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निसार भाई नहीं रहे और साहित्यकारों की संवेदनहीनता

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, जुलाई 18, 2011 | सोमवार, जुलाई 18, 2011


28 जून 2011 को सुबह 10-1बजे मोबाइल देखा तो एक sms आया हुआ था , जो लघुकथाकार भाई नदीम अहमद ‘नदीम’ द्वारा सवेरे 7: 26:55 am बजे भेजा गया था । खोल कर पढ़ा तो सन्न रह गया …दुबारा पढ़ा …नीचे भाग कर गया । दैनिक राजस्थान पत्रिका अख़बार मेन गेट के पास मोटरसाइकिल के सहारे अभी भी वैसे ही पड़ा था जैसे हॉकर द्वारा  फेंक कर जाने के बाद प्रायः हमेशा होता है ।… ख़बर तो नहीं छपी थी … लेकिन परिवार वालों द्वारा अपने प्रियजनों के मरने की सूचना वाले विज्ञापन होते हैं उससे अगले पन्ने में अलग से छपा चित्र देखते ही sms की बात सच साबित हो गई ।
आंखें छलछला उठीं … … …
क्या सचमुच निसार भाई नहीं रहे … … … !

पिछले महीनों में मेरी माताजी का स्वास्थ्य सही न रहने के कारण न तो मैं निसार भाई के यहां जा पाया था , और न ही यह भी याद आ रहा कि अक्सर आने वाले उनके मोबाइल कॉल का सिलसिला कब ख़त्म हुआ … … …
लगभग दस-बारह महीने पहले रहमान भाई ( निसार भाई के 25 वर्ष से भी अधिक पुराने मित्र/शागिर्द ) द्वारा अपना मकान बेच कर जयपुर जा बसने के बाद से निसार भाई का मेरे घर आना भी नहीं हुआ क्योंकि रहमान भाई ही अपनी गाड़ी पर उनको ले आते थे । मैं पहले की तरह आठ-दस हफ्ते से उनके यहां चला जाता … उनके फोन तो जब-तब मिल ही जाते थे … ( मोबाइल में एकाध वार्तालाप की रिकॉर्डिंग सुरक्षित है … उनके जाने के बाद उनकी आवाज़ को उनके ख़ास अंदाज़ में सुनते वक़्त हर बार आंखें भर आती हैं …)

मैं बीकानेर के साहित्यिक कार्यक्रमों से वर्ष 1999 के पूर्वार्द्ध के बाद जुड़ा था । पता नहीं कितने अनजान लोगों से संपर्क बढ़ता ही गया । शनिवार , 30 जून 2000 को प्रज्ञा संस्थान द्वारा मेरे प्रथम एकल काव्य पाठ से पहले निसार भाई सहित असंख्य साहित्यिक अभिरुचि और समझ रखने वाली हस्तियों का मैं प्रिय पात्र बन चुका था । निसार अहमद अनजान साहब को  निसार भाई के रूप में मैंने नौगजा पीर दरगाह में आयोजित एक मज़हबी तरही मुशायरे में शिरक़त के बाद एक दिन बी सेठिया गली में मुलाकात के बाद जाना । वे किसी चाय की दूकान के बाहर पट्टी पर बैठे थे । मैं साइकिल पर उधर से निकला तो एक तेज़ आवाज़ –‘अरे लाला राजेन्द्रजी ! रुकिये जनाब !’ सुन कर ठहर गया था । निसार भाई ने एक अन्य कविगोष्ठी में मेरे द्वारा पढ़ी गई  एक ग़ज़ल का शेर -
“ मुंह पर सुन कर दाद ओ नादां शाइर यूं महज़ूज़ न हो
मुमकिन है वह शोर हो गाली , वह तेरी वावाह न हो ”

