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''ब्लॉग राइटिंग के बहाने अनपढ़ लोग भी हाथ आजमा रहे हैं''-यशवन्त कोठारी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, अगस्त 23, 2011 | मंगलवार, अगस्त 23, 2011



नाथद्वारा में 1950 में जन्मे यशवंत कोठारी राजस्थान के वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं। राष्ट्रीय  आयुर्वेद संस्थान से रसायन शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर पद से रिटायर कोठारी के चार उपन्यास, नौ व्यंग्य संकलन, बीस साहित्य की पुस्तकें, पत्रकारिता और रसायन शास्त्र सहित करीब चालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.


एक रचना और लिखने की शुरुआत । 
जब पहली रचना 1974 में धर्मयुग में छपी तो कई दिन तक उसकी कटिंग जेब में डाले तना-तना, कुछ बौराया सा घूमता रहा। फिर यह देखने के लिए बहुत सारी प्रतियां खरीदी कि देखूं सब में छपा है क्या। उसके बाद जब पारिश्रमिक आया तो उसके साथ लगे नोट को भी वर्षों तक सहेजकर रखा। तो यह थी लिखने की शुरुआत और उससे उपजी एक धुन। ओर जब जुनून सवार हुआ तो मैंने खुद को भावी साहित्यकार माना और निरंतर लिखने में रम गया। उसके बाद सारिका, गंगा जैसी मैगजीन में छपने लगा। हौसलों को और पंख लगे। मैं मूलतः व्यंग्य लिखता था, इसलिए समकालीन लेखकों हरिशंकर परसाई, शरद जोशी को पढ़ा। बार-बार पढ़ा।उनके जैसा बनने की कोशिश की। अब कितना बन पाया यह तो पाठक और समय ही तय करेगा। 
                          बाजार की शक्तियों के पंजे में लेखन। 
इस आर्थिक युग में जब, सब चीजें बाजार के पैमाने पर कसी जा रही हैं, लेखक कैसे अछूता रह सकता है। पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य की नदी सिकुड़ रही है। छोटी मैगजीन्स ने कुछ जिलाए रखा हुआ है। बाजार में बड़ी ताकत है। यही वजह है कि आज पॉपुलर लेखन का जन्म हुआ है, जिसे हम साहित्य मानने की मृग-मरीचिका के शिकार हैं । जो सिर्फ पल्प लिटरेचर है, जिसकी जिन्दगी खबरों जितनी ही है, जो सुबह जन्म लेती हैं, दोपहर को जवान होती हैं और शाम को मृत हो जाती हैं। इस साहित्य को प्रकाशक तो बेच लेगा, लेकिन इससे साहित्य का कुछ भला होने वाला नहीं है। आजकल कॉन्टेक्ट लेखन भी चर्चा में है। यह आशाजनक बात है कि इसमें कुछ लेखक कमा-धमा रहे हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि इससे गुणवत्ता का ह्रास भी हो रहा है। क्योंकि एक तय मियाद के भीतर कैसे दो-तीन हजार पन्नों का लेखन किया जा सकता है। यह क्रिकेट के नए वर्जन की तरह लेखन की फटाफट शैली है, जिसमें घुमन्तु प्रवृत्ति से दूर लेखक को कम्प्यूटर के खूंटे से बांध दिया है। उसके अनुभव का कैनवास सिकुड़ रहा है। इससे बाजार की जरुरतें तो पूरी हो जाएंगी, लेकिन एक लेखक खुद क्या चाहता है, यह शायद ही कहीं नोट हो पाए।

इंटरनेट पर जन्मा ‘उम्मीद का लेखक’।  
इंटरनेट एक संभावना के रुप में उभरा है।भविष्य ई-बुक्स और ई-पेपर्स का हैं आजकल ब्लॉग राइटिंग के बहाने अनपढ़ लोग भी हाथ आजमा रहे हैं। यह सुखद बात है, क्योंकि इससे एक तो लोगों में लिखने की प्रवृत्ति जागृत हो रही है, दूसरा उन्हें मंच भी मिल रहा हे। एक बार और माहौल बनने दीजिए, फिर लेखक इसके जरिए कमाने भी लगेंगे। 
एक और राग-दरबारी का इंतजार। 
हिन्दी व्यंग्य लेखन में श्रीलाल शुक्ल की ‘राग-दरबारी’ आज भी मील का पत्थर है। उसके बाद दूसरी ऐसी कोई कृति नहीं आ पाई, जिससे यह यात्रा आगे बढ़ती। हां, ज्ञान चतुर्वेदी, मन्नू भंडारी, शकर पुणतांबेकर,विष्णु नागर, प्रकाश मनु ने जरुर अच्छे प्रयास किए हैं। फिर भी अभी तक दूसरे ‘राग दरबारी’ की तलाश पूरी नहीं हुई है। आज व्यंग्य लेखन तो खूब हो रहा है, लेकिन सब अखबारों की जरुरत के मुताबिक छोटे-छोटे पीस लिखे जा रहे हैं। व्यंग्य को आर्ट वर्क से हटाकर क्राफ्ट वर्क बना दिया। उदाहरण के तौर पर, जूता फेंकने की घटना पर एक संपादक की डेस्क पा तीस व्यंग्य आए, बह एक ही चुन पाएगा। बाकी डस्टबिन के हवाले। तो आज का व्यंग्य तात्कालिकता का मारा है और समाचारों पर आधारित है।

बाल साहित्य की जरुरत क्या है। 
बाल साहित्य का आकाश धूमिल हो रहा है। इसके ठोस कारण हैं। पहली बात तो यह कि मूल रुप से बाल साहित्य लिखने वाले बहुत कम हैं, या कहें न के बराबर हैं। बस, बड़े साहित्यकार उस गर्ज से लिख देते हैं कि चलो बाल साहित्य का ठप्पा भी लगवा लिया जाए, सो उन्होंने लिख दिया और हो गया बाल साहित्य। दूसरी बात, आज बच्चों की जरुरत को समझ को हाशिए पर डाल रखा है। कब तक उन्हें जंगल,शेर, भालू, हिरण, परिकथाओं से बहलाने की कोशिश जारी रखेंगे। जबकि आज की पीढ़ी ‘टक्नोलॉजी पीढ़ी’ है, स्मार्ट है, उनके विपय कम्प्यूटर, वीडियोगेम, एस्टोनेट, साइंस, रिसर्च परक हैं। वे टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, और हम हैं कि उन्हें खरगोश की कहानी सुनाने की जिद पर अड़े हैं। बच्चों की इतनी मैगजीन बंद होने के बाद भी हमारी सोच नहीं बदली। 
  • रविवारीय राजस्थान-पत्रिका - 29-8-10 में छपे अनुसार 
  • सुरजीत सिंह से बातचीत के अनुसार 

यशवन्त कोठारी86, लक्ष्मी नगर,ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुरफोन - 2670596ykkothari3@yahoo.comयशवंत कोठारी के बारे में विस्तार से जानकारी यहाँ क्लिक कर देखें.
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