Latest Article :
Home » , » डॉ0 केदार सिंह की कवितायेँ

डॉ0 केदार सिंह की कवितायेँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जुलाई 14, 2011 | गुरुवार, जुलाई 14, 2011

साहेब


साहेब !
आपने कहीं देखा है
मेरी अलहड़ सी जवान बेटी को ?
तीन माह पहले एक ठेकेदार के साथ आई थी वह
इसी शहर के ईंट भट्ठे में काम करने के लिए
क्या कहा
उसका नाम बताऊँ ?
भला उस दुधिया चांदनी के समान
फुदकते नटखट टुकड़े का कोई नाम हो सकता है ?
आप शहरी लोग अपने बच्चों को
भले ही कोई नाम से पुकारते हैं
हम जंगली लोग तो उन्हें
उनके पाँव की आहट से सुनते हैं
और गंध से पहचानते हैं
क्या कहा वह यहाँ काम करने नहीं आई है ?
नहीं ऐसा मत कहिए साहेब
आज भी उस जंगली रास्ते ने
सहेज रखे हैं अपने सीने पर
उसके पाँव के अनगिनत निशान
विदा देते
पेड़ों की टहनियों के आँसू
हिलते पर्वतों के हाथ
थर्राते पक्षियों के चोंच
क्या कहा
उसकी कोई तस्वीर दूं ?
उसकी तस्वीर तो 
पठारी नदियों की तरह बलखाती
जंगली लताओं की तरह छरहरी
हिरणी की तरह शोख, चंचल
कुलांचे भरने वाली
आज भी मेरे जेहन में बसी है
क्या कहा -
उसके फटे कपड़े हैं आपके पास ?
नहीं ऐसा नहीं कहिए साहेब
मैं कलेजे के टुकड़े को
अपने सीने से लगाकर
वापस उन्हीं जंगलों में
लौट जाना चाहता हूँ
लौट जाना चाहता हूँ.........


-----------------------------
वन्स अपान ए टाइम (हाय!पाती)

वह अतीत की बात हुई
हम पाती लिखा करते थे,
दुःख-दर्द-खैरियत खर्च जमा
पाती से बाँचा करते थे।
रखते सहेज के प्रेम पत्र
ऐसे कि कोई देख न ले,
चुपके-चुपके एकांत क्षणों में
फिर-फिर बाँचा करते थे।
आती थी पाती से फिर-फिर
माँ की ममता बहनों का नेह
दादी-पापा की प्रीत-खीज
पाती से आँका करते थे।
पाती की भीनी खुशबू में
घर-घर की भौतिकी होती थी
मित्रों के लिखे लिफाफे में
कैशोर्य रसायन मिलते थे।
पाती से पाते थे भूगोल
उन खेतों के खलिहानों के
झगड़े खूँनस दालानों के
दर्शन पाती में करते थे।
घर के छप्पर पर फली सेम
कटुता-कद्दू-करेल-कुम्हड़ा
दादी के बोये बीज-कथा भी 
तब पाती में होती थी।
सब ‘हलो!’ ‘हाय! में सिमट गई
भावार्थ भरी लंबी बातें।
उत्तर-प्रत्युत्तर के चक्कर
जो भाव पत्र में भरते थे।




कुत्ते की मौत
कुत्ते की मौत मरना
अच्छा है
कुत्ते के लिए
आदमी के लिए नहीं
पर आज
कुत्ते की मौत
मर रहा है आदमी
क्योंकि कुत्ता आज भी
अपने ईमान पर है
भ्रष्ट और व्यभिचारी
हो गया है आदमी
फिर भी अपने
बंगले के गेट पर
लिखवाता है
‘कुत्ते से सावधान’
आदमी।



विस्थापन का दर्द

 जमीन के अन्दर
धधकती आग
ज्वालामुखी की तरह
विस्फोट
धँसती हुई जमीन
अन्दर ही अन्दर
कोयले की खान को
भस्मावृत्त करती
आग की लपेटें
शहर, बाजार
चौक, चौराहा
सड़क, दुकान
घर, द्वार
सभी के नीचे
धधकती आग
सभी को लील लेने को आतुर
सरकार द्वारा
शहर खाली कराने की नोटिस
वर्षों पहले जारी
आज अंतिम चेतावनी

