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''उच्च 'शिक्षा को भी स्कूल शिक्षा की ही अगली कड़ी के रूप में देखना भारतीय जनमानस की एक बहुत बड़ी भ्रांति'':-डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, अगस्त 15, 2011 | सोमवार, अगस्त 15, 2011


डॉ. सदाशिव जी 
किसी वस्तु की मांग बहुत अधिक बढ़ जाने किन्तु साथ ही उसके पर्याप्त उत्पादन के अभाव में जिस तरह बाज़ार में घटिया वस्तु आने लगती है उसी तरह हमारे यहां पिछले तीन चार दशकों में उच्च शिक्षा के अनियंत्रित विस्तार के प्रयास में उसकी गुणवत्ता का ज़बरदस्त ह्रास हुआ है। आज ऐसे कई क़स्बों में स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर के महाविद्यालय खुल गए हैं जहां इस बात की जांच करने तक का कोई प्रयास नहीं किया गया है कि वहां उच्चस्तरीय शिक्षा के लिए सभी आवश्यक साधन भी उपलब्ध हो पाएंगे अथवा नहीं। इन महाविद्यालयों को खुलवाने में जो स्थानीय तत्त्व सक्रिय रहे हैं उनकी कई बार न तो उच्च शिक्षा में स्वयं कोई गहरी रुचि रही है और न ही मोटे तौर पर उन्हें उच्च शिक्षा की जटिल प्रकृति अथवा उसके लिए आवश्यक सभी साधनों का ही कोई स्पष्ट अनुमान रहा है। 

महाविद्यालयों के इस अनियंत्रित विस्तार और लगभग इसी विस्तार के समानान्तर हुई विश्वविद्यालयों की संख्या वृद्धि ने जहां प्रत्येक विषय के श्रेष्ठतर विद्वानों को अध्यापन के लिए बड़े शहरों में स्थित विश्वविद्यालयों में पहुंचा दिया है वहीं इसने इन महाविद्यालयों को उच्च शिक्षा की मुख्य धारा से भी काट दिया है। उच्च शिक्षा के अनुकरणीय नमूनों, जानकार एवं अनुभवी शिक्षकों के पर्याप्त मार्गदर्शन तथा आवश्यक साधनों के अभाव में इन कॉलेजों ने मोटे तौर पर स्कूल के ढांचे को ही अपना लिया है। स्कूल एवं कॉलेज स्तर पर परीक्षा प्रणाली का स्वरूप भी लगभग एक सा होने के कारण अधिकांश छोटे कस्बों में तो अब स्कूल और कॉलेज में भेद कर पाना ही कठिन हो गया है। 

उच्च शिक्षा का छोटे-छोटे कस्बों तक यह विस्तार जहां मूलतः भारतीय जनमानस की कई भ्रांतियों की उपज है वहीं यह दूसरी ओर उसकी अनेक भ्रांतियों का जनक भी है। इन भ्रांतियों का आकलन तथा विश्लेषण निश्चय ही ऐसे कॉलेजों की संख्या वृद्धि से होने वाले उच्च शिक्षा के गुणवत्ता-ह्रास को समझने में हमारी मदद कर सकता है।

भारतीय जनमानस की एक बहुत बड़ी भ्रांति उच्च शिक्षा को भी स्कूल शिक्षा की ही अगली कड़ी के रूप में देखना है। स्कूल शिक्षा पूरी करने वाले छात्र-छात्राओं के आयु वर्ग के लिए चूंकि हमारी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था कोई अन्य सार्थक विकल्प प्रस्तुत नहीं करती, इन छात्र-छात्राओं के अभिभावकों को भी उन्हें इस आयु में किसी कॉलेज में दाखिला दिलवाने के अतिरिक्त कोई रास्ता नज़र नहीं आता। मध्यवर्गीय अभिभावक कहीं न कहीं इस भय से भी ग्रस्त रहता है कि यदि उसनेे अपने बच्चों को कॉलेज में नहीं पढ़ाया तो इससे उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी आ जायेगी। सामाजिक प्रतिष्ठा संबंधी इस भय से वे माता-पिता भी, जो भविष्य में अपने बच्चों को किसी ऐसे पुश्तैनी धंधे में लगाना चाहते हैं जिसमें उच्च शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है, उन्हें कम से कम डिग्री स्तर तक कॉलेज में रखना ज़रूरी मानते हैं।

