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'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल सलाहकार : राजस्थानी और हिंदी कवि नन्द भारद्वाज

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जून 09, 2011 | गुरुवार, जून 09, 2011

पिछले चार दशक से मैं हिन्दी और राजस्थानी में अपने लेखन-कार्य से जुड़ा हूं, लेकिन आज भी हर नयी रचना एक शुरूआत लगती है और संतोष तो बिरले ही होता है। लेखन मेरे लिए शौक या हॉबी का सबब कभी नहीं रहा, बल्कि यही मेरे जीने का तरीका है। कई बार लोग मुझसे लेखन की प्रेरणा को लेकर सवाल करते हैं तो मैं अवाक् रह जाता हूं। अगर संवाद मेरी जरूरत है, तो इसमें और किसी प्रेरणा को कैसे देखूं? लेखन मेरे लिए हमेशा संवाद की तरह ही रहा है – अपने समय के साथ और खुद अपने साथ भी। परिवार और परिवेश में कुछ कारण अवश्य बन जाते होंगे, जिनसे किसी रचनात्मक कार्य की शुरूआत संभव होती हो।
मैं गांव से आया हुआ व्यक्ति हूं, यह न कोई खूबी है और न कैफियत। वहां साहित्य या संस्कृति को लेकर ऊपरी तौर पर कोई स्वरूप या संकेत नहीं दिखाई देता, लेकिन उन संस्स्कारों की जड़ें शायद काफी गहरी थीं। उम्र के साथ ज्यों-ज्यों मेरी आंख खुलती गई और अपनी जड़ों की तलाश भी जारी रही तो मैंने पाया कि अद्भुत थे वे संस्कार और वह लोक-विरासत, जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ और अपना होश संभाला। मेरे बड़ों ने भी शायद यही अपेक्षा की थी कि मुझमें वही संस्कार और रुचियां विकसित हों, जो वे मुझ तक संजोकर लाए थे। खुद अपनी ओर से भी यही प्रयत्न रहा कि मैं उन चीजों को जानूं-समझूं। मैंने रुचि लेकर कोशिश की। इस लोक-विरासत से मिली रामायण, महाभारत की आख्यान-कथाओं को अपनी रुचि और उनकी प्रेरणा से जाना-समझा और सत्य, न्याय और लोकधर्म के प्रति एक बुनियादी आस्था अपने भीतर अंकुरित होते हुए महसूस की। उन्हीं स्कूली दिनों की शुरूआत में  मेरे एक प्रिय शिक्षक रहे – मास्टर लज्जाराम, जिन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि जीवन में अगर कुछ बेहतर करना है तो अच्छी शिक्षा बेहद जरूरी है। मेरे इसी प्रारंभिक जीवन-अनुभव से जुड़ी कविता है, ‘हरी दूब का सपना’, जिसके केन्द्र में उन्हीं का आत्मीय व्यक्तित्व और बिखरते सपने संरक्षित हैं।
साहित्य-कर्म को मैं जीवन के एक सहज कर्म की तरह ही लेता हूं – जैसे किसान खेती करता है, कारीगर कोई उपकरण बनाता है या एक शिक्षक शिक्षण का काम करता है। लिखना-पढ़ना मेरे लिए उतना ही सहज और जरूरी काम रहा है, जितने जीवन के दूसरे काम। यह बात अनुभव से ही जानी है कि रचनाकर्म किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नही होता, वह सुरुचि और सतत अभ्यास से विकसित किया जा सकता है। लेखन एक दायित्वपूर्ण कर्म अवश्य है, लेकिन कोई अगर इसे विशिष्ट मानकर करता है और स्वयं भी विशिष्ट होने के भ्रम में जीता है, तो न उससे वह कर्म सधता है और न वैशिष्ट्य ही बन पाता है।