बढ़ती हुई बिजली की खपत
को देखते हुए सरकार द्वारा
एक बड़ी विद्युत परियोजना का
शुभारंभ
लाखों लोगों को
बेघर करने की नोटिस नारी
एक सामान्य मुआवजे के साथ
पन्द्रह दिनों के अन्दर
खाली करने की
सख्त नोटिस
हरे-भरे आम के बगान
लंगड़ा, मालदा, दसहरी
शीशम, सखुआ, सागवान
बासमती, सोनाचुर धान
अरहर, गेहूँ, सरसों की
जमीन
उर्वर नहर वाली
सिंचित जमीन
हजारों किसानों द्वारा
अन्न उगाकर
लाखों के पेट भरनेवाली
जमीन को
खाली करवाने की
एक और नोटिस
सोना उगाने वाली
इस जमीन पर 
एक बहुत बड़ी फैक्ट्री
बनाने के लिए
सरकार द्वारा
एक बड़े उद्योगपति के साथ
एम॰ ओ॰ यू॰
तीन माह के अन्दर
जमीन खाली कराने
की नोटिस
नहीं तो सख्ती
कल-कारखाने
मोटर-गाड़ी
डैम, रेलवे स्टेशन
फैक्ट्री के नाम पर
एम॰ ओ॰ यू॰
नोटिस
विस्थापन
विस्थापन के दर्द को
इनमें से कोई नहीं जानता
न सरकार
न एम॰ ओ॰ यू॰ करने वाली
कम्पनी
न उद्योगपति
सिर्फ विस्थापित होने वाला ही
इसके दर्द को झेलता है
कभी जमीन के अन्दर लगी
आम के नाम पर
कभी डैम के नाम पर
कभी कल-कारखानों के
नाम पर 
तो कभी थर्मल पावर के
नाम पर
कर दिया जाता है
विस्थापन
हजारों, लाखों लोग
हो जाते हैं बेघर
दर-बदर की ठोकरें
खाने पर मजबूर
प्रकृति की कण-कण
पत्ती-पत्ती, बूटे-बूटे
से लगाव
नहीं छोड़ने देती
अपनी जमीन
अपना मकान
अपना घर-बार
अपना अड़ोस-पड़ोस
अपना समाज
अपना बाजार
मिट्टी की महक बाँधे रहती है
उनको अपने तन से
आदमी इसी लगाव के कारण
नीचे धधकती आग
के ऊपर अपने घर में
रहना चाहता है
बेघर होना नहीं चाहता
भष्मावृत्त हो जाना चाहता है
पर अपनी मिट्टी से
दूर नहीं जाना चाहता
उसे रोकती है
खूँटे में बंधी गाय
उसे रोकती है
चौराहे पर की अपनी दुकान
वह रूकना चाहता है
भाईचारा में बंधे
अपने पड़ोसियों के लिए
वह रूकना चाहता है
पूर्वजों की इस पवित्र धरती के लिए
इसी लगाव के कारण
खतरे की घंटी
सरकार की नोटिस
कोर्ट, कचहरी
थाना, पुलिस के बाद भी
वह नहीं छोड़ना चाहता
अपनी मिट्टी को
वह यह भी सोचता है
विस्थापित होकर जाएगा कहाँ
सरकारी स्तर पर
मुहैया की गई बंजर जमीन पर
जहाँ सड़कें नहीं
बिजली नहीं
पानी नहीं
बाजार नहीं
हॉस्पिटल नहीं
बच्चों के लिए स्कूल नहीं
और सरकारी दर पर
प्राप्त मुआवजे की राशि से
किसी अच्छी जगह पर
घर नहीं बना सकता
विस्थापन के दर्द को
सिर्फ
विस्थापित होने वाला
ही जानता है।
---------------