हूबहू सुना कर मुबारकबाद देते हुए कहा –  ‘इसमें आपने महज़ूज़ का इस्तेमाल बहुत ख़ूबसूरती से किया … ’
उनकी याददाश्त कमाल की थी ।
चाय पिलाने के साथ उन्होंने अपनी जेब में लगे रहने वाले तीन-चार पेन में से एक निकाल कर मुझे देते हुए कहा कि -
लाला , जिसमें क़लम की इज़्ज़त रखने की कुव्वत और सलाहियत नज़र आती है उसे मैं क़लम भेंट किया करता हूं …’
मैंने कानों में इत्र के फाहे डाल रखे थे … उन्होंने ख़स की गंध की तारीफ़ की तो मैंने इत्र की फुरैरी निकाल कर उनके कान में लगा दी । उन्होंने कहा कि आइंदा कैसे काम चलेगा … मैंने अपने घर का ठिकाना समझाते हुए आने का आमंत्रण दे दिया   …और इस तरह हम दोनों का एक-दूजे के यहां आवाजाही का सिलसिला बन गया ।

निसार भाई के साथ मेरा रिश्ता बहुत निष्कपट और आत्मीयता से भरपूर था जहां औपचारिकता का नामो-निशान नहीं था । उम्र में मुझसे बड़े होने के बावजूद ऐसा एक भी दिन मुझे याद नहीं आ रहा जब मैंने उनके पांव छुए हों … (जबकि अपने पारिवारिक संस्कारों के कारण ऐसे अनेक कुटिल बुजुर्गों के भी पांव छूते रहना पड़ता है जिनके स्पष्ट दोगले व्यवहार के कारण उनके प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान की भावना मन से प्रस्थान कर चुकी है ।और उनका मेरे साथ अपनत्व और विश्वास का नाता था कि बहुत दिन मुलाकात या वार्तालाप को हो जाते तो मोबाइल पर नाराज़गी जताते हुए अधिकारपूर्वक कहते –‘ख़ुदा के बंदों ज़िंदा हो तो सबूत तो दिया करो … … …’ शीघ्र ही सामान्य होकर सबकी ख़ैरियत पूछने लगते ताज़ा कलाम सुनाते सुनते … और जल्द मिलने की बात करते ।

… और छोटा होने के उपरांत भी मुझे इतना मान देते कि उनके यहां जाने पर वापसी के वक़्त मना करने के बावजूद मुझे गली के नुक्कड़ तक छोड़ने आते । कभी उन्हें पता चल जाता कि  उनके यहां मुझे मेरे बच्चों में से कोई छोड़ने आया था तो यह समझ कर कि कहीं मेरी तबीयत नरम न हो इसलिए अपने भतीजों में से किसी को गाड़ी पर मुझे मेरे घर छोड़ कर आने को भेजते ।

सिगरेट पिया करते थे … लेकिन मुलाकात के दौरान हमेशा पूछ्ते कि धुएं से मुझे परेशानी तो नहीं हो रही… 

वे मेरी मां को काकी कहते थे । जब भी घर आते उन्हें सलाम कहते , पांव छूते , घर में सबको गिन गिन कर टॉफियां देते । मुझसे मेरे गीत-ग़ज़लें तरन्नुम में सुनते … मेरे एक गीत “ तुम जीवन की नव तरुणाई हो , और मैं ढलता यौवन हूं …” की अक्सर फ़र्माइश करते । मेरी तारीफ़ भी करते , यह भी कहते कि –
तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारी रचनाएं सुनने आता हूं ?

मैं तो काकी के दर्शन के लिए आता हूं … मेरी मां बिलकुल ऐसी ही थी … मुझे तुम्हारी मां में अपनी मां मिल जाती है … ’
निसार भाई से प्यार बढ़ा तो बढ़ता ही चला गया …
शुगर का मर्ज़ पाल रखा था उन्होंने ।  मेरी श्रीमतीजी को आते ही कह देते ‘बेटा , मेरे लिए बिना चीनी की चाय लाना ’ …दो-चार बार  के बाद तो श्रीमतीजी को ख़ुद ही याद रहने लगा , वह निसार भाई के कप में निशान के लिए चम्मच डाल कर ले आती । 

