महावीर समता संदेश के सम्पादक हिम्मत सेठ के नाम कैलाश बनवासी का पत्र - Apni Maati Quarterly E-Magazine

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महावीर समता संदेश के सम्पादक हिम्मत सेठ के नाम कैलाश बनवासी का पत्र



हिम्मत सेठ 
 ऐसे कठिन समय में अपने तय उद्देश्यों से ऐसा अखबार निरंतर 19 वर्ष निकाल पाना एक दुष्कर कार्य है जिसे आपने बिना किसी शोर-शराबे के किसी अचम्भे की तरह पूरा किया है।मन आपके इस दुस्साहस के प्रति गर्व से फूल जाता है। यह यात्रा कितनी कठिन रही है,इसे आप से बेहतर दूसरा और कोई नहीं जान सकता। अखबार के ताकत के पक्ष में दिया जाने वाला मुहावरा-‘जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो’-बहुत पहले पिट चुका है और लोकतंत्र के चौथे खंबे होने के गर्वोक्ति को वर्तमान मीडिया कब का भूल चुका  है। ये भी उसी नयी वैश्विक पूँजी का दास हो चुका है।मुझे आपके पत्र पर अपने तीसरे कहानी संग्रह का शीर्षक  याद आ रहा है-‘पीले कागज की उजली इबारत’,जिसे आपने शिक्षा पर केन्द्रित एक विशेषांक में छापा भी था।समता संदेश के मटमैले,चमक-रहित कागज में हमारे जीवन की वास्तविक जरूरतों की उजली इबारत लिखी जाती है।अपने आज को हम सभी देख रहे हैं.

,जिसमें मुझे यह तो दिखाई देता है कि समता लाने की बात करने वाली शक्तियाँ निरंतर हाशिये में जा रही हैं,और इस किस्म की प्रतिबद्ध पत्रकारिता महज किताबी और सपने सरीखी हो चली हैं,इसलिए इस दुष्कर समय में आपका डटे रहना मुझ जैसे बहुतों को हौसला देने वाला है।जिस वैकल्पिक पत्रकारिता की बात की जाती है उसे आपने संभव कर दिखाया है,तमाम आर्थिक-मानसिक कष्टों, असुरक्षा और खतरों के बावजूद।मेरा खयाल है ऐसा जज्बा और भविष्य की बेहतरी की ऐसी क्रियाशीलता आज विरल है। पहले कभी हुआ करते थे ऐसे  सिरफिरे।अब हम ज्यादा समझदार लोग हैं जो मौके का फायदा बहुत होशियारी से उठाने की कला में यों माहिर हैं कि साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।जिसे धूमिल कहते हैं कि विरोध में हाथ भी उठा रहे और कांख भी ढंकी रहे।हम आज ऐसे हूनरमंद  हो चुके हैं।

आपका आकलन कर पाना मेरी क्षमता से परे है। इसे आप ही वास्तविक रूप से जानते होंगे। जो मैं जानता हूँ वह यह है कि मनुष्य के बुनियादी जरूरतों में से एक शिक्षा पर आपने जो काम किया है,मेरे सामने कोई दूसरा उदाहरण नहीं हैं। इसके व्यापारीकरण,निजीकरण का सतत विरोध तथा इन्हीं नीतियों के चलते इससे वंचितों के लिए,इसके वास्तविक अधिकार के लिए जैसी मुहिम आपने छेड़ रखी है,इसे सलाम करता हूँ।गालिब कहते हैं ‘रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन!’लेकिन अब सब्र की भी इंतेहा हो चुकी है,और हालात जैसे बदतर हो रहे हैं उससे सारी उम्मीदें बुझने लगी है।निदा फाजली का एक शेर समता संदेश के संदर्भ में याद आ रहा है-

          जिन चरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं
          उन चरागों को हवाओं से बचाया जाए।  

