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रेणु व्यास का शोध पूरा:-गंभीर गद्य-लेखक और वैश्विक मानवता के महान् चिन्तक ‘दिनकर’

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अगस्त 08, 2011 | सोमवार, अगस्त 08, 2011


डॉ.रेणु व्यास 

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय,उदयपुर द्वारा सुश्री रेणु व्यास को हिंदी विषय में 'दिनकर के कृतित्व का साहित्यिक और सांस्कृतिक अध्ययन' नामक शोध प्रबंध पर पीएच.डी. की उपाधि प्रदान की गयी हैं.रेणु व्यास ने ये शोध कार्य वहीं के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. नवलकिशोर के निर्देशन में संपन्न किया.शोधकर्त्री चित्तौड़ के महाराणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के सेवानिवृत प्राध्यापक और कवि-समालोचक डॉ. सत्यनारायण व्यास की पुत्री हैं.

रेणु ने बाताया कि उन्होंने अपने शोध में दिनकर के साहित्य का,दुसरे विश्वयुद्ध के परिप्रेक्ष्य में युद्ध और शान्ति के द्वंद्व तथा भारतीय नवजागरण व स्वाधीनता आन्दोलन में दिनकर के काव्य की भूमिका का विश्लेषण और मूल्यांकन किया हैं.




उनके शोध के आरम्भ में लिखा :-प्राक्कथन
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह
‘दिनकर'
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का उदय ऐसे युग और परिवेश में हुआ जब देश को उनकी परम और उत्कट आवश्यकता थी। राजा राम मोहन राय से शुरू भारतीय नवजागरण का उन्नयन दिनकर जैसे विलक्षण शलाका-पुरुष के रूप में हुआ। दिनकर का योगदान न केवल पराधीन भारत के प्राणों में पौरुष फूँकने वाले कवि के रूप में है, बल्कि एक गंभीर गद्य-लेखक और वैश्विक मानवता के महान् चिन्तक के रूप में भी रहा है।  गद्य में जहाँ ‘संस्कृति के चार अध्याय’ उनकी शीर्षस्थ कृति है, वहीं काव्य में ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ अपने युग की कविता के प्रतिमान हैं। भारतीय नवजागरण व भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से दिनकर का सृजन प्रभावित होता है एवं उसके एक अंग के रूप में उन्हें प्रभावित भी करता है। विज्ञान के अंधाधुंध विकास और उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद के चरम दुष्परिणाम द्वितीय विश्व युद्ध के रूप में मानवता के सम्मुख आई चुनौतियों से जूझने का साहस भी दिनकर के सृजन में मौज़ूद है। शौर्य, सौन्दर्य, वाग्मिता, शब्द-विवेक दिनकर के कृतित्व की मूल पहचान हैं। चिरन्तन भारतीय मनीषा और बहुलता-उदारतावादी, लोकतांत्रिक सोच, सेक्युलर भावना और सामाजिक न्याय की पुरज़ोर आवाज़ उठाता उनका कृतित्व भारतीय सृजन-कोश की अक्षय निधि है।

यह शोध-प्रबंध डॉ. नवलकिशोर, पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर के निर्देशन में लिखा गया है। इस शोधकार्य में गुरुवर डॉ. नवलकिशोर जी के मुझ पर सदैव रहने वाले वरदहस्त के लिए मैं उनकी हृदय से कृतज्ञ हूँ। इस शोध-कार्य में सभी स्तरों पर हर प्रकार की मदद एवं उत्साहवर्धन के लिए मैं पल्लव एवं उनकी मम्मी चन्द्रकान्ता जी नन्दवाना की बहुत-बहुत आभारी हूँ। इसके अलावा मुझे अपने माता-पिता, भाई-भाभी कपिल-मीनू और भतीजे अथर्व के इस शोधकार्य को समय पर पूरा करने में सहयोग मिला, जिसका आभार व्यक्त करना एक औपचारिकता ही होगी। मेरे समस्त परिवार, मित्रों एवं कार्यालय-स्टाफ की शुभकामनाओं के लिए भी मैं उनकी हार्दिक आभारी हूँ। अन्त में, दिनकर पर पूर्व में लिखी गई पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशिकों का भी आभार, जिनका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग इस शोधग्रंथ में मिला है।                                                


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :--

माणिक,वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.

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