अपने बहुविध रचनाकर्म में कविता को मैं अपने चित्त के बहुत करीब पाता रहा हूं। यद्यपि अन्य विधाओं के साथ भी मेरा वैसा ही आत्मीय रिश्ता रहा है। यह बात बाद में जानी कि अनुभव की प्रकृति और अभिव्यक्ति का आवेग ही यह तय करता है कि मुझे अपनी बात किस साहित्य-रूप के माध्यम से कहनी है। किसी प्रासंगिक विषय पर वैचारिक विवेचन प्रस्तुत करना जरूरी लगा, तो आलोचना या निबंध मुझे अनुकूल विधा लगी, अगर कोई जीवन-प्रसंग फिक्शन के बतौर बयान करना ज्यादा सहज और जरूरी लगा, तो कहानी या उपन्यास के आकार में उसे ढालने का प्रयत्न किया। इसी तरह नाटक, संवाद, संस्मरण आदि में भी मेरी दिलचस्पी रही है। लेकिन अभिव्यक्ति के इन विविध रूपों में कविता के प्रति मेरी लगाव कभी कम नहीं हुआ।
यों हर रचना अनुभव की पुनर्रचना का पर्याय मानी जाती है, लेकिन अपने तंई उस संवेदन को पूरी इन्टैसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना मैं रचना की अपनी जरूरत मानता हूं। कविता में अक्सर चीजों के साथ हमारे रिश्ते बदल जाते हैं। यह बदला हुआ रिश्ता हमें उनके और करीब ले जाता है। वहां पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं रह जाता और न पहाड़ कोई निर्जीव आकार। शब्द वही अर्थ नहीं देते, जो सामान्यतः उनसे लिया जाता है। अभिव्यक्ति लय में विलीन होती हुई कुछ तरल आकार ग्रहण करने लगती है और कम-से-कम शब्दों का सहारा लेते हुए मन की गहराई में उतरने का प्रयत्न करती है। यही प्रयत्न कविता को दूसी विधाओं से अलग करता है। यह काव्यानुभव जितना व्यंजित होकर असर पैदा करता है, उतना मुखर होकर नहीं। इसलिए अच्छी कविता के लिए यह जरूरी है कि वह अनावष्यक विस्तार के प्रति सतर्क रहे, भाषा के अपव्यय से बचे और इस बात का खयाल रखे कि अभिव्यक्ति में वह तराश और कसावट आखिर तक बनी रहे। रचनात्मकता की इन्हीं खूबियों के कारण कविता को मैं साहित्यिक अभिव्यक्ति का एक बेहतर फॉर्म मानता हूं। रचना के भीतर मूर्त होता जीवन-यथार्थ, उसमें अन्तर्निहित मानवीय सरोकार और उसके लक्षित पाठक-वर्ग से बनता रिश्ता ही यह तय कर पाता है कि कविता उसकी जीवन-प्रक्रिया में कितनी प्रासंगिक और प्रभावी रह गई है।
यहां यह उल्लेख कर देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इस सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के लिए मेरा मन अपनी मातृभाषा राजस्थानी में अधिक रमता है। यद्यपि अभिव्यक्ति के बतौर हिन्दी और राजस्थानी दोनों मेरे लिए उतनी ही सहज और आत्मीय हैं और दोनों में समानान्तर रचनाकर्म जारी रखते हुए मुझे कभी कोई दुविधा नहीं होती।
अपने साहित्य-कर्म को लेकर जब भी सार्वजनिक रूप से मान-सम्मान का कोई अवसर आता है और वहां अपनी भाषा को लेकर कोई रियायत या अतिरिक्त दया-भाव देखने में आता है, तो मेरा मन उद्वेलित हो उठता है। मुझ जैसे सैकड़ों राजस्थानी लेखक और करोड़ों मूक लोग आजादी के बाद से अब तक इस भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत हैं। मैं बिना किसी भावावेष के अपने मन की यह पीड़ा दोहराना चाहता हूं कि हमारा यह मान-सम्मान तब तक अधूरा है, जब तक इस भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं मिल जाती।
