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'महज स्त्री होते हुए लिखना ही महिला लेखन नहीं है':- पद्मश्री डॉ चंद्रप्रकाश देवल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जुलाई 01, 2011 | शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

 उद्घाटन सत्र:-साहित्य अकादेमी नई दिल्ली द्वारा प्रयास संस्थान चूरू के स्थानीय समन्वय से राजस्थानी भाषा में महिला लेखन पर केंद्रित सम्मेलन ‘झीणां सुरां री पड़ताल’ का आयोजन 25 जून शनिवार को चूरू के होटल सनसिटी पैलेस में किया गया। आयोजन में प्रदेश भर से महिला लेखकों ने शिरकत की। सम्मेलन का आरंभ साहित्य अकादेमी में राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के संयोजक तथा राजस्थानी के ख्यातनाम साहित्यकार पद्मश्री डॉ चंद्रप्रकाश देवल व अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डॉ देवल ने कहा कि महिला स्वतंत्रता के नाम पर प्रचलन में आ रही फैशनेबल चीजें घातक हैं, 

महिलाओं को उनके वास्तविक हक मिलने चाहिए। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं अपने होने को समझेंगी, तब वास्तव में अपने होने की पैरवी कर सकेंगी और तभी कालजयी साहित्य का सृजन होगा।  उन्होंने कहा कि महज स्त्री होते हुए लिखना ही महिला लेखन नहीं है। उन्होंने कहा कि स्त्रैण चित्त, स्त्रैण अनुभव और स्त्रैण लेखनी के संयोग से राजस्थानी की लेखिकाएं अपने लेखन में आधी आबादी की पीड़ा और संकटों को स्वर देते हुए ऐसा उत्कृष्ट साहित्य सृजन करें कि उस सृजन पर पूरी दुनिया गर्व कर सके। उन्होंने राजस्थानी लेखिकाओं को चुनौती देते हुए कहा कि नारी की स्थिति-परिस्थिति, पीड़ा और चिंता का ऐसा चित्रण अपने साहित्य में कर दिखाएं कि हम गर्व से कह सकें कि वैसा इससे पहले कभी और किसी भी भाषा में नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि मीरा का नाम लेने मात्र से काम नहीं चलेगा, हमें उस स्तर के संघर्ष और सृजन की उत्कृष्टताओं को छूने का प्रयास करना होगा।  डॉ देवल ने कहा कि राजस्थानी साहित्य में आलोचना के विकास की फिलहाल सर्वाधिक जरूरत है। उन्होंने राजस्थानी में महिला लेखन पर केंद्रित पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की आवश्यकता जाहिर की।

बीज भाषण में प्रो. अर्जुनदेव चारण ने कहा कि एक रचनाकार हमेशा यह कोशिश करता है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच बढती जा रही दूरी किस तरह से कम की जाए। उन्होंने कहा कि राजस्थानी महिला लेखन में प्रकृति से गहरा रिश्ता झलकता है। उन्होंने कहा कि जिस तरह राह भटकते बेटे को घर में मां समझाती है, उसी के व्यापक परिप्रेक्ष्य में पूरे समाज के मार्गदर्शन की जिम्मेदारी लेखिकाओं पर है। उन्होंने कहा कि राजस्थान में महिला विमर्श की इतनी सशक्त बुनियाद रही है कि यहां मीरां ने 500 वर्ष पहले स्त्री के अस्तित्व और मनुष्य के अस्तित्व की लड़ाई लड़ी। आज हमें मीरां की ही उसी चिंतन  परंपरा को आगे बढाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राजस्थान की परिस्थितियों को देखते हुए यहां महिला लेखन की संभावनाएं सर्वाधिक है, आवश्यकता इस बात की है कि इन संभावनाओं को मूर्त रूप दिया जाकर सशक्त साहित्य सृजन हो। उन्होंने कहा कि हमारे पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को हर युग में हाशिये पर रखने की कोशिश की गई है। हमारे समाज ने स्त्री को महिमामंडित तो खूब किया लेकिन अधिकार नहीं दिए। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में व्यक्ति के पास प्रेम के लिए भी स्पेस नहीं बचा है और इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि हम प्रेम करने के योग्य ही नहीं रहे हैं। हम खुद से ही अजनबी होते जा रहे हैं और ये आत्म-उन्मूलन के लक्षण हैं। 

प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अकादमी ने उन पर आयोजन के लिए भरोसा जताया, इसके लिए वे आभारी हैं। उन्होंने प्रदेश भर से आए साहित्यकारों व साहित्यप्रेमियों का भी आभार जताया। इस मौके पर अकादेमी के सहायक संपादक शांतनु गंगोपाध्याय ने स्वागत भाषण देते हुए अकादेमी की गतिविधियों की जानकारी दी। उद्घाटन सत्र का संचालन कमल शर्मा ने किया। 

