''पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय बदल नहीं सकता''-मुक्तिबोध - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय बदल नहीं सकता''-मुक्तिबोध

मुक्तिबोध 
मुक्तिबोध ने साठ के दशक में आजादी की जिस सच्चाई का साक्षात्कार किया था, आज वह अपने विकृत रूप में हमारे सामने है। आज का यह अंधेरा मुक्तिबोध के समय से कहीं ज्यादा सघन है। उसने भ्रम का जो जाल बुना है, वह ज्यादा महीन और मजबूत है।इसमें मध्य वर्ग फँसता जा रहा है। इस समाज का लेखक आज भी आत्म केन्द्रित हो रहे हैं या मध्यवर्गीय लालसाओं में डूबे हैं।
साठ के दशक में-
मुक्तिबोध ने अपनी प्रसिद्ध कविता अंधेरे में लिखी थी। मुक्तिबोध ने आजादी के बाद के अंधेरे को महसूस किया था। उनकी टिप्पणी थी -





कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ/
वर्तमान समाज चल नहीं सकता/
 पूँजी से जुड़ा हुआ ह्रदय बदल नहीं सकता।

मुक्तिबोध ने उस दौर में साहित्यकारों, कवियों की खबर ली थी और उनकेचुपकी निर्मम आलोचना की थी -

सब चुप, साहित्यकार चुप और कविजन निर्वाक्
  चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं/
उनके खयाल से यह सब गप है/
मात्र किंवदन्ती।

मुक्तिबोध ने अपने मध्यवर्गीय समाज पर इसलिए प्रहार किया था क्योंकि यह मध्यवर्ग व्यवस्था का क्रीतदास हो गया था और अपनी भूमिका छोड इसका अंग बन गया था।

सच्चाई यह भी है कि-
आज संघर्ष की विविध धाराएँ फूट रही हैं। संगठित, असंगठित, स्वतःस्फूर्त। ये छोटी-छोटी नदियाँ हैं। पर इनमें बड़ा वेग है। ये मिल जायें तो महानद बन जायें। जागरण और परिवर्तन का यह महानद ही हमारी दूसरी आजादी की जंग है। इस जंग में लोग शरीक हो रहे हैं। लखनऊ के लेखक संस्कृतिकर्मी इस जंग से बाहर कैसे रह सकते हैं ?

इस धरने में शामिल होने वालों में 
अगस्त क्रान्ति दिवस पर 9 अगस्त 2011 को यहाँ के लेखक संस्कृतिकर्मी भी मंहगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के विरोध में बाहर आये। उन्होंने रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रतिमा पर धरना दिया। इसका आयोजन लेखकों संस्कृतिकर्मियों ने संयुक्त रूप से किया था। इस धरने में शामिल होने वालों में कवि भगवान स्वरूप कटियार, राही मासूम रजा अकादमी के रामकिशोर, जन संस्कृति मंच के संयोजक कवि कौशल किशोर, कवि अलोचक चन्द्रेश्वर, प्रोफेसर रमेश दीक्षित, पी यू सी एल की प्रदेश महामंत्री वन्दना मिश्र, नाटककार अनिल मिश्रगुरूजी’, रंगकर्मी महेश देवा, श्रमिक नेता 0 पी0 सिन्हा अलग दुनिया के के0 के0 वत्स, लेनिन पुस्तक केन्द्र के प्रबन्धक गंगा प्रसाद, इन्दू पाण्डेय, जसम के बी एम प्रसाद, कवि मृदुल कुमार सिंह, कथाकार विनायक, परिमल के अरुण त्रिवेदी आदि प्रमुख थे।


आधार बयान-
शहर के सहित्यकारों का इस मौके पर कहना था कि मौजूदा व्यवस्था छूट, लूट और झूठ पर टिकी है। आज सरकार द्वारा कारपोरेट पूंजी को अंधाधुंध छूट दी जा रही है, वहीं जनता के श्रम, उसकी सम्पदा की लूट जारी है और यह सब लोकतंत्र के नाम पर हो रहा है। इससे बड़ा झूठ क्या हो सकता है कि वह अपने क्रूर और हिसंक चेहरे कोमानवीयके रूप में प्रचारित कर रही है। मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं इसी की देन है। हाल के दिनों में जो घोटाले सामने आये हैं, उसमें गठबन्धन की सभी सरकारें लूट की बर्बर ताकतों की संरक्षक बन कर सामने आई हैं। इसका लोकतंत्र लटतंत्र में तथा जनतंत्र जोरतंत्र का र्प्याय बन चुका है। इसने हमारी आजादी, लोकतंत्र और न्याय के लिए गंभीर संकट पैदा कर दिया है। देश की जनता समस्याओं के पहाड़ के नीचे दब सी गई है।

मुक्तिबोध ने कहा था -
अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे/तोड़ने होंगे गढ़ मठ सभी आज जब पूंजी के गढ़ और मठ से जनता पर गोलाबारी हो रही है, समय चुप रहने का नहीं है, चिल्लाने का है, लेखकों संस्कृतिकर्मियों को अपनी लालसाओं, महत्वकांक्षाओं की कैद से बाहर आने का हैं। समय की माँग है कि कलम को संघर्ष का, जन जागरण का माध्यम बना दिया जाय।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.
एफ - 3144, राजाजीपुरम, लखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227

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