निसार भाई बिना चीनी वाली चाय को चम्मच से हिलाने लगते …
मैं और रहमान भाई हंसते कि चीनी है ही नहीं , क्या हिला रहे हैं … कहते-
मेरी बहू का प्यार कम मीठा थोड़े  ही है … अल्लाह उम्र दराज़ करे ,
मेरे छोटे भाई के घर में प्यार-मुहब्बत-बरकत में दिन-रात इजाफ़ा हो …’

वे जब भी फोन करते मेरी मां को सलाम के साथ मेरे तीनों बेटों गौरव , वैभव , विवेक का नाम लेना नहीं भूलते । मेरे बड़े बेटे के विवाह के बाद उन्हें हमारे परिवार की नई  सदस्य , हमारी बहू रेशम का नाम भी याद रहने लगा …और दिव्यांशी के रूप में मेरे घर पोती आ गई तो उसका नाम भी ।… उनके यहां जाता तब भी गिन कर आठ टॉफियां ज़रूर  देते … घर आने पर नन्ही दिव्यांशी की कम्प्यूटर पर वीडियो और फोटो देखते हुए अचानक उठ खड़े होते , जेब से चॉकलेट निकाल कर फोटो में दिव्यांशी के मुंह से लगा कर ख़ुश होते , कहते – ‘जनाब राजेन्द्रजी ! आप तो दादा हैं बस , मैं बड़ा दादा हूं दिव्यांशी का । ‘
आते तो वे अधिकतर शाम के बाद ही थे । संयोग ऐसा रहा कि उनकी दिव्यांशी से मुलाकात नहीं हुई कभी । उसके जन्म के बाद वे जब भी आए  … संयोग से दिव्यांशी ननिहाल गई मिली । …लेकिन एक भी फोन-मोबाइल वार्ता ऐसी नहीं रही जब उन्होंने मेरे पूरे परिवार के साथ  दिव्यांशी को याद न किया हो ।  एक बार उन्होंने कहा कि- 'अब दिव्यांशी लगभग डेढ़-पौने दो साल की हो जाएगी तब ही आना होगा मेरा आपके यहां । …या कभी भतीजे ( मेरे किसी बेटे को ) को गाड़ी लेकर मुझे लेने भेज दो तो आ पाऊंगा … ' ( मैं बतादूं कि निसार भाई भी स्कूटर-मोटरसाइकिल नहीं चलाते थे , मैं भी नहीं जानता …)
लेकिनअब वे हमेशा के लिए विदा लेकर जन्नतनशीं हो चुके हैं … … …

आज मैं याद करने बैठा हूं तो एहसास हो गया कि निसार भाई के मेरे साथ और मेरे परिवार के साथ जैसे आत्मीय संबंध , जितने इंसानी तअल्लुकात रहे हैं , उनके बारे में लिखना सहज नहीं ।

एक इंसान के रूप में निसार भाई विशुद्ध इंसान थे । मुसलमान की कट्टर छबि उनको छू भी नहीं गई थी । उन्हें गीता-रामचरितमानस के श्लोक और छंद ही नहीं , वेदों की ॠचाएं भी याद थीं । एक बार उन्होंने मुझे रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र सुनाया तो मैं हतप्रभ रह गया । पाक क़ुर्आन की आयतें और फ़ारसी में लिखे का अर्थ तो कई बार प्रसंगवश बताते ही थे ।

ग़ज़लों में सांप्रदायिक सौहार्द के भाव और उर्दू शब्दों के बीच ख़ूबसूरती से हिंदी क़ाफ़ियों को नगीने की तरह जड़ देने का उनका विशेष अंदाज़ कुछ दक़्यानूसों को चुभ भी जाता था ।

स्वयं को कुटिल लॉबियों के अनुरूप वे भी कभी नहीं ढाल सके थे … स्वयं के लिए कहते – ‘मैं तो औघड़ बाबा हूं , मुझसे बात करना हर किसी के बस का रोग नहीं … !’
वैसे , शाइरी में रुचि रखने वाले कई नौजवान उनसे इस्लाह लेने आया करते थे …