पानी वाला शहर

दो बुजुर्ग
बीते दिनों की याद ताजा कर रहे थे
दोनों आपस में इस शहर के
पानी के विषय में बतिया रहे थे
पहले इस शहर में 
पानी ही पानी था
गर्मी के दिनों में भी
नित्य दोपहर के बाद पानी बरसता था
पानी के कारण यह शहर दमकता था
अब पानी के लिए तरसता है
शहर के हरे-भरे बाग को
न जाने लग गई है किसकी नजर
हजार बागों वाली इस धरती से 
सारे बाग काट-काटकर
जब से शहर बनने लगा है
तभी से तो सूरज आग 
उगलने लगा है
और धरती बंजर बनी 
जा रही है
पहले कितना अच्छा था
बुढ़वा महादेव के पास वाला
मीठा तालाब, मुनका बगीचा
तालाब, मीठी झील और 
छठ तालाब के पानी से
शहर के सांसों में बनी
रहती थी नमी
हजार बागों वाला शहर
पानी वाला शहर कहलाता था
इन तालाबों को
शहर के पानी वाले 
लोगों ने बे पानी
कर दिया
अब पानी के लिए
शहर लड़ता है
और पानी के लिए तरसता है
शहर का कुछ हिस्सा
बोतल बन्द पानी से
प्यास बुझाता है
कुछ चापानल से काम चलाता है
कुछ हिस्सा सरकारी
नल पर आश्रित रहता है
और कुछ
पानी के लिए तरसता है
पहले पानी के कारण यह शहर
दमकता था
अब पानी के लिए तरसता है
पानी का एक मात्र मुख्य
स्रोत छड़वा डैम
इसके विषय में
आए दिन अखबारों में
छपता है
इस डैम में अब मात्र
10-15 दिनों के लिए
पानी रह गया है
एक वक्त पानी सप्लाई करने पर
पन्द्रह दिन 
दोनों वक्त सप्लाई करने पर
साढ़े सात दिन
इसके बाद डैम
सूख जायेगा
शहर बिन पानी के
झुलस जायेगा
इसके चेहरे पर काली
झुर्रियाँ पड़ जायेंगी
और आँखें पानी की
तलाश में भटकती रहेंगी
पानी वाली सरकार
हर साल लाखों रुपये
खर्च कर इस डैम को
गहरी करवाती है
पर दो वक्त का पानी
भी नहीं जुटा पाती है
डैम सूख जाएगा
नहीं बचेगा पानी
सिर्फ बच जाएगा
रेत ही रेत.......

------------------------

मीडिया धर्म

मीडिया धर्म है
नैतिकता, निष्पक्षता
करूणा, दया
रचनात्मकता
कला-वाणिज्य
ज्ञान-विज्ञान
मानवता
बेजुबानों की जुबान
विचारों का आदान-प्रदान
किन्तु आज की मीडिया
बाजारों की गुलाम बन गई है
और परोस रही है
चटपटी, मसालेदार खबरें
सच की झूठ, झूठ की सच
सेक्स, बलात्कार, सनसनी वाली
खबरें
भ्रष्ट राजनीतिज्ञ
भ्रष्ट नौकरशाहों
के खिलाफ
बीच चौराहे पर 
ज्वलनशील पदार्थ छिड़ककर
धू-धू कर जलने वाला
युवक हो या
रोती, बिलखती
अपनी अस्मत की रक्षा 
के लिए भीख मांगती
नग्न युवती
आज का मीडिया-धर्म है
उनका सीधा प्रसारण
सीधा, सहज, ज्ञानवर्द्धक
देश-दुनिया की खबरों
की जगह आज विज्ञापनों 
ने ले लिया है
इन्द्रजाल के समान
चैनलों की दुनिया
हजारों लाखों विज्ञापन
जितनी वस्तुएँ, उतने विज्ञापन
लगता है वस्तुओं की गुणवता
का ठेका इन्हीं विज्ञापनों ने ले लिया है
विज्ञापन के लिए 
नारी देह
नारी देह में भी
किसी खास एक अंग पर फोकस
उन्नत उरोज
नंगी कमर
नंगा कूल्हा,
भरा-पूरा नितंब
सुराहीदार गर्दन
केले के थम्भ के समान
सुडौल जांधे
चड्डी, बनियान पर
नग्न मस्त अदाकारा
भाती है विज्ञापनों को
विज्ञापनों के लिए चाहिए
नख से शिख तक
नुमाइश करती हुई
औरत देह 
बूट पालिश हो
साबुन, क्रीम हो
शैम्पू, लिपिस्टिक हो
बिन्दी, चूड़ी हो
पूजा की थाल हो
शेयर बाजार हो या
या बीमा कम्पनी
सभी के लिए 
विज्ञापन जरूरी है
महंगी शराब की बोतल
के भीतर
विज्ञापन करती
नग्न युवती
बेहतर नशा देती है
और नशा छा जाने पर लोग
धर्म, इंसानियत,
नैतिकता का विज्ञापन करते हैं
क्योंकि विचारों और समाचारों
की जगह
विज्ञापनों ने ले लिया है।
------------------------------

