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राष्ट्रभाषा और लिपि :-महात्मा गांधी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जुलाई 14, 2011 | गुरुवार, जुलाई 14, 2011

अगर हमें एक राष्ट्र होने का अपना दावा सिद्ध करना है, तो हमारी अनेक बातें एकसी होनी चाहिये। भिन्न-भिन्न धर्म और सम्प्रदायों को एक सूत्र में बांधने वाली हमारी एक सामान्य संस्कृति है। हमारी त्रुटियां और बाधायें भी एक सी है। मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि हमारी पोशाक के लिए एक ही तरह का कपड़ा न केवल वांछनीय है, बल्कि आवश्यक भी है। हमें एक सामान्य भाषा की भी जरूरत है। देशी भाषाओं की जगह पर नहीं परन्तु उनके सिवा। इस बात में साधारण सहमति है कि यह माध्यम हिन्दुस्तानी ही होना चाहिये, जो हिन्दी और उर्दू के मेल से बने और जिसमें न तो संस्कृत की और न फारसी या अरबी की ही भरमार हो। हमारे रास्ते की सबसे बड़ी रूकावट हमारी देशी भाषाओं की कई लिपियां है। अगर एक सामान्य लिपि अपनाना संभव हो, तो एक सामान्य भाषाओं का हमारा जो स्वप्न है अभी तो यह स्वप्न ही है। उसे पूरा करने के मार्ग की एक बड़ी बाधा दूर हो जायेगी।

भिन्न-भिन्न लिपियों का होना कई तरह से बाधक है। वह ज्ञान की प्राप्ति में एक कारगर रूकावट है। आर्य भाषाओं में इतनी समानता है कि अगर भिन्न-भिन्न लिपियां सीखने में बहुत सा समय बरबाद न करना पड़े, तो हम सब किसी बडी कठिनाई के बिना कई भाषायें जान लें। उदाहरण के लिये, जो लोग संस्कृत का थोड़ा भी ज्ञान रखते हैं, उनमें से अधिकांश को रवीन्द्रनाथ टैगौर की अद्वितीय कृतियों को समझने में कोई कठिनाई न हो, अगर वे सब देवनागरी लिपि में छपें। परन्तु बंगला लिपि मानों गैर बंगालियों के लिए दूर रहो की सूचना है। इसी तरह यदि बंगाली लोग देवनागरी लिपि जानते हों, तो वे तुलसीदास की रचनाओं की अद्भुत सुन्दरता और आध्यात्मिकता का तथा अन्य अनेक हिन्दुस्तानी लेखकों को आनन्द अनायास लूट सकते है। समस्त भारत के लिए एक सामान्य लिपि एक दूर का आदर्श है। परन्तु जो भारतीय संस्कृत से उत्पन्न और दक्षिण की भाषायें बोलते हैं, उन सबके लिए एक सामान्य लिपि एक व्यावहारिक आदर्श है, अगर हम सिर्फ अपनी-अपनी प्रान्तीयता को छोड़ दें। उदाहरण के लिए, किसी गुजराती का गुजराती लिपि से चिपटे रहना अच्छी बात नहीं है। प्रान्त प्रेम वहां अच्छा है जहां वह अखिल भारतीय देश प्रेम की बड़ी धारा को पुष्ट करता है। इसी प्रकार अखिल भारतीय प्रेम भी उसी हद तक अच्छा है, जहां तक वह विश्व प्रेम के और भी बड़े लक्ष्य की पूर्ति करता है। परन्तु जो प्रान्त प्रेम यह कहता है कि भारत कुछ नहीं, गुजरात ही सर्वस्व है। वह बुरी चीज है।

 मैं मानता हूं कि इस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण देने की जरूरत नहीं कि देवनागरी ही सर्वसामान्य लिपि होनी चाहिये क्योंकि उसके पक्ष में निर्णायक बात यह है कि उसे भारत के अधिकांश भाग के लोग जानते है। जो वृत्ति इतनी वर्जनशील और संकीर्ण हो कि हर बोली को चिरस्थायी बनाना और विकसित करना चाहती हो, वह राष्ट्र विरोधी और विश्व विरोधी है। मेरी विनम्र सम्मति में तमाम अविकसित और अलिखित बोलियों का बलिदान करके उन्हें हिन्दुस्तानी की बड़ी धारा में मिला देना चाहिये। यह आत्मोत्कर्ष के लिए की गयी कुरबानी होगी, आत्महत्या नहीं। अगर हमें सुसंस्कृत भारत के लिए एक सामान्य करने वाली किसी भी क्रिया बढ़ना रोकना होगा। हमें एक सामान्य भाषा की वृद्धि करनी होगी। अगर मेरी चले तो जमी हुई प्रान्तीय लिपि के साथ साथ में सब प्रान्तों में देवनागरी लिपि और उर्दू लिपि का सीखना  अनिवार्य कर दूं और विभिन्न देशी भाषाओं की मुख्य-मुख्य पुस्तकों को उनके शब्दशः हिन्दुस्तानी अनुवाद के साथ देवनागरी में छपवा दूं।