मस्तमौला ऐसे थे कि घर की प्रिंटिंग प्रेस होने के बावजूद भी अपना लिखा हुआ किताबों की शक्ल में लाने को कभी उतावले नज़र नहीं आए । … और तो और , अब तक उनकी एकमात्र प्रकाशित पुस्तक हादसाते-हयात उनके भाइयों-भतीजों द्वारा छाप कर तैयार कर देने के बावजूद भी उन्होंने उसे किसी अकादमीसंस्था या व्यक्ति विशेष  तक पहुंचा कर फ़ायदा उठाने की कोई कोशिश नहीं की । 1999 में उनसे परिचय के बाद उनके यहां जाना शुरू हुआ तो बिना बाइंड की हुई हादसाते-हयात  देख कर मैं और रहमान रूहानी कहा करते कि इसका  इज्रा ( लोकार्पण ) तो करालें …  हमारे बार-बार आग्रह के बाद ही 18 मई 2003 को इस पुस्तक का लोकार्पण कार्यक्रम मशहूर शाइर जनाब के के सिंह मयंक की उपस्थिति में संपन्न हुआ । इस कार्यक्रम में उनके ख़ास इसरारो-मुहब्बत के कारण मैंने उनकी दो रचनाओं की सस्वर प्रस्तुति दी ।

यहां इस अक्खड़ और कठोरसे लगने वाले इंसान के कोमल कलेजे की एक झलक प्रस्तुत करना चाहता हूं । मेरी तरन्नुम और गीत-ग़ज़लों की धुनें बनाने के मेरे विशेष गुण के कारण  एक बार उन्होंने रहमान भाई की मौजूदगी में अपनी लिखने की मेज के पीछे से एक बिना ज़िल्द की किताब निकाल कर कोई ग़ज़ल गुनगुनाने को कहा ।

वह हादसाते हयात देखने का मेरा पहला मौका था ।
मैंने पन्ने पलटे … हर रचना बह्र में , हर रचना मयारी !
मैंने छोटी बह्र की ग़ज़ल चुनी और गाने लगा –
आज उनको सलाम कर आए
ज़िंदगी को तमाम कर आए
चंद ख़ुशियां जो पास थीं अपने
आज वो उनके नाम कर आए
सुबह होते ही हम गए थे वहां
बातों-बातों में शाम कर आए 

हम तीनों उनके कमरे में पलंग पर बैठे थे  । ग़ज़ल पूरी होते होते अचानक निसार भाई ने किताब मेरे हाथ से छीन कर सामने दीवार की तरफ़ फेंक दी । मैं और रहमान दोनों चौंक गए । उनके चेहरे की तरफ़ देखा … निसार भाई रो रहे थे । कुछ लम्हे माहौल में ख़ामोशी बनी रही … फिर निसार भाई ने कहा – ‘ लाले ! रुला दिया तुमने … पत्थर को पिघला दिया  ! 
मेरी ही रचना का अर्थ अच्छी तरह से आज समझ आया मुझे … ’

… इस घटना को , तथा निसार भाई की और बहुत सारी बातों को याद करते हुए मन भर आता है । इसी तरह एक रविवार को तय हुआ कि आज , पूरा दिन सोने वाले निसार भाई सोएंगे नहीं , हम तीनों रहमान भाई  के यहां इकट्ठा होकर आपस में कलाम सुनेंगे-सुनाएंगे । छुट्टियों के कारण रहमान भाई के बीवी-बच्चे जयपुर ननिहाल गए हुए थे । मैं तय समय से घंटा भर से भी अधिक लेट पहुंच पाया । निसार भाई भी पहुंचे ही थे । रहमान भाई ने गोष्ठी देर शाम तक चलने की उम्मीद में समोसे नमकीन का पूरा बंदोबश्त पहले ही किया हुआ था । चाय बन रही थी तब तक पाकिस्तान के कई ग़ज़लकारों-गायकों की सीडी लगादी प्लेयर में … यह सिलसिला कुछ लंबा खिंच गया ।

