भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास कानून 2011:-राष्ट्रव्यापी अभियान के हित ज़रूरी अपील - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास कानून 2011:-राष्ट्रव्यापी अभियान के हित ज़रूरी अपील


प्रियजनों,
आज देश के सामने भूमि अधिग्रहण एवं भ्रष्टाचार दो ऐसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दे हैं जिनसे समूचा देश जूझ रहा है। प्राकृतिक संसाधनों एवं मानव शक्ति पर निर्भर आबादी एवं आमलोगों के लिए निश्चित रुप से यह जीवन के संघर्ष का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। महत्वपूर्ण क्षेत्र सिद्धांत, principle of eminent domain (1894 भू अधिग्रहण कानून) के आधार पर भूमि एवंउससे जुड़ी तमाम चीजों को राजकीय संपत्ति घोषित कर दिया गया है। उपरोक्त कानून सरकार को सार्वजनिक उद्देश्य के नाम बलपूर्वक अधिग्रहण करने का भी अधिकार प्रदान करता है। वर्ष 1984 सेसंप्रभु सरकारें इस कानून का उपयोग निजी कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण करने में भी कर रही हैं और इस प्रकार इन सरकारों ने देश कृषक वर्ग, ग्रामीण एवं शहरी समाज के खिलाफ अन्यायपूर्णसंघर्ष की शुरुआत कर दी है। सार्वजनिक हित के नाम पर खनिज एवं जलीय संपत्ति का भी अभूतपूर्व दोहन किया जा रहा है। जिसका अनुचित लाभ इससे संबद्ध लोगों को मिल रहा है। इस गंभीरपरिस्थिति ने एक ऐसे तीव्र संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर दी है जिससे आदिवासी, दलित, किसान, मछुआरे, मजदूर जैसा हर वर्ग जुड़ा है जिसे विकास के नाम पर पीड़ित किया गया है। निर्वासितकर दिया गया है और अधिकारों से वंचित रखा गया है।

            3 अगस्त से 5 अगस्त तक NAPM ने विभिन्न राज्यों के 50 अन्य जनसंगठनों के साथ संघर्ष के बैनर तले आयोजित राष्ट्रीय अभियान में शिरकत किया(http://sangharshblog.wordpress.com/) यह बैठक भूमि अधिग्रहण एवं विस्थापन एवं पुनर्वास विधेयक के प्रारुप के प्रकाश में आयोजित किया गया जिस पर ग्रामीण विकास मंत्रालय ने31 अगस्त तक आम लोगों के विचार आमंत्रित किये है। प्रास्तावित प्रारुप में यह दावा किया गया है कि यह कानून पूंजीपति ताकतों से निरंतर संघर्ष का परिणाम है। हालांकि यहकानून मुख्य विषयों को पूरी तरह से अनदेखा कर रहा है और विकास जनति समस्याओं से प्रभावित लोगों के राहत में यह पूर्णतया अक्षम है।

            हम लोग विकास नियोजन के कानून की मांग कर रहे हैं कि अधिग्रहण कानून की जिसका अर्थ अधिग्रहण और अधिकार प्राप्त करना है। और पूर्व के अनुभवों से यह ज्ञातहोता है कि प्रायः अधिग्रहण बिना किसी पूर्व सूचना के और आम लोगों की इच्छा के विरुद्ध बल पूर्वक किया जाता है। इसके बावजूद की भूमि इस समाज के जीविका का एक मात्र श्रोत है। उनकी इच्छाएवं विचारों से अवगत होना आवश्यक नहीं समझा जाता। चूँकि यह कानून देश के विकास की जरुरतों की बात कर रहा है तो यह आम लोगों को ही निर्णय करने दिया जाये कि देश को किस तरह केविकास की आवश्यकता है।

            नए कानून में उन विस्थापितों के लिए भी राहत एवं पुनर्वास के प्रावधान होने चाहिए जो विभिन्न परियोजनाओं से पहले से ही प्रभावित है और जिनकेपुनर्स्थानपर एवं पुनर्वास की व्यवस्था अब तक नहीं की गई है। हम श्री जयराम रमेश के हाल के दिये गए वक्तव्य का स्वागत करते हैं कि प्रस्तावित कानून अतीत में आरम्भ हुई योजनाओं परभी लागू होगा एवं  किसी सरकारी परियोजना से प्रभावित होने वाले लोगों की रजामंदी को भी ध्यान में रखा आएगा एवं उन्हें अपने विचार देने के लिए आमंत्रति किया जाएगा। हालांकि हम यह फिर सेकहना चाहते हैं कि हमारा संघर्ष  प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर लाखों समुदायों के भूमि एवं जीविका संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए है, कि भूमि अधिग्रहण के लिए जिसकालक्ष्य 8 और 10 प्रतिशत के विकास दर को प्राप्त करना  है।

