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डॉ. रंजन जैदी की नई किताब पर जनार्दन मिश्र की समीक्षा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जून 10, 2011 | शुक्रवार, जून 10, 2011



राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक  'संस्कृत के चार अध्याय' में लिखा है कि  भारत में हिन्दू-मुस्लमान सदियों से साथ-साथ रहते आ रहे हैं, पर एक- दूसरे के बारे में उन्हें सही जानकारी नहीं के बराबर है.  प्रतिष्ठित लेखक-कवि, संपादक  डॉ. रंजन जैदी के संपादन में प्रकाशित पुस्तक हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान राष्ट्रकवि के इस कथन की पुष्टि करता है.(समीक्षक:जनार्दन  मिश्र)
डॉ. जैदी की पुस्तक में उनकी भूमिका सय्याद मुझसे छीन मत मेरी ज़बान को लेकर स्वनाम-धन्य कुल १२ लेखकों के आलेख संकलित है. आश्चर्य की बात तो यह है कि अपने को हिंदी के अच्छे जानकार मानने वाले सरकारी एवं निजी संस्थानों में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत अधिकाँश अधिकारीयों की जानकारियां इतनी अधूरी हैं कि उन्हें सही पता ही नहीं है कि हिंदी साहित्य में मुस्लिम साहित्यकारों का कितना बड़ा योगदान है.

 स्वनामधन्य हिन्दू आलोचकों ने भी इस तथ्य पर प्रकाश डालना उचित नहीं समझा. एक सच्चाई और भी है कि विभाजन की त्रासदी का प्रभाव हमारे तत्कालीन साहित्य पर भी पड़ा है. एक अरसे से हिदुओं द्वारा लिखे जा रहे साहित्य से मुस्लिम पात्र गायब होते जा रहे हैं, जबकि मुस्लिम साहित्यकारों के साहित्य से हिन्दू पात्र न तो आज़ादी से पहले गायब थे और न ही आज़ादी के बाद गायब हुए. उनके साहित्य, संस्कृत और समाज में पहले जैसा ही हिन्दुतान बना रहा. मुस्लिम परिवार में पैदा हुए सूफियों ने हुमायूँ पर फिकरे कसे तो वहीं मालिक मोहम्मद जायसी ने अलाउद्दीन खिलजी को भी नहीं बख्शा क्योंकि शासक वर्ग का एक ही धर्म होता है-शासन और सत्ता पर कब्ज़ा बनाय रखना. वो शासक चाहे मौर्या हो या अफगान, तुर्क हो या जाट, लोदी हो या गुर्जर, मुग़ल हो या राजपूत, ब्राह्मन हो या दलित. शासक अत्याचार करता है और शासित अत्याचार सहता है. जब कभी भी इन दोनों के बीच टकराव कि स्थिति जन्म लेती है तो क्रांति की परिस्थितियां तैयार हो जाती हैं. संकलन में एक आलेख बिलग्राम के मुस्लिम साहित्यकार में शेख शाह मुहम्मद फार्मली, मीर जलील सय्यद मुबारक,  सय्यद निज़ामुद्दीन मघनायक,  सय्यद बरकतुल्ला प्रेमी,  मीर गुलाम नबी रसलीन तथा सय्यद मुहम्मद आरिफ जान बिलग्रामी के नामों की विशेष चर्चा की गई है. ये बिलग्राम की धरती के  वे प्रतिभा-सम्पन्न मुस्लिम हिंदी भाषा के कवि थे जिन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतर सेवा की. अब्दुल वाहिद और शाह मुहम्मद तो हुमायूँ एवं सम्राट अकबर के दरबार से सम्बद्ध थे. उनका अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत तथा हिंदी भाषाओँ पर अच्छा   अधिकार था. 

अब्दुर रहमान पंजाब के प्रथम हिंदी मुस्लिम कवि हैं.  उनकी कृति सन्देश रासक को डॉ. हजारी प्रसाद द्वेदी ने अपभ्रंश का बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रन्थ माना है.  बाबा फरीद ने फारसी मुल्तानी और कुछ समय हिन्दवी (हिंदी) मे रचना  की.  एटा के पटियाली गाँव  में जन्मे हजरत  निजामुद्दीन औलिया के शिष्य हजरत अमीर खुसरो  ने  पटियाली में अपनी कविता की रचना की. अमीर खुसरो के ९९ ग्रंथों में से २२ का ही पता चलता है. वे फारसी के चोटी के कवि थे. उनकी भाषा में जहाँ  ब्रिज तथा संस्कृत के शब्दों का प्रयोग मिलता है, वहीं खड़ी बोली का शुद्ध रूप भी अच्छी तरह से देखने को मिलता है.अब्दुर रहीम खानखाना,तनसे, रसखान, सूज़न और ताज ,जसे सैकड़ों ऐसे नाम हैं जिनकी रचनाओं को हिंदी साहित्य से यदि निकल दिया जाये तो हिंदी का कलेवर ही नहीं, आत्मा भी सिकुड़ जाएगी. 

इस पुस्तक में कोई ऐसा लेख नहीं है जिसे संख्या-पूर्ति करने की दृष्टि से संकलित किया गया हो.  डॉ. परमानन्द पंचाल,डॉ. शैलेश जैदी, डॉ. हर्मेंद्र सिंह बेदी, डॉ. माजदा असद,  नूर नबी अब्बासी, डॉ. ॐ प्रकाश सिंघल, डॉ. इक़बाल अहमद, डॉ. नफीस अफरीदी,डॉ. कौसर यजदानी, डॉ. रवींद्र भ्रमर एवं श्री दुर्गा प्रसाद गुप्ता के साथ-साथ डॉ. रंजन जैदी ने मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी साहित्य में योगदान विषय को रेखांकित  करने  वाले अपने अलग-अलग लेखो के माध्यम से विषय के साथ न्याय किया है. समग्रता में मूल्याकन किया जाये तो यह पुस्तक पाले हुए भ्रम का निवारण करती है आम पाठकों के साथ-साथ विद्वत-जनों एवं शोधार्थियों के लिए  भी यह पुस्तक विशेष रूप से पठनीय है.  

 पुस्तक : 
:मुस्लिम साहित्यकारों का हिंदी में योगदान,
संपादक;डॉ रंजन जैदी;

प्रकाशक : श्री नटराज प्रकाशन,
ए-५०७/१२, करतार नगर,
बाबा श्यामगिरी मार्ग,
 साऊथ गामडी एक्सटेंशन,
दिल्ली-५३, पृष्ठ:१५९; मूल्य : रूपये ३००.०० 

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