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डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय का निबंध:-'उत्सव केन्द्रित दर्शन व हम'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जून 08, 2011 | बुधवार, जून 08, 2011

सदाशिव जी

 उत्सवों और विशिष्ट अवसरों का महत्त्व तो शायद विश्व व्यापी है पर भारतीय चित्त में इनका अतिमहत्व और सामान्य दिन के प्रति जो एक उपेक्षा भाव है उसमें कुछ रुग्णता सी झलकती है। कभी-कभी तो लगता है हम में से  अधिकांश लोग केवल कुछ विशिष्ट अवसरों की प्रतीक्षा में ही जीते हैं और जैसे उनके अधिकांश क्रिया-कलाप भी इन विशिष्ट अवसरों की प्रतीक्षा से ही प्रेरित होते हैं।

कई बार तो यहाँ तक लगने लगता है जैसे हमारी कई लंबी योजनाओं और कार्यों का लक्ष्य भी किसी विशिष्ट अवसर के अतिरिक्त कुछ न हो। लड़की को पढ़ाया जा रहा है तो केवल उस दिन के लिए जिस दिन उसे किसी उपयुक्त वर के साथ हाथ पीले करके भेजा जा सकेगा और लड़का पढ़ रहा है तो जैसे उस विशिष्ट दिन के लिए जिस दिन उसका नाम परीक्षा परिणाम वाले अख़बार की योग्यता सूची में देखा जा सकेगा। उस दिन से पहले जो कुछ होता है अथवा उस दिन के बाद जो कुछ होगा उससे जैसे किसी को कोई सरोकार नहीं है। जीवन में यदि कुछ अविस्मरणीय या महत्त्वपूर्ण है तो वे केवल विशिष्ट उपलब्धियों के अवसर हैं। 

हममें से अनेक लोग किसी विशिष्ट अवसर के लिए अपने औसत दिन की- औसत दिन की उपलब्धियों या उससे हासिल  हो सकने वाली खुशियों की- किसी भी सीमा तक उपेक्षा कर सकते हैं। एक दिन वे अपने तमाम मित्रों व संबंधियों को भोज दे सकें इसके लिए वे कई बार उस सामान्य उदारता में भी कमी कर सकते हैं जो उन्हें प्रतिदिन दूसरों के प्रति बरतनी चाहिए। क्या हमें ऐसे कई व्यक्ति नहीं मिल जायेंगे जो किसी शादी-ब्याह या कथा-भागवत के अवसर पर तो अपनी थैली का मुंह भामाशाहों की तरह खोल देते हैं लेकिन  जो अपने प्रतिदिन के व्यवहार में दस पैसों के लिए भी निहायत तंगदिल हो जाते हैं ?

    मैं यहाँ किन्हीं इक्का दुक्का अवसरों की चर्चा न करके उस समूचे सामाजिक सोच या दर्शन की बात कर रहा हूँ जो हमारे जनमानस को सामान्यतः संचालित करता है। प्रश्न इस बात को लेकर है कि आप सुन्दरता, व्यवस्था आदि को  हर  दिन  व हर पल में खोजते हैं अथवा किसी दिवस विशेष या अवसर विशेष में? यह सवाल उस प्रवृत्ति के संबंध में है जो जीवन के मूल्यवान अंश को प्रतिदिन के कार्यकलापों में न तलाश कर ख़ास दिनों में खोजती है, जो त्यौहार को महत्त्वपूर्ण व सामान्य दिन को महत्त्वहीन समझती है और जो सुख व आनंद को प्रतिदिन की व्यस्तता व श्रम के बजाय छुट्टी की फ़ुर्सत व अकर्मण्यता में ढूंढती है। प्रश्न यह है कि आप महँगा व विविध व्यंजनों से युक्त भोजन कभी-कभी करना चाहते हैं या चाहे उससेे कम महँगा और कम वैविध्यपूर्ण, फिर भी मोटे तौर पर स्वास्थ्यकर व रुचिकर भोजन प्रतिदिन करने में अधिक विश्वास करते हैं? अतिथियों, मित्रों व संबंधियों के प्रति स्वागत व आतिथ्य का भाव आपके मन में स्थाई रूप से विद्यमान रह पाता है या उसका प्रदर्शन आप केवल कुछ विशिष्ट अवसरों पर ही कर पाते हैं ? आपके घर-आँगन और गली मोहल्ले हमेशा साफ सुथरे रहते हैं अथवा उनकी सफ़ाई केवल कभी-कभी ही होती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि आपके आस-पास की सड़कों पर कई-कई दिनों तक खड्डे पड़े रहते हों और उनकी मरम्मत अक्सर उसी समय होती हो जब आपके क्षेत्र में किन्हीं मंत्रीजी का दौरा होने वाला हो?

यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हमारे यहाँ चीज़ंे जितनी सुन्दर उनके उद्घाटन या उनके औपचारिक निरीक्षण के समय दिखाई देती हैं उतनी उसके बाद नहीं दिखाई देतीं। हमारे अधिकांश अस्पतालों के गलियारे और वॉर्ड आपको उस समय के आसपास सबसे अधिक साफ़-सुथरे व व्यवस्थित मिलेंगे जब डॉक्टर वहाँ राउण्ड पर हों। संयोग से यदि वे ही डॉक्टर राउण्ड के उस निर्धारित समय के अलावा किसी अन्य समय पर उन्हीं वॉर्डों और उन्हीं गलियारों से निकलें तो वे शायद उन्हें उतने साफ़-सुथरे और व्यवस्थित नहीं पाऐंगे। 

आश्चर्य तो हमें इस बात पर होना चाहिए कि व्यवस्था व सफाई के उस अभाव पर वे डाक्टर भी उस इतर समय में हमें शायद ही कोई आपत्ति या टिप्पणी करते हुए मिलें। हमें इसमें कुछ भी लज्जाजनक नहीं लगता कि हमारे कई दफ़्तरों की कार्यकुशलता में तभी एक अस्थाई त्वरा देखने में आती है जब उनसे संबंधित प्रशासन कोई विशिष्ट अभियान अपने हाथ में लेता है। जैसे कार्यकुशलता भी किसी तंत्र का स्थायी गुण न होकर केवल कुछ विशिष्ट अवसरों पर प्रदर्शन की कोई वस्तु हो!                  

सार्वजनिक उपयोग के किसी भी स्थल को आप मुश्किल से ही कभी व्यवस्थित व गंदगी से मुक्त पाऐंगे। सार्वजनिक शौचालयों या स्नानघरों की टोंटियाँ आपको अक्सर टूटी हुई और उनके आईने आपको अक्सर ग़ायब मिलेंगे। जो सबके लिए है उसकी कोई एक व्यक्ति भला क्यों पर्वाह करे? विशिष्ट अवसरों वाला हमारा दर्शन वैसे भी व्यक्ति को केवल कुछ खास मौक़ों पर ही चीज़ों को व्यवस्थित रखने की प्रेरणा देता है। 

ऐसा कोई भी दर्शन जो समाज व जीवन की अधिकांश कुरूपताओं की अनदेखी करके चलता है मेरे विचार से मूलतः एक दरिद्र व असुन्दर दर्शन है। जब तक जीवन का प्रतिपल समृद्ध न हो तब तक उस जीवन की सार्थकता व सुन्दरता कैसे असंदिग्ध रह सकती है? यदि जीवन का अधिकांश भाग कुरूप रहे और उसमें केवल कुछ ही अवसर सुन्दरता के रहें तो इसे हम जीवन के प्रति एक विकृत सोच का ही उदाहरण कहेंगे। 

जीवन में महत्त्व तो इस बात का होना चाहिए कि उसमें व्यक्ति का सामान्य दिन कैसा बीतता है और उस व्यक्ति द्वारा जिया गया हर क्षण कितना अर्थवान साबित होता है। यदि हमारी प्रगति केवल एक मंज़िल और दूसरी मंज़िल से परिभाषित होती हो और यदि उसमें इन दोनों मंज़िलों के बीच के मार्ग का कोई लेखा-जोखा ही न हो तो क्या यह प्रगति की एक अपूर्ण परिभाषा नहीं कही जायेगी ?

विचारणीय यह है कि विशिष्ट अवसरों व उत्सवों की साधना का यह दर्शन कहीं एक नकारात्मक दर्शन तो नहीं है? कहीं यह अकर्मण्यता, आलस्य और कामचोरी का दर्शन तो नहीं है? कहीं इस दर्शन के अनुसरण से हमारी रुचि में, श्रम में, क्रियाशीलता में व रचनात्मकता में तो कमी नहीं आ गई है? क्या केवल साध्य पर दृष्टि जमाये रखने वाला दर्शन साधनों की गुणवत्ता की उपेक्षा तो नहीं करने लगता? जो दर्शन केवल  उत्सव पर निगाह रखता है वह क्या एक उत्सव व दूसरे उत्सव के बीच केवल एक अविशिष्टता का लम्बा सिलसिला नहीं देखता? जो मानसिकता छोटे कालखण्डों में सार्थकता  व पूर्णता की तलाश नहीं करती वह क्या अंततः अकर्मण्यता व कामचोरी को पोषण देने वाली मानसिकता नहीं है? क्या इस तरह का दर्शन हमारे द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले व्यक्तिगत प्रयत्नों की क्षीणता व दुर्बलता को बढ़ावा नहीं देता? आज यदि आम आदमी अपनी स्थिति को बदलने के लिए प्रतिक्षण स्वयं कुछ प्रयत्न करने के बजाय बराबर किसी नयी राजनीतिक या सरकारी शुरूआत का मुंह जोहने लगा है तो इसके पीछे भी कहीं इस दर्शन की ही तो कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं है?