            हमारे संघर्ष का उद्देश्य जल, जंगल, जमीन, खनिज एवं मेहनत पर आम लोगों का अधिकार स्थापित करने के लिए है। एक तरफ हम विस्थापन एवं भू अधिग्रहण कीकिसी भी प्रक्रिया का पूरजोर विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ हम कानूनी प्रक्रिया में भी अपनी दखलंदाज़ी जरूरी समझते हैं ताकि हर कानून हमारे संघर्षो के लिए एक उचितहथियार बन सके. हमारा कहना है कि नये विधेयक को ग्रामीण एवं शहरी दोनों समस्याओं का निदान करना चाहिए और :

1.   विकास योजना को तरजीह दी जानी चाहिए जिसका आशय ऐसी योजना से है जो समानता एवं न्याय के सिद्धांतों पर आधारित हो। योजना निचले स्तर से ही लागू होनीचाहिए जिसमें ग्राम सभा एवं बस्ती सभा की भूमिका होनी चाहए जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 243 और इसके अन्दर 72वें एवं 73वें संशोधन में प्रावधान है।

2.  ऐसी संभावनाओं की तलाश की जानी चाहिए जहाँ कम से कम विस्थापन हो और वह भी सिर्फ सार्वजनिक  परियोजनाओं के लिए, जहाँ पर परियोजना से प्रभावितलोगों के अधिकार  को मान्यता हो और सार्वजनिक योजनाओं से प्राप्त लाभ में उनकी पहली हिस्सेदारी हो.

3.   भूमि एवं जीविका के अधिकारों की रक्षा, अनुचित लाभ के उद्देश्य से किये जा रहे कृषि भूमि के अधिग्रहण पर रोक एवं सार्वजनकि हित के नाम निजी हित साधने के लिएकिए जा रहे जमीन अधिग्रहण पर रोक लगे.

4. नए परियोजनओं की शुरुआत तब तक की जाए जब तक उससे जुड़े समुदाय की स्वतंत्र एवं पूर्व सहमति प्राप्त हो जाए। भूमि, जल, जंगल एवं खनिज का अधिग्रहणतभी किया जाए जब समुदाय द्वारा इसकी सहमति प्रदान की जाए।

5.  विस्थापित तब तक किए जाए जब तक कि पूर्व से विस्थापित लोगों का पुनर्वास की व्यवस्था हो। प्रस्तावित परियोजना से विस्थापित होने वाले लोगों की पुनर्वासका प्रबंध किया जाना चाहिए।

6. पर्यावरण की क्षति हो इसके लिए योजनाओं को सही एवं समयबद्ध क्रियान्वयन होना चाहिए। परियोजना के सभी पर्यावरणीय प्रभावों का ठीक-ठीक पूर्व निर्धारण होनाचाहिए।

विधेयक के प्रारुप पर 31 अगस्त तक विचार आमंत्रित किये गए हैं। इस संदर्भ में संघर्ष ने यह निर्णय लिया है कि निम्नांकित कार्यक्रमों को अतिशीघ्रता एवं शक्ति तथा उत्साह के साथ आरंभ कियाजाना है।  हम NAPM के सहयोगी संगठनो से यह निवेदन करते हैं कि वे इसमें हमारा सहयोग करें एवं हमारे संयुक्त प्रयास में भागीदार बनें।

1.      विस्तृत परामर्श कार्यक्रम का आयोजन - राज्य एवं क्षेत्रीय स्तरपर हमारे संघर्ष के अनुभव के आधार पर एक विस्तृत सुझाव तैयार किये जाएँ जो की मंत्रालय को 31 तारीखके पहले दिया जा सके. अब तक NAPM सदस्यों ने निम्नांकित परामर्श की योजना बनायी है: अगस्त 12 - नागपुर (विलास भोंगाड़े 9890336873), अगस्त 17 - मुंबई (सुनीतिस 9423571784), हैदराबाद - अगस्त 19 (रामकृष्ण राजू 9866887299), बंगलोरे (सिस्टर सलिया 9945716052), बिहार (आशीष रंजन झा 9973363664), धिनकिया,उड़ीसा - अगस्त 26 जुलाई (प्रफुल्ला समान्तर 9437259005), नर्मदा घाटी (श्रीकांत 9179148973)    

