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उर्दू के प्रगतिशील, यथार्थवादी तथा धर्मनिरपेक्ष साहित्य को हिन्दी समाज तक लाने को प्रयत्नशील शकील सिद्दीकी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जुलाई 22, 2011 | शुक्रवार, जुलाई 22, 2011

उर्दू के विपुल और समृद्ध साहित्य को हिन्दी पाठकों तक अनुवाद के माध्यम से पहुँचाने का काम जिन लेखकों ने किया है, उनमें शकील सिद्दीकी प्रमुख हैं। ऐसी करीब डेढ़ दर्जन पुस्तकें होंगी जिनका अनुवाद या सम्पादन इन्होंने किया है। मिर्जा हादी रूस्वा, जमीला हाशमी, फहमीदा रियाज, सआदत हसन मंटो, वाजिद अली शाह, रामलाल, सरवत् खान, मेजर इसहाक, जाहिदा हिना जैसे उर्दू के मशहूर लेखकों का साहित्य इनके अनुवाद के माध्यम से हम हिन्दी पाठकों तक पहुँचा हैं। यही नहीं, ‘पहलके पाकिस्तान उर्दू कलम विशेषांक, ‘वसुधाके फैज और सज्जाद जहीर विशेषांक के सम्पादन में भी इनका योगदान रहा है। आज जब उर्दू की घोर उपेक्षा हो रही है, उसे साम्प्रदायिक नजरिये से एक खास सम्प्रदाय से जोड़कर देखा जा रहा है तथा उर्दू विरोधी माहौल तैयार किया जा रहा है, ऐसे में उर्दू के प्रगतिशील, यथार्थवादी तथा धर्मनिरपेक्ष साहित्य को हिन्दी समाज तक लाने का शकील सिद्दीकी का यह कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। 
इस दौर में जहाँ रचनाकारों को आलोचकों, लेखकों और मित्रों से यह शिकायत रहती है कि वे उनकी रचनाओं/कृतियों की नोटिस नहीं लेते, उन पर चर्चा नहीं करते और उन्हें उचित महत्व नहीं देते, वहीं शकील आज के दौर के ऐसे दुर्लभ रचनाकार हैं जिन्होंने अनुवाद के कार्य पर अपने को इस कदर केन्द्रित किया कि उनका कथाकार लगातार उपेक्षित होता रहा है, किसी और के द्वारा नहीं बल्कि स्वयं उनके द्वारा। हमारे सांस्कृतिक आन्दोलन में ऐसा अक्सरहाँ हुआ है जब आन्दोलन की जरूरत के तहत रचनाकार को ऐसी जिम्मेदारियों का वहन करना पड़ा है जिसकी वजह से उसका अपना रचनाकार उपेक्षित हुआ है। शकील सिद्दीकी के सम्बन्ध में यह बात देखी जा सकती है।

शकील सिद्धकी जी 
शकील सिद्दीकी मूलतः कथाकार हैं। पिछले तीन दशक से वे कहानियाँ लिख रहे हैं। सभी महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में ये छपी हैं। अन्य भाषाओं में भी इनके अनुवाद हुए हैं। लेकिन उनका पहला कहानी संग्रहकाली रातअभी हाल में प्रकाशित हो सामने आया है। इस संग्रह में कुल सत्रह  कहानियाँ हैं। यह उसरातकी कहानी है जिसमें अंधकार और खामोशी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं जिसमें डर इस कदर हावी है कि वह आम आदमी के अस्तित्व को ही दबोच लेना चाहता है। ये कहानियाँ समाज के उस कालेपन से रु--रु कराती हैं जिसमेंजानवरों का नही, औरतों का होता है सबसे ज्यादा शिकार यह वह समाज है जो औरतों के साथ जानवरों जैसा सलूक करता है, पर्दे के भीतर उनका शिकार करता है दरोगाजी को कौन कहे, यहाँदरोगाइनही कानून कोबाँसकर देने को तैयार है। यह ऐसी रात है जहाँदंगाका होना, ‘रेलवे लाइन पर लाशका मिलना आम बात है औरमृत्युएक संभावना है।

काली रातकी कहानियाँ गुदगुदाती नहीं, हमें परेशान करती हैं। यह उस समाज को बेपर्दा करती है जो बाहर सेसभ्यताका नकाब चढ़ाये है। दरअसल, ये उनकी कहानी है जो मेहनत मशक्कत करके अपना जीवन चलाते हैं और इन्हें धर्म और जाति के नाम पर बाँटकर राजनीति अपना स्वार्थ सिद्ध करती है। यह उन औरतों की कहानी है जिन्हें इस इक्कीसवीं सदी में भी इन्सान होने का दर्जा नहीं मिला है।काली रातइन्हीं की स्याह जिन्दगी की कहानी है। ये इनके द्वन्द्व और जद्दोजहद को सामने लाती हैं। डॉ रूपरेखा वर्मा ने शकील सिद्दीकी की कहानियों के बारे में सही ही कहा हैयह कहानियाँ अपने शिल्प से पाठकों को चमत्कृत तो नहीं करतीं लेकिन जिन्दगी की सच्चाइयों और उलझनों से रू--रू जरूर कराती हैं।

उम्मीद है कि ये कहानियाँ पढ़ी जायेंगी, पसन्द की जाएगी , भले ही शकील सिद्दीकी ने अपनी कहानियों के प्रति उपेक्षा का भाव रखा हो, पर पाठकों के द्वारा ये उपेक्षित नहीं होंगी। 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
लखनऊ-कवि,लेखक


और संस्कर्तिकर्मी
कौशल किशोर

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