मैंने हबीब वली मोहम्मद के गाए एक-दो नग़्मों के कुछ बंद गुनगुनाए …  निसार भाई अपने सोफे पर से उठे …  बिना कुछ बोले चप्पल पहनी , कमरे के दरवाज़े से निकल कर खिड़की खोल कर बाहर चले गए … … … 
वे सिगरेट पीते थे ,  हम सोचते रहे शायद सिगरेट लाने गए होंगे … लेकिन  दो-तीन घंटे जब तक हम आपस में सुनते-सुनाते रहे  वे नहीं आए … और निशस्त अधूरी ही रही …  … …
शब्द और स्वर की गहराई उन पर बहुत असर करती थी ।

निसार भाई के साहित्यिक अवदान के बारे में ईमानदारी से सही सही आकलन करना बड़ी चुनौति है … पांच हज़ार से अधिक ग़ज़लें , गीत क़त्आत , हम्दो-ना , मर्सिया , दोहे  कितना कुछ अदबी ख़ज़ाना उनकी डायरियों में है … । उनकी कई ग़ज़लों में सौ-सवा सौ शेर से ज़्यादा भी हैं  , नज़र मौजू पर तो उनका पूरा दीवान है । अभी तक उनका मह्ज़ 151 ग़ज़लियात का एक मज्मूआ हादसाते-हयात  मंज़रे-आम तक पहुंचा है । उनकी पचासों डायरियों में उनका जीवन भर का  अप्रकाशित सृजन अगर ग़लत और मतलबपरस्त हाथों में चला गया तो उनके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी हो सकती है ।जिन लोगों ने निसार भाई को उनके जीते जी किसी छोटे-से प्रशासनिक-अकेडमिक नाम-इनआम-सम्मान तक से महरूम रखा , सुर्खियों में बने रहने का हुनर जानने वाले ऐसे लोगों के माध्यम से उनके हक़ में अब भी इंसाफ़ होगा … इसके कम ही आसार हैं ।


आए दिन साहित्यिक आयोजनों का दम भरने वाले बीकानेर के अंदर के एक अलग ‘महान बीकानेर’ द्वारा  सच्चे गुणियों को जीते जी नकारने , उन्हें नाम-इनआम तथा साहित्यिक फ़ायदों-अनुदानों से हरसंभव तरीके से दूर रखने की महान परम्परा  निसार भाई जैसे पांच हज़ार से अधिक ग़ज़लों का सृजन करने वाले रचनाकार की मृत्यु के संदर्भ में भी कायम रही । तथाकथित कला-साहित्य से संबद्ध पचासों संस्थाओं और तथाकथित सैंकड़ों बुद्धिजीवियों में से किसी को इस अद्वितीय शायर को मरणोपरांत श्रद्धांजलि देने के लिए शोकसभा के लिए सत्रह दिन बाद भी न वक़्त मिला  न इच्छा हुई  ।  इस बीच एक कविसम्मेलन और दृष्टिपर्व  नामक त्रिदिवसीय साहत्यिक आयोजन सहित कई कार्यक्रम शहर में हुए भी…
हालांकि गुणी किसी एहसान का मोहताज़ जीते जी भी नहीं होता … !


मलाल इतना सा है कि मेरे प्यारे शहर में  सच्चे गुणी को मान-सम्मान इनआम-इकराम तो दूर … , उसके हक़ की पहचान तक से उसे वंचित किया जाता है … … …

धन्य है बीकानेर की साहित्यिक लॉबिंग ! )
छपते छपते : आख़िरकार 16 जुलाई 2011 को एक संस्था द्वारा निसार भाई की मृत्यु के बीसवें दिन उनकी स्मृति में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई । … और मुझ जैसे जो किसी भावी नुकसान से डरे बिना दोहरेपन के विरुद्ध लिखने-बोलने वाले हैं – उन पर एहसान भी जताया गया 