यंग इण्डिया, 27.7.25
हमें राष्ट्र भाषा का भी विचार करना चाहिये। यदि अंग्रेजी राष्ट्र भाषा बनने वाली हो तो उसे हमारे स्कूलों में अनिवार्य स्थान मिलना चाहिये। तो  अब हम पहले यह सोचंे कि क्या अंग्रेजी हमारी राष्ट्र भाषा हो सकती है?
कुछ स्वदेशाभिमानी विधवान ऐसा कहते हैं कि अंग्रेजी राष्ट्रभाषा हो सकती है या नहीं, यह प्रश्न ही अज्ञान का द्योतक है। उनकी राय में अंग्रेजी तो राष्ट्रभाषा बन ही चुकी है।

हमारे पढ़े लिखे लोगों की दशा को देखते हुए ऐसा लगता है कि अंग्रेजी के बिना हमारा कारोबार बन्द हो जायेगा। ऐसा होने पर भी जरा गहरे जाकर देखेंगे तो पता चलेगा कि अंग्रेजी राष्ट्रभाषा न तो हो सकती है और न होनी चाहिये।

तब फिर हम यह देखें कि राष्ट्रभाषा के क्या कारण होने चाहिये।

1 वह भाषा सरकारी नौकरों के लिए आसान होनी चाहिये।
2. उस भाषा के द्वारा भारत का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक कामकाज हो सकना चाहिये।
3. उस भाषा को भारत के ज्यादातर लोग बोलते हो।
4. वह भाषा राष्ट्र के लिए आसान हो।
5. उस भाषा का विचार करते समय क्षणिक या कुछ समय तक रहने वाली स्थिति पर जोर न दिया जाये।
अंग्रेजी भाषा में इनमें से एक भी लक्षण नहीं है।

पहला लक्षण मुझे अन्त में रखना चाहिए था। परन्तु मैंने उसे पहले इसलिए रखा है कि वह लक्षण अंग्रेजी भाषा में दिखाई पढ़ सकता है। ज्यादा सोचने पर हम देखेंगे कि आज भी राज्य के नौकरों के लिए वह भाषा आसान नहीं है। यहां के शासन का ढांचा इस तरह सोचा गया है कि उसमें अग्रेंज कम होंगे, यहां तक कि अन्त में वाइसरॉय और दूसरे अंगुलियों पर गिनने लायक अंग्रेज ही उसमें रहेंगे। अधिकतर कर्मचारी आज भी भारतीय हैं और दिन-दिन बढते ही जायेंगे यह तो सभी मानेंगे कि इस वर्ग के लिए भारत की किसी भी भाषा से अंग्रेजी ज्यादा कठिन है।

  • दूसरा लक्षण विचारते समय हम देखते हैं कि जब तक आम लोग अंग्रेजी बोलने वाले न हो जाये, तब तक हमारा धार्मिक व्यवहार अंग्रेजी में नहीं हो सकता। इस हद तक अंग्रेजी भाषा का समाज में फैल जाना असंभव मालूम होता है। 
  • तीसरा लक्षण अंग्रेजी में नहीं हो सकता, क्योंकि वह भारत के अधिकतर लोगों की भाषा नहीं है।
  • चौथा लक्षण भी अंग्रेजी में नहीं है क्योंकि सारे राष्ट्र के लिए वह इतनी आसान नहीं है।
  • पांचवें लक्षण पर विचार करते समय हम देखते हैं कि अंगेजी भाषा की आज की सत्ता क्षणिक है। सदा बनी रहने वाली स्थिति तो यह है कि भारत में जनता के राष्ट्रीय काम में अंग्रेजी भाषा की जरूरत थोडी ही रहेगी। अंगेजी साम्राज्य के कामकाज में उसकी जरूरत रहेगी। यह दूसरी बात है कि वह साम्राज्य के राजनीतिक कामकाज की भाषा होगी। उस काम के लिये अंग्रेजी की जरूरत रहेगी। हमें अंग्रेजी भाषा से कुछ भी वैर नहीं है। हमारा आग्रह तो इतना ही है कि उसे हद से बाहर न जाने दिया जाये। साम्राज्य की भाषा तो अंग्रेजी ही होगी और इसलिए हम अपने मालवीय जी शास्त्री जी बेनर्जी आदि को यह भाषा सीखने के लिये मजबूर करेंगे और यह विश्वास रखेंगे कि वे लोग भारत की कीर्ति विदेशों में फैलायेंगे। परन्तु राष्ट्र की भाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती। अंगेजी को राष्ट्रभाषा को राष्ट्र भाषा बनाना एस्पेरेण्टो दाखिल करने जैसी बात है। यह कल्पना ही हमारी कमजोरी को प्रकट करती है कि अंगेजी राष्ट्रभाषा हो सकती है। एस्पेरेण्टो के लिए प्रयत्न करना हमारी अज्ञानता का और निर्बलता का सूचक होगा।

