डॉ0 भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी की कविता 'सांझ का धुंधलका: उपयुक्त समय' - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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डॉ0 भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी की कविता 'सांझ का धुंधलका: उपयुक्त समय'

सूरज,
सात घोड़ो के
रथ पर सवार
अब अस्ताचल में पहुँचकर
विश्राम कर रहा है।
इस गोधूलि बेला में
पशु-पक्षी अपने-अपने
रैन बसेरों की तरफ-!
साँझ होते ही वृहत्त आकाश में
सितारे टिमटिमाने लगे हैं।
ऐसे में मेरा
चिन्तनशील मस्तिष्क सक्रिय होकर
बहुत कुछ सोचने और
चिन्तन करने लगता है।
क्या प्रजातन्त्र धुंधलाने
लगा है-?
ठीक उस तरह
जैसे गहन अंधेरे के पूर्व
अपने-अपने बसेरों
की तरफ रूख करते मवेशियों
के खुरो से
उड़ रही धूल से गाँव का
सीवान और पशु शालाएँ।
सोचने के क्रम में आगे
मंहगाई का आसमान पर
और नैतिकता का पाताल में होना
शामिल हो जाता है।
आतंकवाद
जिसकी पौ बारह है
जो निरन्तर लील रहा है
सम्पूर्ण मानवता को।
और किसानों की आत्महत्याएँ,
भ्रष्टाचार, अराजकता
हत्या, बलात्कार विकासशील
राष्ट्र की
पहचान बनने लगीं हैं।
यही नहीं मेरी
सोच नित्य होने वाले
प्रकृति एवं मानव जनित हादसों
पर भी चिन्तन करने को
विवश हो जाया करती है।
इन सबसे इतर-
सोचता हूँ
उन सभी माननीयों के बारे में
जो सरकारी वातानुकूलित
लाल बत्ती गाड़ियों में
बैठकर हादसा
स्थलों का
इस तरह दौरा करते हैं
जैसे
पर्यटन कर रहे हों।
सजे-सजाए मंचो पर लकदक
अभिनेताओं की तरह चढ़कर
पुष्पहार पहनकर
भाषण देते हैं,
सम्मान पाते हैं, पुरस्कृत
किए जाते हैं।
सोचता हूँ यह धुंधलका यानि
गोधूलि बेला ऐसों के
लिए उपयुक्त समय है-?
सोचिए आप भी
मैं तो बस इतना ही कहूँगा कि
यही धुंधलका (गोधूलि बेला)
उपयुक्त है
हम सभी के लिए
अपना-अपना जीवन जीने का।    



 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ0 भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
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