    उत्सव के इस दर्शन से वस्तुतः समाज का कोई भी क्षेत्र अप्रभावित नहीं रह सकता। शिक्षा के क्षेत्र में तो इसका व्यापक प्रभाव बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। शिक्षा में जितना महत्त्व परीक्षा और परीक्षा परिणाम का है वह सीधे-सीधे इसी दर्शन का प्रतिबिम्बन लगता है। हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में इस बात का महत्त्व अधिक नहीं है कि छात्र ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर हर दिन कितना आगेे बढ़ता है; उसमें महत्त्व इस बात का है कि परीक्षा में वह कितने प्रतिशत अंक प्राप्त करता है। उसकी प्रगति अक्सर एक परीक्षा से दूसरी परीक्षा तक आंकी जाती है। यदि उसने एक परीक्षा पास कर ली है और यदि वह केरिअरिस्ट किस्म का छात्र है तो उसकी दृष्टि तुरन्त अगली परीक्षा पर केन्द्रित हो जायेगी। शिक्षा द्वारा उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में क्या परिवर्तन हो रहा है अथवा वास्तविक रूप से वह ज्ञान के क्षेत्र में कितना आगे बढ़ रहा है इससे जैसे उसे, उसके अभिभावकों, उसके शिक्षकों अथवा उसकी शिक्षण संस्था को कोई मतलब नहीं है। उनकी प्रतिष्ठा और उनकी उपलब्धियों में वृद्धि होती है तो केवल उस विशिष्ट दिन की बदौलत जिस दिन छात्र का नाम योग्यता सूची में छपता है। 

सह-शैक्षणिक अथवा पाठ्येतर गतिविधियों द्वारा छात्र का सर्वांगीण विकास भी अब जैसे शिक्षा के क्षेत्र में कोई ख़ास मायने नहीं रखता। संगीत, नृत्य, अभिनय, वाद-विवाद, खेल-कूद आदि में छात्र की प्रतिभा भी अब जैसे उस दिन के लिए है जिस दिन उसका सार्वजनिक प्रदर्शन कर वह कोई पुरस्कार हासिल कर सकेगा। अधिकतर सार्वजनिक संस्थाओं में वे प्रवृत्तियाँ जो छात्र के सांस्कृतिक व शारीरिक विकास की महत्वपूर्ण भूमिका निबाहती हैं किन्तु जो लम्बे और सतत् अभ्यास की अपेक्षा रखती हैं अब केवल एक औपचारिकता बनती जा रही हैं। इन गतिविधियों से छात्र के व्यक्तित्व का जो विकास होता है, जिसके कारण वह अपने आपको समाज के लिए अधिक उपयोगी बना पाता है, उसकी ओर जैसे अब लोगों का ध्यान ही नहीं जाता।
उत्सव और विशिष्ट अवसरों को अतिमहत्त्व देने वाले हमारे इस दर्शन से प्रभावित हम शायद यह भूल ही जाते हैं कि शिक्षा की सार्थकता उसे पाने वाले औसत व्यक्ति की सर्वांगीण प्रगति में है न कि गलाकाट प्रतियोगिता के इस युग में किसी एक शिक्षण संस्था के औरों से बाज़ी मार ले जाने वाले छात्रों की संख्या में। इसके प्रभाव में हम यह भी भूल जाते हैं कि किसी भी प्रगति में उसका हर चरण समान रूप से महत्त्व का होता है। यदि हम शिक्षा की तुलना किसी भवन के निर्माण से करें तो इस दर्शन के तहत हम जीवन की श्रेष्ठता में जैसे हर ईंट की मज़बूती के महत्त्व को नकार रहे होते हैं।

उत्सव के इस दर्शन को यदि हम अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों और आदर्शों के परिप्रेक्ष्य में देखने-परखने का प्रयत्न करें तो वह जहाँ हमें एक ओर हमारी सामंती मनोवृत्तियों की विरासत लगेगा वहीं दूसरी ओर उसका संबंध हमें हमारी व्यापक गरीबी, अधिक जनसंख्या और तज्जनित अभाव व कुरूपता से जुड़ा नजर आयेगा। सौन्दर्य, व्यवस्था और उदारता के लिए जब तक हमारे संसाधनों में पर्याप्त वृद्धि और उनके समान वितरण कर सकने वाले किसी तंत्र का विकास न हो तब तक इसमें शायद ही कोई बदलाव आये।
  
डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय,नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से जून,1991 में 'रचनाकाल ' में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )
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