आज जबकि रचना और जीवन के एक्य की बातें बिसरा दी गई हैं, वे निजी जीवन के साथ रचना में भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रतिबद्ध हैं.

हिंदी का एक साधारण लेखक, तीन किताबें प्रकाशित, पहली 'मार्क्स-जीवन और विचार' संवाद प्रकाशन से और दूसरी 'शोषण के अभयारण्य- भूमण्डलीकरण और उसके दुष्प्रभाव' शिल्पायन से।कविता संकलन 'लगभग अनामंत्रित' भी शिल्पायन से आया है जो काफी चर्चा में है.अनूदित पुस्तक 'प्रेम' भी संवाद से प्रकाशित, दो और अनुवाद शीघ्र प्रकाश्य। कवितायें, लेख, कहानी आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं.

उनका खुद का लिखा परिचय:-क्या कहूँ अपने बारे में ... उस साल जन्मा जब देश में आपातकाल लगाया गया ... जवान हो ही रहा था कि मंडल के चक्कर में जेल हो आया ... विश्वविद्यालय में पहुंचा तो एक नयी दुनिया सामने आयी ... मार्क्सवाद से परिचय हुआ ... तबसे आजतक बस भटक रहा हूँ रास्तों कि तलाश में ... नौकरी की तलाश में गोरखपुर से दिल्ली फ़िर ग्वालियर ... नडियाद फ़िर अंततः ग्वालियर ..कि ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी थी !लिखना शुरू किया काफी पहले ... कविता ९७ में पहली बार वागर्थ में छपी ... फ़िर कुछेक और पत्रिकाओं में ... अगले १० साल कुछ नही लिखा.. २००६ से फ़िर शुरू किया और अनेक पत्र पत्रिकाओं में लेख,कवितायें, कहानी वगैरह छपे. समयांतर में लगभग नियमित लेखों ने थोडी बहुत पहचान दी. अब संवाद प्रकाशन से एक किताब मार्क्स-जीवन और विचार तथा शिल्पायन से एक किताब आई हैकविता संकलन और कुछ अनुवाद भी रहे हैं