डिग्री का यह मोह हमारे यहां इतना व्यापक है कि किन्हीं पारिवारिक परिस्थितियों के कारण कॉलेज शिक्षा के लाभ से वंचित रह जाने वाला छात्र भी अपनी शिक्षा के अधूरेपन के भ्रम को मिटाने के लिए प्राइवेट परीक्षार्थी बन कर भी किसी तरह डिग्री हासिल कर लेना ज़रूरी समझता है। इसी मोह के कारण आज कई विश्वविद्यालयों ने अपने द्वार उन हज़ारों स्वयंपाठी छात्र-छात्राओं के लिए भी पूरी तरह खोल दिए हैं जो परीक्षा से कुछ समय पूर्व चंद चुने हुए प्रश्न रट कर किसी विषय से संबंधित अपने विशिष्ट ज्ञान के प्रमाण-स्वरूप सिर्फ़ एक छपा हुआ कागज़ प्राप्त कर लेना चाहते हैं, किन्तु जिनके पास न तो उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त समय और साधन हैं और न ही जिनकी उस उच्च स्तरीय ज्ञान को प्राप्त करने की कोई वास्तविक इच्छा ही है। परीक्षा फ़ीस तथा परिवीक्षण उत्तर पुस्तिकाओं की जांच, सस्ती गाइडों के प्रकाशन आदि से होने वाली आय ने कई ऐसे निहित स्वार्थों को जन्म दे दिया है जिनकी रुचि अब डिग्रियों के इस निरर्थक व्यापार को यथावत बनाए रखने में है। दूसरी ओर इन डिग्रियों की विश्वसनीयता इतनी तेज़ी से समाप्त होती जा रही है कि अधिकांश नियोक्ता केवल डिग्रीधारी व्यक्ति को कोई काम सौंप देने में काफ़ी हिचकिचाने लगे हैं। 

उच्च शिक्षा के बेतहाशा फैलाव ने स्कूल एवं  कॉलेज शिक्षा की प्रकृति तथा उनके उद्देश्यों के भेद को भी आम आदमी की निगाह में स्पष्ट नहीं रहने दिया है। व्यापक रूप से स्कूल शिक्षा का उद्देश्य छात्र के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के साथ-साथ उसे वे कुशलताएं अर्जित करवाना होता है जिनकी सहायता से वह आगे चल कर स्वयं स्वतंत्र रूप से अपने लिए आवश्यक ज्ञान का संचय एवं अन्वेषण कर सके।स्कूल शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को अपने युग के हर उपयोगी विषय से संबंधित न्यूनतम अपेक्षित ज्ञान देकर उसे एक प्रबुद्ध एवं उपयोगी नागरिक बनाने की चेष्टा करती है। इसके ठीक दूसरी ओर उच्च शिक्षा की सार्थकता उन विशिष्ट छात्रों को आगे बढ़ाने में है जिन्होंने ज्ञान के किसी क्षेत्र विशेष में अपनी असाधारण बौद्धिक प्रतिभा का प्रमाण दिया हो। उच्च शिक्षा का दायित्व न केवल उन्हें उस विषय के विद्वानों का कुशल मार्गदर्शन दिलवाना है, बल्कि पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं, प्रयोगशालाओं आदि के वे कीमती साधन उपलब्ध करवाना भी होता है जो उन्हें विषय से संबंधित ज्ञान की गहनतम एवं नवीनतम जानकारी देने के साथ-साथ उस ज्ञान के उच्च स्तरीय अन्वेषण में भी उनकी सहायता कर सकें। इस तरह उच्च शिक्षा का वास्तविक ध्येय केवल हर विषय के उन चुने हुए अधिकारी विद्वानों को तैयार करना ही हो सकता है जो अब तक संचित जटिल एवं सूक्ष्म ज्ञान को अपनी कुशाग्र बुद्धि से आत्मसात कर उसकी सम्पदा में और भी वृद्धि कर सकंे। प्रश्न यह है कि उच्च शिक्षा के इस मानक स्वरूप की कसौटी पर पिछले तीन चार दशकों में खोले गए हमारे कितने महाविद्यालय और उनमें शिक्षा पा रहे कितने छात्र खरे उतरेंगे?