मरहूम
निसार अहमद बैंस अनजान’ बीकानेरी
की चार रचनाएं
आज उनको सलाम कर आए
ज़िंदगी को तमाम कर आए
चंद ख़ुशियां जो पास थीं अपने
आज वो उनके नाम कर आए
सुबह होते ही हम गए थे वहां
बातों-बातों में शाम कर आए
जाने क्या देखा उनकी आंखों में
जो गए दिल को थाम कर आए
ख़ुश्क ज़ाहिद दिखाई देते थे
पैश उनको भी जाम कर आए
उनके क़दमों में गिर पड़े थे मगर
जब उठे हाथ थाम कर आए
अब न अनजान’ रूठ पाएंगे
रूठना तो हराम कर आए
( साभार : हादसाते-हयात )
-निसार अहमद बैंस अनजान’ बीकानेरी
रात गए तक जाग चुके हैं अललसुबह कुछ आंख लगी है
जलती रही है साथ ही शम्मा आंख लगी तो बुझने लगी है
दूर तलक हैं धूप के साये बर्गो-समर का नाम नहीं है
रेत ही रेत है हद्दे-नज़र तक जोर से कितनी प्यास लगी है
लौट रहे हैं नीड़ के पंछी ढूंढ़  ही लेंगे अपना  ठिकाना
जिनका कोई घर-द्वार नहीं है सूने फलक पर आंख लगी है
भूलना चाहें भूल न पाएं छोड़ना चाहें छोड़ न पाएं
जितना ही उनसे दूर हुए हैं उनकी मुहब्बत और बढ़ी है
एक तेरे दीदार की धुन है परवाह नहीं जो राह कठन है
तेज़ क़दम अनजान’ डगर पर जिस्म की ताक़त चुकने लगी है
( साभार : हादसाते-हयात )
-निसार अहमद बैंस अनजान’ बीकानेरी
देर तक आज ज़िक्रे-यार चले
तीर इस दिल के आर-पार चले
चार दिन उम्र के गुज़ार चले
शोर बरपा हुआ निसार’ चले
उसका क्या दिल पे इख़्तियार चले
जिस पे शमशीरे-आबदार चले
पास जो कुछ  था वक्फ़ कर डाला
है सफ़र लम्बा किससे बार चले
जो उठे तेरी बज्म से सीधे
मिस्ले-मंसूर सू-ए-दार चले
तेरी रहमत को कब गवारा है
सर झुकाए गुनाहगार चले
उम्रे-रफ़्ता की याद आती है
सिर्फ़ धुन थी कि रोज़गार चले
मेरे मरने पे जश्न मत रोको
दुनियादुनिया है कारोबार चले
अलविदा अहले-गुलसितां ! हम तो
सू-ए-सहरा-ओ-खारज़ार चले
दावरे-हश्र ने पुकारा जब
हम ही अनजान’ ख़ुशगवार चले
( साभार : हादसाते-हयात )
-निसार अहमद बैंस अनजान’ बीकानेरी
शहंशाही तख़य्युल है मुकद्दर है फ़क़ीराना
कोई देखे तो किस अंदाज़ से जीता है दीवाना
लड़ाते आए हैं दैरो-हरम सदियों से इंसां को
मगर लड़तों को मिलवाता रहा है सिर्फ़ मयखाना
लगा है साये-सा पीछे ये शैतां जानले आदम
न इसकी बातों में आना पड़ेगा वरना पछताना
मज़ारों पर नहूसत का ज़रा तुम हाल तो देखो
कभी इन नाज़नीनों का भी था अंदाज़े-सुलताना
गया जो वक़्त हर्गिज़ लौट कर आता नहीं लेकिन
मैं फौरन दौड़े आऊंगा कभी तुम दिल से बुलवाना
न आहट ही हुई कोई न थी उम्मीद आने की
हमेशा याद आएगा तेरा चुपके से यूं आना
हमें अनजान’ कितना नाज़ है ज़ख़्मों पे मत पूछो
गवारा कैसे करलें दोस्तों फिर इनका भर जाना
( साभार : हादसाते-हयात )
-निसार अहमद बैंस अनजान’ बीकानेरी



 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



राजेन्द्र स्वर्णकार

बीकानेर ( राजस्थान )
मोबाइल : 09314682626
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