तो फिर कौन सी भाषा इन पांच लक्षणों वाली है। यह माने बिना नहीं चल सकता है कि हिन्दी भाषा में ये सारे लक्षण मौजूद है। ये पांच लक्षण रखने में हिन्दी की होड़ करने वाली और कोई भाषा नहीं है। हिन्दी के बाद दूसरा दर्जा बंगला का है। फिर भी बंगाली लोग बंगाल के बाहर हिन्दी का ही उपयोग करते है। हिन्दी बोलने वाले जहां जाते है वहां हिन्दी का ही उपयोग करते है और इससे किसी को अचम्भा नहीं होता। हिन्दी के धर्मोपदेशक और उर्दू के मौलवी सारे भारत में अपने भाषण हिन्दी में ही देते है और अपढ जनता उन्हें समझ लेती है। जहां अपढ़ गुजराती भी उत्तर में जाकर थोडी बहुत हिन्दी का उपयोग कर लेता है। वहां उत्तर का भैया बम्बई के सेठ की नौकरी करते हुए भी गुजराती बोलने से इनकार करता है। सेठ भैया के साथ टूटी-फूटी हिन्दी बोलता है। मैंने देखा है कि ठेठ द्राविड प्रान्त में भी हिन्दी की आवाज सुनाई देती है। यह कहना ठीक नहीं कि मद्रास में तो अंगेजी से ही काम चलता है। वहा भी मैंने अपना सारा काम हिन्दी से चलाया है। सैकड़ों मद्रासी मुसाफिरों को मैंने दूसरे लोगों के साथ हिन्दी में बोलते सुना है। इसके सिवा, मद्रास के मुसलमान भाई तो अच्छी तरह हिन्दी बोलना जानते है। यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि सारे भारत के मुसलमान उर्दू बोलते है। और उनकी संख्या सारे प्रान्तों में कुछ कम नहीं है।

इस तरह हिन्दी भाषा पहले से राष्ट्र भाषा बन चुकी है। हमने वर्षों पहले उसका राष्ट्र भाषा के रूप में उपयोग किया है। उर्दू भी हिन्दी की इस शक्ति से ही पैदा हुई है। मुसलमान बादशाह भारत में फारसी-अरबी को राष्ट्र भाषा नहीं बना सके। उन्होंने हिन्दी के व्याकरण को मानकर उर्दू लिपि काम में ली और फारसी शब्दों का ज्यादा उपयोग किया। परन्तु आम लोगों के साथ अपना व्यवहार वे विदेशी भाषा के द्वारा नहीं चला सके। यह हालत अंग्रेज अधिकारियों से छिपी हुई नहीं है। जिन्हें लड़ाकू वर्गों का अनुभव है। वे जानते हैं कि सैनिकों के लिए चीजों के नाम हिन्दी या उर्दू में रखने पड़ते हैं।

इस तरह हम देखते है कि हिन्दी ही राष्ट्र भाषा हो सकती है। फिर भी मद्रास के पढ़े लिखों के लिए यह सवाल कठिन है। लेकिन दक्षिणी, बंगाली, सिंधी और गुजराती लोगों के लिए तो वह बड़ा आसान है। कुछ महीनों में वे हिन्दी पर अच्छा काबू करके राष्ट्रीय कामकाज उसमें चला सकते है। तामिल भाइयों के बारे में यह उतना आसान नहीं। तामिल आदि द्राविड़ी हिस्सों की अपनी भाषायें है और उनकी बनावट और उनका व्याकरण संस्कृत से अलग है। शब्दों की एकता के सिवा और कोई एकता संस्कृत भाषाओं और द्राविड़ भाषाओं में नहीं पाई जाती।

परन्तु यह कठिनाई सिर्फ आज के पढ़े लिखें लोगों के लिए ही है। उनके स्वदेशाभिमान पर भरोसा करने और विशेष प्रयत्न करके हिन्दी सीख लेने की आशा रखने का हमें अधिकार है। भविष्य में यदि हिन्दी को उसका राष्ट्र भाषा का पद मिले, तो हर मद्रासी स्कूल में हिन्दी पढ़ाई जायगी और मद्रास तथा दूसरे प्रान्तों के बीच विशेष परिचय होने की संभावना बढ़ जायेगी। अंग्रेजी भाषा द्रविड़ जनता में घुस सकी। पर हिन्दी को घुसने में देर नहीं लगेगी। तेलगू जाति तो आज भी यह प्रयत्न कर रही है।

(20 अक्टूबर, 1917 को भड़ौच में हुई दूसरी गुजरात शिक्षा परिषद के अध्यक्ष पद से दिये गये भाषण से।)

सच्ची शिक्षा पृ. 19-21, 22-23, 1959
जितने साल हम अंग्रेजी सीखने में बरबाद करते हैं, उतने महीने भी अगर हम हिन्दुस्तानी सीखने की तकलीफ न उठायें, तो सचमुच कहना होगा कि जन साधारण के प्रति अपने प्रेम की जो डींगे हम हांका करते है वे निरी डींगे ही हैं।

रचनात्मक कार्यक्रम, पृ. 39

वरिष्ठ पत्रकार हिम्मत सेठ

 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
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