उच्च शिक्षा के अपेक्षाकृत गहन, गंभीर, विस्तृत एवं महंगे तंत्र के उपयोग का अधिकार केवल उन छात्रों को ही सौंपा जाना चाहिए जिन्होंने अपनी विशिष्ट योग्यता निर्विवाद रूप से प्रमाणिक कर दी हो। उन छात्रों को महाविद्यालयों में प्रवेश देने में कोई तुक नहीं है जो स्कूल स्तर पर ही शिक्षा संबंधी बुनियादी कुशलताएं तक ठीक से अर्जित नहीं कर पाए हैं। अयोग्य और अकुशल छात्रों की एक बहुत बड़ी भीड़ के महाविद्यालयों में प्रवेश को आज आम स्नातक के बौद्धिक स्तर में आ गई ज़बरदस्त गिरावट के मूल में देखा जा सकता है। आज लगभग हर कस्बाई महाविद्यालय के पुस्तकालय में अनेक ऐसे ग्रंथ मिल जाते हैं जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होते हुए भी बरसों से किसी पाठक द्वारा छुए तक नहीं गए हैं। इन्हीं पुस्तकालयों में असंख्य ऐसी महंगी एवं दुर्लभ पुस्तकें भी मिल जाएंगी जिनके कई-कई पृष्ठ उन अश्रद्धालु तथा कुपात्र छात्रों द्वारा बेरहमी से गायब कर दिए गए हैं जिन्हें अपने ही सहपाठियों को उनसे वंचित कर देने अथवा पीछे आने वाले असंख्य छात्रों के उपयोग की उस बहुमूल्य पाठ्य सामग्री को सदा के लिए नष्ट कर देने में लेशमात्र भी संकोच या अपराध बोध नहीं होता। 

च्च शिक्षा में शिक्षक की भूमिका को लेकर भी हमारे यहां अनेक भ्रांत धारणाएं प्रचलित हैं। शिक्षक के श्रम को सामान्यतः उसके लेक्चर के घंटों से आंका जाता है और आमतौर पर उसे केवल स्कूल शिक्षक की तुलना में कम काम करके अधिक वेतन पाने वाले शिक्षक के रूप में देखा जाता है। कार्य मूल्यांकन के आम मापदंडों के कारण कई बार तो इन कॉलेजों का शिक्षक तक इस भ्रांति का शिकार हो जाता है कि उसका अपेक्षित कर्त्तव्य केवल पाठ्यक्रम में निर्धारित पुस्तकों का कक्षा में एक बार छात्रों को समझाते हुए वाचन करना तथा किसी तरह इन छात्रों को उनकी परीक्षा पास करवा देना भर है।

गम्भीरता से सोचा जाए तो कॉलेज शिक्षक का काम न तो छात्र को उंगली पकड़ कर चलना सिखाना है और न ही इस काम को केवल कुछ तथ्यों के दोहराव तक सीमित रखना है। उच्च शिक्षा की किसी भी सार्थक शिक्षा प्रणाली में छात्र की कल्पना एक निष्क्रिय श्रोता के रूप में नहीं की जा सकती। शिक्षक एवं छात्र के बीच वैचारिक आदान-प्रदान द्वारा ही किसी विषय के विस्तृत विवेचन एवं सूक्ष्म विश्लेषण का वह प्रशिक्षण किसी उच्च शिक्षा प्रणाली में छात्र को मिल सकता है जो उसे अपने विषय के प्रति गहरी अंतर्दृष्टि विकसित करके स्वतंत्र अन्वेषण के लिए प्रेरित कर सके। उच्च शिक्षा में छात्र एवं शिक्षक की एक ऐसी सक्रिय भागीदारी होना आवश्यक है जिसमें शिक्षक एक अग्रगामी मार्गदर्शक के रूप में छात्र को उसके विषय में और अधिक गहरे पैठने की प्रेरणा देता रह सके। महाविद्यालय स्तर पर शिक्षक का प्रमुख कार्य वस्तुतः प्रेरण ही हो सकता है और प्रेरण का यह कार्य केवल वही विद्वान शिक्षक कर सकता है जो अपने विषय के प्रति समर्पित एवं शिक्षण कर्म के लिए प्रतिबद्ध हो। उच्च शिक्षा में शिक्षक के कार्य-मूल्यांकन का आधार भी मुख्यतः उसके काम के घण्टे नहीं होकर उसके शिक्षण की गुणवत्ता होना चाहिए। सभी जानते हैं कि एक शिक्षक के अध्यापन एवं किसी दूसरे शिक्षक के अध्यापन में कई बार ज़मीन-आसमान का अंतर हो सकता है। उच्च शिक्षा का अनियंत्रित विस्तार वस्तुतः हमें हमारी उस सुदीर्घ परम्परा से विच्छिन्न कर रहा है जिसमें किसी शिक्षण संस्था की श्रेष्ठता वहां पढ़ाने वाले विद्वान शिक्षकों से आंकी जाती थी, जबकि उच्च शिक्षा की सार्थकता के लिए उस परम्परा का निर्वाह आज भी उतना ही प्रासंगिक एवं आवश्यक है जितना कि वह आज से पहले कभी था।