2.   तत्काल बातचीत की शुरुआतः  नए कानून और इसके संदर्भ में हमारे दृष्टिकोण जो कि उन संगठनों, संबंद्ध नागरिक समूहों, शोधकर्ताओं, कार्यकर्ताओं एवं अन्य बुद्धिजीवियोंसे आमंत्रित किये गए हैं।

3. हमारे विचारों का प्रसार-समाचार पत्रिकाओं, समाचार पत्रों एवं अन्य मीडिया माध्यमों के द्वारा

4.  संबंधित विषय पर अन्य संगठनों द्वारा आयोजित किए गए कार्यक्रमों में प्रतिभागिता एवं उनमें हमारे विचारों की प्रस्तुति।
5.  जन हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत: नए कानून से जुड़ी हमारी चिंताओं का स्पष्ट प्रकटीकरण जिसे लिखित में ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रमेश  को भेजा जाएगा।पताः श्री जयराम रमेश, ग्रामीण विकास मंत्री, कृषि भवन, नई दिल्ली-110001, ईमेल- jairam54@gmail.com

6.  जैसा कि दिल्ली में निर्धारित किया गया, 25 अगस्त को हमारे सहयोगी संगठनों द्वारा भूमि हक्क सत्याग्रह का आयोजन किया जाएगा और जिसमे भूमि, जल, जंगल,खनिज तथा जलीय संपदाओं पर हमारे अधिकारों के दावें को सुदृढ़ता के साथ प्रस्तुत किया जाएगा। विकास की संपूर्ण दिशा को परिवर्तित  कर उसेआम  लोगां के संसाधनों पर आमलोगों का अधिकारके सिद्धांत पर लागू किया जाएगा ताकि इन संसाधनों से आम लोगों का विकास हो सके।

इस बीच संघर्ष के प्रतिनिधियों के एक समूह द्वारा विधेयक से जुड़े बिंदुओं पर एक विस्तृत टिप्पणी तैयार की जा रही है जो कि हमारे पास लगातार रही, विभिन्न आंदोलनों से जुड़े व्यक्तियों केविचारों को भी ध्यान में रखेगी।हम अपने संघर्ष के एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़े हैं जहाँ हम अपने संयुक्त प्रयासों से एक सफल विकास नियोजन के कानून को पारित करा सकते हैं विस्थापन एवं भूअधिग्रहण के खिलाफ अपनी लड़ाई लड़ते हुए एवं प्राकृतिक संसाधनों के ऊपर सामुदायिक अधिकार स्थापित कर सकेंगे

  1. मेधा पाटकरयोगिनीश्रीकांतनर्मदा बचाओ आन्दोलन, NAPM 
  2. प्रफुल्ला समान्तर - लोकशक्ति अभियान, NAPM उड़ीसा
  3. पी चेन्नैःअजय कुमाररामकृष्ण राजूसरस्वती कवुला - NAPM आन्ध्र प्रदेश
  4. संदीप पाण्डेयरोमाअरुंधती धुरुजे पी सिंहमनेश गुप्ता - NAPM उत्तर प्रदेश 
  5. डॉक्टर सुनीलमआराधना भार्गव - किसान संघर्ष समिति, NAPM मध्य प्रदेश 
  6. अखिल गोगई - कृषक मुक्ति संग्राम समिति, NAPM असम
  7. सिस्टर सलिया - घरेलु कामगार संगठन, NAPM कर्नाटक 
  8. भूपिंदर सिंह रावतराजेंद्र रविमधुरेश कुमार - NAPM  दिल्ली 
  9. सुनीति  प्रसाद बागवे - NAPM महाराष्ट्र 
  10. विमल  भाई - मातु जन संगठन NAPM उत्तराखंड 
  11. आनंद मजगओंकरकृष्णकांतस्वाति देसाई - पर्यावरण सुरक्षा समिति, NAPM  गुजरात 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
एन..पी.एम, 6/6, जंगपुरा बीनई दिल्ली-110014
फोन - मधुरेश 98180.5316, 011-26241167
 इस विषय से जुड़े सारे दस्तावेज़ हिंदी और अंग्रेजी में आप यहाँ देख सकते हैं  http://napm-india.org/node/326
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