जिस वंचित,दबे-कुचले वर्ग की बेहतरी का जिम्मा आपने उठाया है,उनकी स्थििति बद से बदतर होती जा रही है। औपचारिक शिक्षा आज जिस बर्बादी के कगार पर है,और विषमता की जैसी खाई आज निर्मित हो गई है,इससे बनने वाले भरत की कल्पना करके रूह कांपने लगती है। यह ऐसा भारत होने जा रहा है जहाँ 80 प्रतिशत से भी ज्यादे लोग अपने बुनियादी जरूरतों से महरूम रहेंगे। उनके विचार और चेतना के स्तर की बात ही क्या। एक डरावनी, स्याह तस्वीर  ही उभर कर आती है।ग्लोबलाइजेशन के चमक-दमक,और सहसा आई कुछ वर्गो में समृद्धि के चलते उपभेाक्तावाद बहुत खतरनाक हद तक समाज को ग्रस चुका है,और इसी के चलते जितनी तेजी और निर्बाध गति से अनैतिकता, भ्रष्टाचार अपराध बढ़ रहे हैं वह ऐसे किसी भी स्वप्न को बेमानी बना दे रहा है।आज विरोधी शक्तियाँ रूप बदलकर,हितैषी बनकर हमारे ही बीच रहकर हमारी जड़ें खोदने में लगी हुई हैं और सब कुछ हमारी आँखों के सामने होता चला जा रहा है। आंदोलन,संघर्ष या विरोध शायद पहले के किसी भी समय में इतने अप्रभावी नहीं थे जितने कि आज।संघर्ष जारी है,लेकिन इनका अपेक्षित असर समाज में नहीं बन पा रहा । इसे निष्प्रभावी करने के हजारों तरीके खोज लिए गए हैं और स्थिति जस की तस है। यह सच्चाई हमारे जज्बे को शिथिल बनाती है।  कथाकार ज्ञानरंजन ने एक जगह लिखा है,हमारा समय जैसे एक विशाल दैत्य है,हजारों हाथ वाला,हम महज कुछ मुक्के बरसा पा रहे हैं,जिससे उसका कुछ भी नहीं बिगड़ पा रहा।आज मीडियाकरों की चांदी है। साथ ही बड़े सुनियोजित ढंग से हमारे बुद्धिजीवियों ने अपना पाला बदलकर भूमंडलीकरण या उŸार आधुनिकता की लफ्फाजी में अपने फायदे का सुविधाजनक रास्ता निकाल लिया है, और सरकार चाहे किसी की भी हो,ये सबसे बड़े प्रेम से गलबहियां जोड़ लेने में माहिर हैं, इससे भी यह स्थिति बिगड़ी है।खैर। जमाने का रोना शुरू करो तो किसी बूढ़े की तरह बोलते ही चले जाना हो जा रहा है, जिससे बदलता तो कुछ नहीं,बस अपनी पीड़ा बखानकर हल्के हो जाते हैं।
    
आप यकीनन बहुत हिम्मतवाले हैं जो इन हालात में भी अपना संघर्ष और विरोध बनाए हुए हैं।जिन सपनों को लेकर यह पत्र चल रहा है,मैं इस राह में आपका अदना सा साथी हूँ,और आपके इन प्रयासों से कुछ तो सूरत बदलेगी,इसकी उम्मीद करता हूँ।

समता संदेश की बहुआयामिता,खासकर वैचारिक संदर्भ में,चाहे लोहिया हों या गांधी, आम्बेडकर हों या मार्क्स,सबसे आपने अपने लक्ष्यों को पाने की खातिर जोड़े रखा है,बगैर किसी के प्रति पूर्वाग्रह रखे हुए,यह भी समता संदेश की विशिष्ट बात लगती है।ऐसे समता संदेश हमें और-और चाहिए।इसलिए भी कि मौजूदा पत्रकारिता का काला ,समझौतापरस्त और धन-लोलुप चेहरा बुरी तरह उजागर हो चुका है और मुख्यधारा की पत्रकारिता अपनी व्यावसायिकता की भेंट चढ़ चुकी हैं। ऐसे में महावीर समता संदेश जैसे कुछ अखबार ही उम्मीद बचाए रखते हैं।इसके कलेवर में कुछ बदलाव समय के साथ हो सके तो अच्छा होगा। समता संदेश में युवाओं,सिनेमा,खेल से संबंधित विचार भी नियमित रूप से दिये जाएं,या समय-समय पर इन पर आधारित परिशिष्ट निकालें।स्थानीय समाचारों का कोई खास फायदा मुझ जैसे पाठकों को नजर नहीं आता,इसे महत्वपूर्णता के आधार पर ही प्रकाशित करें।

मैं इसके और-और फलने-फूलने की दुआ करता हूँ।

कैलाश बनवासी
४१-मुखर्जी नगर- सिकोलाभाटा-दुर्ग


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