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'लोकतंत्र, इंसाफ और सामाजिक समानता के मूल्यों के लिए भीषण संकट'-मंगलेश डबराल



क्रन्तिकारी छात्र संगठन आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा के बैनर तले देश भर से हजारों छात्र-नौजवान 9 अगस्त  को दिल्ली पहुँच रहे हैं. हाल के महीनों में जितने बड़े-बड़े घोटाले सामने आये हैं, और जिस तरह तमाम गठबन्धनों की सरकारें भ्रष्टाचार और लूट की ताकतों की बर्बर संरक्षक की भूमिका निभा रही हैं, उसने लोकतंत्र, इंसाफ और सामाजिक समानता के मूल्यों के लिए भीषण संकट तो उत्पन्न किया है, उसने देश की संप्रभुता और आत्मनिर्भरता के लिए भी खतरे पैदा किये हैं और करोड़ों जनता के वर्तमान और भविष्य की बर्बादी की  स्थितियां निर्मित कर दी है. आज केंद्र सरकार के मंत्री एक-एक करके भ्रष्टाचार के संरक्षक के रूप में सामने आ रहे हैं. दूसरी ओर जहाँ गैर यूपीए सरकारें हैं, वहां भी सरकारें और मंत्री घोटालों में संलिप्त पाए गये हैं. 

प्रतिवाद करने वालों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है.ऐसे हालात में आइसा और इंकलाबी नौजवान सभा ने पिछले कुछ महीनों से पूरे देश में भ्रष्टाचार, काला धन, राज्य दमन, महंगाई और सर्वोपरि इन स्थितियों के लिए जिम्मेवार आर्थिक नीतियों के खिलाफ अभियान चलाया है. छात्र नौजवान इस दौरान स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालयों के साथ शहर के मुहल्लों और हजारों गाँवों में भी गये, और भ्रष्टाचार को लेकर चिंतित जनता को इसके खिलाफ मुक्कमल लड़ाई के लिए संगठित करने की कोशिश की है. 


 इस दौरान कविता पाठ, जनगीतों की प्रस्तुति तथा फिल्मों का प्रदर्शन भी होगा. आइए, हम इस लड़ाई में अपनी आवाज मिलाएं. अपनी रचनाओं और विचारों से आन्दोलनकारी साथियों का मनोबल बढ़ाएं. 09 से 13 अगस्त तक 100 घंटे तक चलने वाली इस मोर्चाबंदी के दौरान जब भी आपको समय मिले, आप आइए, और इस अभियान को और ताकतवर बनाइए. 
 संपर्क- 
  • 09910402459 (मंगलेश डबराल),
  • 9953056075 (आशुतोष कुमार), 
  • 9868990959 (सुधीर सुमन), 
  • 9818755922 (भाषा सिंह)
निवेदक:                                                                                                                                               
मंगलेश डबराल
(पहाड़ पर लालटेन (1981); घर का रास्ता(1988); हम जो देखते हैं (1995) जिनकी प्रमुख कृतियाँ है.वे वर्तमान में जन संकृति मंच दिल्ली के अध्यक्ष हैं.उनके काम को अब तक ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982); श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार (1989) और " हम जो देखते हैं" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000) सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है)

मुलाक़ात विद माणिक


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