आखिरी बरगद

कल काट दिया गया
मेरे गाँव का आखिरी बरगद
यह बरगद बड़ा था
काफी बूढ़ा था
पता नहीं परिन्दे अब कहाँ
बनायेंगे अपने घोंसले
धूप और बरसात में
कहाँ होगा अब
गाय और बकरियों का बसेरा
अब कभी नसीब नहीं होगी
इस गाँव को बड़े पेड़ की छाया
बगुले और मैने अब कहाँ
डालेंगे अपना डेरा
कौन देगा छाया अब
तपती दोपहरी में
चरवाहों को और स्कूल जाते हुए बच्चों को
बारिश में भींग जायेगी मैना
और लू में झुलस जायेगा कौआ
मैना जो दाना चुगने के लिए
कभी-कभी आती है हमारे घरों में
और फुदकती रहती है हमारे
आस-पास
कौआ जो मुंडेर पर
बैठकर शुभ संदेश सुनाता है
और अतिथियों के आने की
सूचना देता है
सभी लू में झुलसकर
तड़प-तड़प कर अपनी जान दे देंगे
क्योंकि सोने के अंडे
देने वाली मुर्गी के समान
हलाल कर दिया लोगों ने
कल मेरे गांव के
आखिरी उस बरगद को
और उसकी लकड़ियों से
कोयला बनाकर बेच दिया
शहर में।



पत्थरों के शहर में खो गया है गाँव

पत्थरों के इस शहर में
खो गया है मेरा गाँव
छोड़ आया हूँ जबसे कच्ची दीवारें
खपरैल वाली छत
आंगन में गोबर का ठांव
तुलसी चौरा हो गया है वीरान
लहलहाती फसलों की सरगम नहीं
खेत-खलिहान भी हो गए हैं सुनसान
मेरे शहर आने के बाद
कुम्हला गया है मेरा गाँव
शहरों में पत्थरों का बोल-बाला है
यहाँ पतझड़ भी नहीं आता 
बसन्त के भी फटकते नहीं है पाँव
पत्थरों के इस शहर में
खो गया है मेरा गाँव
बहु मंजिली इमारतें हैं यहाँ
शीशे की खिड़कियाँ
कोयल की मीठी कूक नहीं,
मिलती नहीं है पेड़ों की
शीतल छाँव
पत्थरों के इस शहर में
खो गया है मेरा गाँव
यहाँ पत्थरों की दीवारों के
दिल नहीं होते
सिर्फ होते हैं कान
लोग जीते हैं बनावटीपन
का लबादा ओढ़कर
हवा भी बिकती है
पानी के लिए होती हाहाकार
गाँव में घास-फूस,
छप्पर वाले घर
होते हैं वातानुकूलित समान
नित्य कल-कल-छल-छल
आहर, पोखर, नदी, झरने करते,
सन-सन पवन, हिलोरें खाता
चूमता हमारे पाँव
पत्थरों के इस शहर में
खो गया है ऐसा मेरा गाँव
याद आती है बहुत
आम की अमराई
जामुन की बगिया
दरिया में खेते रहना नाव
पत्थरों के इस शहर में
खो गया है मेरा गाँव
मुझ अनागत के 
आगमन की प्रतीक्षा में
उम्मीद लगाए बैठा है गाँव
पर क्या करूँ
नौकरी-पेशे ने,
बच्चों की शिक्षा-दीक्षा ने
बाँध दिए हैं हमारे पाँव
पत्थरों के इस शहर में
खो गया है मेरा गाँव
खो गया है मेरा गाँव...........
---------------------------
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ0 केदार सिंह
स्नातकोत्तर, हिन्दी विभाग
विनोबा भावे विश्वविद्यालय,
हजारीबाग (झारखण्ड)
मो0: 09431797335
kedarsngh137@gmail.com
SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template