उच्च शिक्षा में छात्रों की निष्क्रियता केवल एक अकर्मण्य एवं अविद्वान शिक्षक को ही भली लग सकती है किन्तु इस छात्र-निष्क्रियता का एक ख़तरनाक पहलू यह भी है वह शनैः शनैः एक सक्रिय एवं कर्मठ शिक्षक को भी निष्क्रिय तथा कामचोर बना सकती है। इस तरह के ख़तरे के बावजूद मुफ़स्सिल कालेजों की बढ़ती हुई संख्या ने अब कई अगंभीर छात्रों को उच्च शिक्षा के अवसर मुहैया करवा दिए हैं जबकि उनकी अयोग्यता या अपात्रता के कारण उन्हें इस अवसर से वंचित कर सकने का कोई अधिकार दुर्भाग्य से उनके शिक्षकों  को नहीं दिया गया है। शिक्षण के अपने मूल कार्य में अयोग्य छात्रों की ओर से पर्याप्त बौद्धिक चुनौतियों का अभाव पाकर कई बार मुफ़स्सिल कॉलेजों का अध्यापक अपनी ऊर्जा को अपनी रुचि के अन्य कार्यों अथवा अर्थोपार्जन के अतिरिक्त साधनों में भी लगाने लगता है। ट्यूशनों को अपना मुख्य व्यवसाय बना लेने वाले, ज़मीनों, शेयरों या सट्टे बाज़ारी के धंधों में लगे रहने वाले, सस्ती गाइडें लिखने वाले या एक साथ ही कई-कई विश्वविद्यालयों के परीक्षक बन जाने वाले अनेक कॉलेज शिक्षक सामान्यतः इसी कुंठित वर्ग से आते हैं जिसकी अपने विषय के अध्ययन में रुचि अथवा अध्यापन संबंधी प्रतिबद्धता किसी न किसी कारण से लगभग समाप्त हो चुकी होती है।

उच्च शिक्षा के स्तर पर भी स्कूल शिक्षा प्रणाली के आरोपण ने उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक साधनांे एवं उसकी मूल्यांकन पद्धति के संबंध में अनेक भ्रांतियों तथा विकृतियों को स्थायित्व सा दे दिया है। उदाहरणार्थ इस मामूली सी बात की ओर अब अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं जाता कि उच्च शिक्षा की वास्तविक पात्रता रखने वाले किसी प्रतिभाशाली छात्र को यदि कोई विद्यालय विद्वत्तापूर्ण मार्गदर्शन के साथ-साथ ज्ञानान्वेषण के समुचित साधन नहीं उपलब्ध करा पाए तो यह किसी भूखे व्यक्ति को निमंत्रित कर भोजन नहीं कराने जैसा ही कृत्य कहा जायेगा। इस तथ्य की ओर से अधिकांश लोग अब जैसे बेख़बर हैं कि कोई शिक्षण-संस्था यदि अपने किसी कुशाग्रबुद्धि छात्र को दिनों-दिन दुर्लभ एवं महंगे होते जा रहे मानक ग्रन्थों एवं पत्र-पत्रिकाओं की प्राप्ति द्वारा उसके अध्ययन से संबंधित सम्पूर्ण जानकारी नहीं दिलवा सके तो अधिक साधन युक्त किसी अन्य संस्था के किसी विद्यार्थी की तुलना में वह स्वतः ही पिछड़ जायेगा। शिक्षा साधनों की ग़ैर बराबरी इस तरह किसी विद्यार्थी की जन्मजात प्रतिभा के बावजूद उसके ज्ञान मार्ग को अवरुद्ध कर उसे औरों के मुक़ाबले पीछे रख देगी।