जिस भाषा में सात सौ वर्षों की समृद्ध साहित्य-परम्परा मौजूद हो, कविता, कथा, उपन्यास, नाटक, आलोचना और गद्य की तमाम विधाओं में पर्याप्त सृजन उपलब्ध हो, हजारों हस्तलिखित पाण्डुलिपियां और प्रकाषित पुस्तकें शोध-संस्थानों और पुस्तकालयों में अंटी पड़ी हों, लोक-कथाओं, लोक-नाट्यो,लोकगीतों और मुहावरों-लोकोक्तियों का अकूत भंडार बिखरा पड़ा हो, जो आजादी से पहले राजपुताना की रियासतों की राजभाषा रही हो, षिक्षा, कारोबार और आम बोलचाल का आधार रही हो, ढाई लाख शब्दों की नौ जिल्दों में फैला जिसका विषाल शब्दकोष अजूबे की तरह सजा हो, जिसका अपना अलग व्याकरण मौजूद हो, उस करोड़ों लोगों की सजीव और समर्थ भाषा को उसका उचित स्थान न मिले, तो उस पीड़ा को वही जान सकता है, जिसे इस वास्तविकता का अहसास हो।
पिछले चार दशकों में अपने साहित्य-कर्म के साथ मैं मीडिया में भी सक्रिय रहा हूं। इधर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार को कुछ लोग कला-साहित्य के लिए एक खतरे की तरह देखने लगे हैं, जबकि देखना उसे एक सकारात्मक चुनौती की तरह ही चाहिये। इस व्यावसायिक मीडिया की अपनी प्राथमिकताएं हैं। अपनी साख और बौद्धिक वर्ग में घुसपैठ के लिए वह साहित्य या कला-रूपों का मनमाना इस्तेमाल बेशक कर लेता हो, लेकिन साहित्य और कला से उसका रिश्ता कतई विश्वसनीय नहीं बन पाया है। यहां तक कि लोक-प्रसारण का दावा रखने वाली माध्यम इकाइयां भी अपने प्रयत्न के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं अर्जित कर पाई हैं।
व्यावसायिक मीडिया को हम जितनी आसानी से जनसंचार की संज्ञा से विभूषित करने लगते हैं, दरअसल वह उसके मूल मकसद के कहीं आस-पास भी नहीं होता। उस जन की भागीदारी वहां नगण्य है, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है।
लोग अक्सर इस तथ्य को गौण कर जाते हैं कि लोक-भाषा जन-अभिव्यक्ति का आधार होती है। प्रत्येक जन-समुदाय अपने ऐतिहासिक विकासक्रम में जो भाषा विकसित करता है और वह उसके सर्जनात्मक विकास की सारी संभावनाएं खोलती है। उसकी उपेक्षा करके कोई माध्यम जनता के साथ सार्थक संवाद कायम नहीं कर सकता।
उदारीकरण की प्रक्रिया में इधर बहुत से बाहरी दबाव अनायास ही बाजार में प्रवेश कर गये हैं। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऐसा माहौल बना दिया है, जैसे अब सारा मार्केट और सारे उपभोक्ता उन्हीं के इशारों पर चलेंगे, लेकिन सचाई इतनी सीधी और सरल नहीं है। यह व्यवसायीकरण भी जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा करके कहीं अपना पांव नहीं टिका पाता। इन कंपनियों को जब अपना उत्पाद आम लोगों तक पहुंचाना होता है, तो वे हिन्दी या कोई भारतीय भाषा ही क्या, उन भाषाओं की सामान्य बोलियों तक जा पहुंचती हैं। यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक-भाषाओं को अपनी ऊर्जा बचाकर रखनी है। साहित्य का काम इन्हीं लोगों के मनोबल को बचाये रखना है। यहीं एक लोक-कल्याणकारी राज्य की सार्थक भूमिका का सवाल भी सामने आता है। लोकतंत्र में लोक और तंत्र एक-दूसरे के पूरक होकर ही जिन्दा रह सकते हैं, अन्यथा न लोक चैन से जी पाएगा और न तंत्र ही साबुत रह पाएगा। दरअसल भाषा, साहित्य और संवाद के यही वे उलझे सूत्र हैं, जिन्हें सुलझाकर ही शायद हम किसी नये सार्थक सृजन की कल्पना कर पाएं।


सेवानिवृत वरिष्ठ निदेशक
दिल्ली दूरदर्शन केंद्र,
जयपुर 
उनके ब्लॉग:-
http://hathai.wordpress.com


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