यशवन्त कोठारी का व्यंग्य -'लिखने से मेरा पेट भरता है' - अपनी माटी

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यशवन्त कोठारी का व्यंग्य -'लिखने से मेरा पेट भरता है'

हालत ये है कि कुछ लोग नहीं लिखकर चर्चित हो जाते है, जबकि बहुत सारे लोग बहुत सारा लिखकर भी चर्चित नहीं हो पाते । लिखना, न लिखना, कम लिखना, अधिक लिखना, अच्छा लिखना, बुरा लिखना आदि समस्याएं हर समय हमें जिंजोड़ती है । लिखने के कारणों का खुलासा करते हुए एक स्तम्भकार कहते है लिखने से मेरा पेट भरता है, अखबार का पेट भरता है और अखबार के मालिक का पेट भरता है । इतने लोगों का पेट भरे ऐसा लेखन तो भाई सार्थक लेखन की श्रेणी में आता है, मगर साहित्य अकादमी न लिखने वालों को शाल, श्रीफल और चैक दे देती है, लिखने वाला, टापता रह जाता है ।

 मैं कहता हूँ  लिखो, जल्दी-जल्दी लिखो, डेड लाईन से पहले ही लिखकर ढेर कर दो । ऐसा लिखो कि सब चमत्कृत हो जाये । मैंने एक व्यक्ति को अपनी रचना सुनने के लिए बुलाया, उसने स्पष्ट कहा कि यह व्यंग्य मुझे नही उस मजलूम, विकलांग, मजबूर, बीमार, बूढ़े या बेरोजगार युवक को सुनाओं जो चौराहे पर खड़ा है और क्षितिज की ओर निहार रहा है । मेरे पाठक ने व्यंग्य सुनने से मना तो किया है साथ ही यह मुफ्त सलाह भी दी कि यह व्यंग्य उस नेता, अफसर, उद्योगपति को सुनाओं जिसने प्रजातंत्र को स्वयं के लिए मजातंत्र और जनता के लिए सजातंत्र बना दिया है । पाठक ने कहा अपना व्यंग उस फिल्म प्रोड्यूसर को सुनाओं जिसने जिस्म से सब कपड़े उतार दिये और रोड़ पर खड़ा होकर मर्डर करता है । अपना व्यंग्य उस डॉक्टर को सुनाओं जो नर्स को अपनी पत्नी समझता हो । अपनी लिखी रचना की ऐसी तेसी हो रही थी । इस सत्यानाशी कर्म के कारण मैं लिखने के कारणों पर फिर सोचने लगा । मुझे मेरा रसोई घर लिखवाता है, बच्चे की ट्यूशन फीस लिखवाती है, एक नई कमीज के लिए लिखता हूँ  मैं, कभी किसी गरीब की जेब नहीं काटता, किसी पैसे वाले की विरूदावली नहीं गाता। मैं लिखता हूँ  गो कि कतरा ए-खूं अपने जिस्म से अलग करता हूँ । आप पूछेगें साहित्य की सामाजिक उपयोगिता क्या है ? मेरा सीधा-सा जवाब है कि कद्रदानों की तबियत का अजग रंग है  आज बुलबुलों को हसरत है कि वे उल्लू ना हुए ।

 मौर के नाचने की सामाजिक उपयोगिता क्या है ? चांदनी की सामाजिक उपयोगिता क्या है? नदी की निर्मल धारा सा होता है, साहित्य और दोस्तों लिखने का कारण तो बच्चे की हंसी में होता है। कौन कहता है कि लिखने से कुछ नहीं होता, अवश्य होता है यदि एक पत्थर तो तबियत से उछालो । लिखने के कारण है - साफ खुली हवा, एक कतरा धूप और शान्त मन । जो लिख सकते है लिखे कोन रोकता है । क्या लिखता है, कैसा लिखता है, क्यों लिखता है ये सब लेखन के हथियार नहीं है । हमारा हथियार तो केवल एक रिफिल है जो तलवार से भारी है ।  लेखन केवल भाषा, शिल्प, शैली, कथन नहीं है । वह तो एक इतिहास की तरह है । सत्ताधारी और सत्ता को बेनकाब करता है, लेखन ।

 लिखना इसलिए भी आवश्यक है कि इससे किसी न किसी झूठ, मक्कारी, बेईमानी का पर्दाफाश होता है ।  श्रीमान् मैं आपका ध्यान असत्य, हिंसा, मारकाट, बलात्कार आदि की ओर खींचना चाहता हूँ. और यह लिखने के लिए पर्याप्त कारण है । घटिया लेखन की एक त्रासदी है और काल की कसौटी पर हर लेखन कसा जायेगा । अतः मित्र लिखो, खूब लिखो और जल्दी-जल्दी लिखो ।  जार्ज ऑरवेल ने कहा है सभी लेखक खोखले, आत्म केन्द्रित और आलसी होते है ये मेरे ऊपर भी लागू होता है । सभी लेखक लिखते समय भी नहीं लिखने के कारणों की खोज करते रहते है । अच्छा लेखन, खिड़की का पारदर्शी शीशा है, जिससे बाहर की दुनिया साफ, चमकदार और प्रकाशवान दिखाई देती है ।

    लेखन फास्ट फूड नहीं है, यह शॉपिंग माल का एस्केलेरट या लिफ्ट भी नहीं है, लेखन तो खुद को जीने का आधार है इसे अपने सीने से लगाये रखो । जीवन को सम्पूर्ण बनाता है लेखन ।  और अन्त में धूमिल की रचना को कुछ इस तरह से बयां किया जाना उचित होगा ।  साहित्य से रोटी तो तुम भी नहीं पाओगें ।
 मगर साहित्य पढ़ोगे तो रोटी सलीके से खाओगें ।

तीक्ष्ण व्यंग्यकार 

86, लक्ष्मी नगर,
ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर
फोन - 2670596ykkothari3@yahoo.com

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