राजस्थानी के पद्य लेखन पर चर्चा:- उद्घाटन के बाद राजस्थानी पद्य लेखन पर आयोजित प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ तारालक्ष्मण गहलोत ने कहा कि समाज में निरंतर आ रहे बदलाव के साथ महिला लेखकों के समक्ष खासी चुनौतियां उभर कर आ रही हैं और उनसे बचकर नहीं निकला जा सकता है। महिला लेखकों को उन चुनौतियों का सामना करते हुए श्रेष्ठ साहित्य का सृजन करना होगा। उन्होंने कहा कि स्त्री को केंद्र मंें रखकर पुरूष साहित्यकारों ने भी अच्छा लेखन किया है, जिसे दरकिनार नहीं किया जा सकता है। साहित्यकार डॉ उषा कंवर राठौड़ ने ‘मध्यकाल सूं आधुनिक काल रै दौर मांय राजस्थानी रौ महिला पद्य लेखन’ विषय पर अपने पत्रवाचन में कहा कि राजस्थान की सांस्कृतिक चेतना, इतिहास, दर्शन, भक्ति, नीति और आज का उदात्त मानवीय भाव व चिंतन यहां के महिला लेखन की ताकत बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि आधुनिक महिला लेखन में तर्क व चिंतन की प्रधानता है जिससे भाव व विचार असरदार ढंग से सामने आए हैं।  डॉ प्रकाश अमरावत ने अपने पर्चे मंें कहा कि नए विषय, भाव, बिंब, कथ्य और नए प्रयोेगों के साथ राजस्थानी महिला लेखन लगातार आगे बढ रहा है। उन्होंने कहा कि परंपरागत छंदों के अलावा राजस्थानी पद्यकार डांखळा, सोनेट, हाइकू, क्षणिकावां व टुणकला के जरिए भी साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। डॉ चांदकौर जोशी ने अपने पत्र में कहा कि राजस्थानी महिला लेखकों ने सराहनीय सृजन किया है लेकिन इस दिशा में अभी बहुत काम शेष है। उन्होंने कहा कि महिला लेखकों को समाज में फैली कुरीतियों को केंद्र में रखकर साहित्य का सृजन करना चाहिए। इस सत्र का संचालन युवा रचनाकार विश्वनाथ भाटी ने किया। 

राजस्थानी गद्य लेखन पर विचार-विमर्श:- साहित्यकार डॉ प्रकाश अमरावत की अध्यक्षता में आयोजित दूसरे सत्र में साहित्यकार विमला भंडारी ने ‘मेवाड़ रै संदर्भ मांयं राजस्थांनी महिला लेखन’ विषय पर अपना पत्र पढते हुए कहा कि राजस्थानी साहित्य में नारी की वीरता और मातृभूमि की भक्ति से भरपूर चरित्र को प्रमुख रूप से उभारा गया है। उन्होंने कहा कि राजस्थानी साहित्य के आकाश में प्रकाश की उजली किरण दिख रही है और राजस्थानी साहित्य का भविष्य उज्जवल है। पुष्पलता कश्यप ने ‘कथा जगत मांय राजस्थांनी महिला लेखन’ विषय पर पत्र पढते हुए कहा कि लेखिकाओं को घर-संसार से आगे बढकर वैश्विक चिंताओं और मसलों पर भी अपनी कलम चलानी चाहिए। उन्होंने कहा कि विभिन्न विधाओं में राजस्थानी लेखिकाओं ने गद्य साहित्य को समृद्ध किया है। द्वितीय सत्र का संचालन तारानगर के युवा साहित्यकार देवकरण जोशी दीपक ने किया। 

कविता पाठ के साथ हुआ समापनः समापन सत्र में सम्मेलन का सार प्रस्तुत करते हुए युवा रचनाकार गीता सामौर ने कहा कि आधुनिक राजस्थानी महिला लेखन में और अधिक सशक्त एवं कालजयी सृजन की दरकार है। उन्होंने कहा कि लेखन की सार्थकता तभी है जब हृद्य की बात हृद्य तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि राजस्थानी के पुरूष लेखकों ने भी स्त्री विमर्श को लेकर जोरदार साहित्य का सृजन किया है। 

इस सत्र में कवयित्रियों द्वारा प्रस्तुत रचनाओं ने श्रोताओं का मनोरंजन किया। डॉ कविता किरण ने राजस्थानी गजल ‘जीवड़ा मांय ढळगी रात...’ सुनाकर खूब दाद पाई। मीराबाई पर केंद्रित उनकी कविता भी खूब सराही गई। शकंुतला रूपसरिया ने ‘रोतां नैं छोड गई रमकूड़ी प्यारी...’ के जरिए पिता के आंगन से बेटी की विदाई का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया तो ‘प्यारा म्हारा साजणिया सरदार... पेश कर भी सराहना पाई। डॉ शारदा कृष्ण ने ‘बीतगी आधी सदी इण आस में...’ के साथ-साथ अपनी लघु-कविताएं प्रस्तुत कीं। 

सम्मेलन में वरिष्ठ साहित्यकार बैजनाथ पंवार, भंवर सिंह सामौर, मुकन सिंह सहनाली, सोहन सिंह दुलार, रियाजत अली खान, डॉ जमील चौहान, श्याम सुन्दर शर्मा, रामगोपाल बहड़, माधव शर्मा, हरिसिंह सिरसला, महावीर नेहरा, बीरबल नोखवाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक व साहित्यप्रेमी मौजूद थे।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
दुलाराम सहारण
आकाशवाणी चुरू में किसानवाणी कोम्पीयर के दायित्व के साथ ही राज्य के चुरू जिले में प्रमुख रूप से सक्रीय सामाजिक संस्थान प्रयास के अध्यक्ष है और एक प्रखर संस्कृतिकर्मी के रूप में जाने जाते हैं.वे पेशे से वकील हैं.
,drsaharan09@gmail.कॉम
चुरू,राजस्थान
9414327734



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