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प्रेरणा के लिए अतीत में झांकने के बजाय भविष्योन्मुखी रहना पसंद करता व्यक्तित्व रघुवीर सहाय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, अगस्त 05, 2011 | शुक्रवार, अगस्त 05, 2011

रघुवीर सहाय जी 
(सहाय उस पीढी से ताल्लुक रखते थे जो स्वतंत्रता के बाद काफी सारी आकांक्षाओं के साथ पली.बढी थी। सहाय ने पूरी नहीं हुई उन्हीं आकांक्षाओं को अपनी कविताओं में व्यक्त किया। बहरहाल इसी के साथ सहाय की गिनती ऐसे कवियों में भी की जाती है जो प्रेरणा के लिए अतीत में झांकने के बजाय भविष्योन्मुखी रहना पसंद करते थे।)

नौ दिसंबर 1929 को लखनऊ में जन्मे रघुवीर सहाय एक बहुआयामी कवि होने के साथ ही लघुकथाकारए निबंध लेखक और आलोचक थे। वह जाने माने अनुवादक और पत्रकार भी थे। उनकी पुस्तक ष्लोग भूल गए हैंष् के लिए उन्हें वर्ष 1982 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। उनकी अन्य पुस्तकें ष्आत्महत्या के विरूद्धष्ए ष्हंसो हंसो जल्दी हंसोष् और ष्सीढियों पर धूप मेंष् भी काफी चर्चित रहीं। उनकी अन्य रचनाओं में ष्कुछ पतेए कुछ चिट्ठियांष् और ष्एक समय थाष् शामिल है। अज्ञेय द्वारा संपादित दूसरा सप्तक में उनकी रचनाओं को शामिल किया गया है।

 लोगों से जुडीं चिंताओं को उन्होंने अपनी कविताओं में पेश किया लेकिन उनकी कृतियों में कभीण्ण्कभी रूमानियत भी दिखाई दी। मसलनए अपनी कविता चांद की आदतें में वह लिखते हैंए चांद की कुछ आदतें हैंए एक तो वह पूर्णिमा के दिन बडा सा निकल आता हैण्ण् बडा नकली ख्जैसे असल शायद वही हो,। दूसरीए यह नीम की सूखी टहनियों से लटक कर टंगा रहता है ख्चमगादडी आदत,ए और यह तीसरी आदत भी बहुत उम्दा है कि मस्जिद की मीनारों और गुंबद की पिछाडी से जरा मुंडिया उठाकर मुंह बिराता है हमें यह चांद इसकी आदतें कब ठीक होंगी

रघुवीर सहाय उस पीढ़ी के सदस्य थे जो आजादी की लड़ाई के ख़त्म होने के बाद ;या लगभग उसके दौरानद्ध सजग और रचनाशील हुई थी। इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि उनकी संवेदनशीलता के बहुत से अंदरूनी सूत्र इसी दौर की खूबियाँ लिए हों। एक तरह की स्वचेतनता और एक व्यक्तिए एक नागरिक होने का अहसास जो उनमें भरपूर थाए शायद इसी दौर की देन था। लेकिन आजादी के बाद जो नयी काव्यधारा उभरकर सामने आयी उसमें कई तरह के मध्यवर्गीय तत्व शामिल थेएजो अपने.अपने कारणों से एक जगह आ मिले थे। उनका एक साथ होना लगभग एक तरह का ऐतिहासिक संयोग था। इतनी सहमति जरूर थी कि ये सभी तत्व नयी इतिहासिक परिस्थिति में एजेंडे को पुनर्परिभाषित करना चाहते थे। इस धुंधली इच्छा में एक बड़ी ऐतिहासिक जरूरत भी शामिल थी। लेकिन प्रबल यह इच्छा नहींए सामजिक शक्तियों का नया संतुलन सिद्ध हुआ जो इसके कुहासे में बन रहा था और जो बाद के वर्षों में धीरे.धीरे व्यवस्थित होता चला गया और इन तत्वों के भवितव्य को भी अपनी तरह तय करता चला गया।

पिछले ३० साल की परीक्षाओं में यह भी स्पष्ट हो गया कि स्वतंत्रता संघर्ष और उसके बाद के समझौते की विरासत की तरह सामने आए इन मध्यवर्गीय तत्वों में जनतांत्रिक सारवस्तु और जीवनी शक्ति एक जैसी नहीं है। आधुनिक हिन्दी की अग्रणी पंक्ति के कवि रघुवीर सहाय ने अपने पत्रकारिता संस्कारों के साथ आम आदमी के मुद्दों का सौंदर्य शास्त्र उसी की भाषा में पेश कर एकदम नया काव्य शिल्प गढ़ा और साहित्य को एक नए मायने देने का प्रयास किया। रघुवीर सहाय ने साहित्य के जरिये तथ्यों के भीतर छिपी संवेदनाओं को सामने लाने का प्रयास किया। उनकी कविता समाज के मध्य में रहते हुए उसके मुद्दों को उठाने और मानवीय खबरों के अधूरेपन को दूर करने की पक्षधर हैंण्सहाय ने राजनीतिक मुद्दों पर भी काफी लेखनी चलाई लेकिन उनका विषय नेतृत्व चलाने वाले लोग न होकर वह जनता होती थी जिस पर नेतृत्व किया जा रहा है। आम बोलचाल की भाषा में बेहद गंभीर मुद्दों को उठाने में रघुवीर सहाय की महारत थी। उनकी एक कविता हँसो हँसो जल्दी हँसो की पंक्तियाँ में यह स्पष्ट है.

हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही है
हँसो पर अपने पर न हँसना क्योंकि
उसकी कड़वाहट पकड़ ली जाएगी
और तुम मारे जाओगे।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

शैलेन्द्र चौहान


आलोचक और वरिष्ठ कवि है जिनका हाल ही में    नया  संस्मरणात्मक  उपन्यास कथा रिपोर्ताज पाँव ज़मीन पर बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है.उनके बारे में विस्तार से जानने के लियाना यहाँ क्लिक कारीगा.

संपर्क ३४/242 प्रतापनगर,सेक्टर.3 जयपुर.303033 ;राजस्थान
ई-मेल shailendrachauhan@hotmail.com, फोन  9419173960
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