प्रकाशित किताबें
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मेरा संकलन ‘लगभग अनामंत्रित’ में संकलित कविताएं बकौल कवि की आत्मछवि को ध्यान में रखते हुए कहें तो प्रधानत: राजनैतिक कविताएं हैं, दूसरे शब्दों में कहें, तो प्रत्यक्षत: प्रतिबद्ध कविताएं। अशोक कुमार पांडेय बड़े गहरे अर्थों में कविताकर्म को परिवर्तन के सक्रिय एजेंट के तौर पर देखते हैं। विषय संचयन से लेकर निर्वहन तक में यह बात दिखाई पड़ती है। जिस कविता से संग्रह का नाम लिया गया है, ‘लगभग अनामंत्रित’ वह ‘कविता को अपने हिस्से की असुविधा’ मानती है, क्योंकि उसके लिए सौंदर्य से लेकर प्रेम तक की परिभाषा अब तक मौजूद परिभाषा से भिन्न है। यही भिन्न होना कवि का लक्ष्य है। संग्रह की शुरुआत ही ‘सबसे बुरा दिन’ शीर्षक कविता से होती है और यह बात कवि के साथ-साथ पाठक को भी कचोट जाती है कि सबसे बुरा दिन वही होगा, ‘जब समझौते मजबूरी नहीं, बन जाएंगे आदत!’ यानी कि आज जो व्यक्ति जितनी निपुणता से समझौता करता है, वह उतना ही सफल है। इसी तरह ‘कहां होंगी जगन की अम्मा’ बदलते समय को लगभग अपेक्षित ढंग से देखती है। कहें तो, ‘जब हम ही उस गली में बरसों से नहीं गए, तो गली रहे न रहे क्या फर्क पड़ता है...?’ पर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम कविता में कम से कम एक ऐसी दुनिया बरकरार रखना चाहते है, जो यूं तो गायब होने के लिए फिलहाल के विकास की सोच में तो अभिशप्त है ही! या कहें तो महानगर खुद न केवल कस्बों, गांवों को निगल रहा है, बल्कि उनके खानपान को भी पंचतारा सजावट में बदल कर, उन्हें उनकी ही जमीन से काट रहा है! ‘काम पर कांता’ औरत के व्यक्ति बनने के सपने का अच्छा वर्णन है। अशोक की कविताएं बेहद विचारोत्तेजक और अर्थगर्भित हैं। -सुमन केशरी
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कवि-विचारक अशोक कुमार पाण्डेय की सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘मार्क्स जीवन और विचार’’ हिन्दी साहित्य में उस रिक्त स्थान की पूर्ति करती नज़र आती है, जो कार्ल मार्क्स के जीवन और चिंतन के सटीक चित्रण के अभाव में वर्षों से रिक्त पड़ा था। हिन्दी साहित्य अध्येताओं को एक ऐसी पुस्तक की चाह वर्षों से थी जो दुनिया के इस अर्थ मनीषी से बिना किसी लाग लपेट के हमारा अंतरंग परिचय, सहज और सुलभ रूप से करा पाती।
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 विगत कई एक वर्षों के प्रकाशकों का लेखा, जोखा, रुझान, पुस्तक मेला में हुई खरीद, फरोख्त का ब्यौरा आदि को यदि ध्यान से देखें तो विशेषकर एक बात उभरकर सामने आती है कि सूचनात्मक, ज्ञानवर्द्धक, सामाजिक, आर्थिक जैसे विषयों के उभार का यह समय है। साहित्यिक विद्या की पुस्तकें कविता, कहानी, उपन्यास, समीक्षा आदि की क्रय शक्ति इनकी अपेक्षा कमतर हुई है। यह मान्यता मेरी निजी नहीं बल्कि अखबारी सर्वेक्षण और प्रत्येक मेले के बाद प्रकाशकों द्वारा जारी किए गए संयुक्त बयान का संक्षिप्त सार है।


इस कथन से साहित्यिक और साहित्येतर विषयों के कद को यदि छोटा, बड़ा करके दिखने दिखाने की रस्साकसी में न पड़ें तो भी इससे एक बात बहुत स्पष्ट है कि पाठकों की पठनीयता के रुझान में इधर तेजी से परिवर्तन आया है। यही कारण है कि आज की तारीख में अरुन्धती राय, मेघा पाटेकर, महीप सिंह, मुद्राराक्षस, विमल जालान, प्रभृत अनेकशः लेखक अपने साहित्यिक लेखन की तुलना में साहित्येतर लेखन के कारण चर्चा के केन्द्र में अधिक रहे हैं।

इसी श्रृंखला की एक सशक्त कड़ी के रूप में बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, कहानीकार, प्रखर विचारक, सामाजिक आर्थिक विषयों के विश्लेषक अशोक कुमार पाण्डेय की पुस्तक ‘शोषण के अभ्यारण्यः भूमण्डलीकरण के दुष्प्रभाव और विकल्प का सवाल (शिल्पायन प्रकाशन, शहादरा, दिल्ली, मूल्य 200रु0) को देखा, पढ़ा और समझा जा सकता है।मेरी किताब...जानकारी के लिये क्लिक करें
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Screen Name       :-Ashok Kumar Pandey(Google Talk)
Website              :-http://asuvidha.blogspot.com
Email    :               -ashokk34@gmail.com
Facebook           :- http://facebook.com/kumarashok75

2 टिप्‍पणियां:

  1. पाण्डेय जी से पुराना परिचय है... आज कुछ और बातें जानने को मिली...

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  2. भाई आपने जो सम्मान दिया उससे अभिभूत हूँ...लेकिन जैसा कि मैंने आपको मेल से भी सूचित किया...इस टीम में कतिपय व्यक्तियों के रहते मेरा रह पाना संभव नहीं...

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