 उच्च शिक्षा की विशिष्ट प्रकृति पर विचार करने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि महाविद्यालय स्तर पर छात्र की कुशलता एवं उपलब्धि का मूल्यांकन स्कूल की पारंपरिक मूल्यांकन पद्धति द्वारा किया जाना न तो पूरी तरह संभव है और न ही उसे उपयुक्त ही कहा जा सकता है। जो परीक्षा प्रणाली चुने हुए प्रश्नों के पहले से तैयार उत्तरों के आधार पर परीक्षार्थी का मूल्यांकन करती हो, वह न तो छात्र को विस्तृत अध्ययन के लिए प्रेरित कर सकती है और न ही वह उसे कभी विषय के स्वतंत्र अन्वेषण तथा उसके संबंध में मौलिक चिन्तन के लिए प्रोत्साहित कर पायेगी। कोई आश्चर्य नहीं कि मूल्यांकन की इस दोषपूर्ण प्रणाली के चलते हमारे कॉलेज भी अब सतही ज्ञान, आंशिक अध्ययन और तोता रटंत को ही प्रश्रय देने लगे हैं। ट्यूशन का बाज़ार अब उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी काफ़ी गर्म है और पुस्तक विक्रेताओं की दुकानें अब मानक पुस्तकों के बजाय सामान्यतः सस्ती गाइडों एवं अति सरलीकृत सहायक सामग्री से भरी रहती हैं। धनलोलुप शिक्षक, लेखक एवं प्रकाशक इस वातावरण में खूब फल-फूल रहे हैं और चुने हुए प्रश्नों को रट कर अच्छे अंक प्राप्त करने वाले छात्रों  की तथाकथित सफलता को अपनी सफलता मानने वाले अध्यापक अपने आपको शाबासी दे रहे हैं। कहना न होगा कि ऐसी मूल्यांकन पद्धति से परीक्षित होने पर विषय को गम्भीरता से पढ़ने तथा उसकी गहराई में पैठने का प्रयास करने वाले छात्र के हाथ केवल निराशा एवं कुंठा ही लग सकती है।

हमारी उच्च शिक्षा संस्थाओं से आज जो छात्र बड़ी संख्या में प्रति वर्ष निकल रहे हैं उनमें से अधिकांश पर तो उनकी उच्च शिक्षा का कोई असर ही नहीं दिखाई देता। इसका मुख्य कारण वे अनधिकारी विद्यार्थी हैं जो विषय से संबंधित अपनी बुनियादी अयोग्यता के कारण उसके सूक्ष्म ज्ञान को आत्मसात करने की स्थिति में ही नहीं होते और इसीलिए उस विषय का अध्ययन उनके व्यक्तित्व या  व्यवहार में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं ला पाता। कई बार तो एक डिग्रीधारी और डिग्रीरहित व्यक्ति के व्यवहार में भेद कर पाना तक कठिन हो जाता है। उच्च शिक्षा के अनियंत्रित विस्तार से विकसित हुई हमारी शिक्षा प्रणाली इस तरह कुशिक्षितों या अर्द्धशिक्षितों की एक ऐसी जमात तैयार करने में लगी है जो इस देश की प्रगति में कदापि सहायक नहीं हो सकती।                    
                                    
उच्च शिक्षा का अनियंत्रित विस्तार बग़ैर नक़्शे के किसी बड़े भवन का निर्माण करने जैसा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हमारे देश की समग्र प्रगति को ध्यान में रखते हुए शिक्षा का ऐसा ढांचा तैयार किया जाए कि उसका प्रत्येक भाग उस सम्पूर्ण ढांचे का एक आवश्यक अंग लगे। जब तक हमारी आवश्यकताओं एवं हमारी परिस्थितियों के  अनुकूल उच्च शिक्षा का सुनियोजित विस्तार नहीं होता तब तक हमारे अधिकांश कॉलेज सार्वजनिक धन के अपव्यय के साधनों के अलावा कुछ नहीं बन पाएंगे। वे भारी पूंजी निवेश के बावजूद श्रेष्ठ एवं देश के गौरव को बढ़ाने वाले व्यक्तियों का निर्माण नहीं कर पाएंगे। 
इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हमारा उच्च शिक्षा तंत्र ही हमारे उस मानवीय संसाधन का निर्माण और विकास कर सकता है जो हमें अपने समय के गंभीर मसलों को समझने में मदद करे और हमारे देश को दूसरों के मुकाबले पिछड़ जाने से बचाए। पर इस तंत्र की गुणवत्ता केवल इसकी ऊपरी ठोकठाक या वेतन सुधार जैसे किसी एक आध कदम पर ही निर्भर नहीं करती। उच्च शिक्षा में उत्पन्न विकृतियों का निराकरण उसके समूचे संघटन में उन परिवर्तनों की मांग करता है जो उसे हमारी विशिष्ट परिस्थितियों में एक सार्थक रूप देकर सीधे इस देश की प्रगति से जोड़ सके।                                     

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय
डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: मई, 1992 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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