माणिक की कविता :-ऐंठी हुई हवेलियाँ - अपनी माटी

नवीनतम रचना

मंगलवार, अगस्त 02, 2011

माणिक की कविता :-ऐंठी हुई हवेलियाँ


देख नजारा थम गया मैं भी आज 
की जहां
किले में थमी हुई देखी 
अलग-अलग इमारतें 
एकसाथ आपस की बातें बेलती
कुछ दूर ऐंठी हुई हवेलियाँ थी 
गुर्राते महल थे खड़े एकओर
और अन्तोगत्वा गाँव के बाहर
धकेली हुई,मज़बूरन विकसित
नई आबादी की सी बड़बड़ाती झुग्गियां 
थरथराती मगर जुटाती हुई साहस
फुसफुसाने की हिम्मत जुटा 
कहती मन में उठती अपनी टीस
दबी हुई चिंगारी सी फुंफकारती
जाने कब से चुप बैठी ये
जुग्गियाँ 
घर में सजीधजी अबला सी
अब तक एकतरफ फैंकी हुई सी
मौन तोड़ने की सोच घर से निकली
अड़ने को महल-मीनारों से
देखो करतब अब शोषक और शोषित का
कौन सुने और कौन सुनाए
कौन दबे और कौन दबाए
देख नजारा थम गया मैं भी आज 


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
माणिक,वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
SocialTwist Tell-a-Friend

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here