Latest Article :
Home » , , , , » अनुवादित आलेख:-भ्रष्टाचार कभी भी पूरी तरह परिभाषित नहीं हो सका है

अनुवादित आलेख:-भ्रष्टाचार कभी भी पूरी तरह परिभाषित नहीं हो सका है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, अगस्त 25, 2011 | गुरुवार, अगस्त 25, 2011


                      ये एक  टुकड़ा मैंने  कहीं  पढ़ा  था, लेकिन ये नहीं पाता कर पाया   कि ये किसका   है... लेकिन दरअसल ये अपने आप में मुकम्मल  है और स्पष्टतः भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलनों  से सम्बन्धित  कुछ जरूरी सवाल उठाता   है... इसलिए मैंने इसका जैसा तैसा  अनुवाद किया ताकि  इसे लोगों से शेयर   कर सकूं.... मेरी नज़र में ये एक टुकड़ा ही आजकल चल रहे इस पूरे मुहीम की सच्चाई को बयान करता है...
  
भ्रष्टाचार कभी भी पूरी तरह परिभाषित  नहीं हो सका है:क्या यह महज आर्थिक अपराध है या जनता के पैसे कि चोरी? या भ्रष्टाचार सत्ता के दुरूपयोग से जुदा है? यदि ऐसा है, तब किस प्रकार कि सत्ता-वो जो राज्य संस्थाओं के नियंत्रण  से प्रवाहित होता है,या वो जो सामाजिक वर्गीकरण  और आर्थिक विषमता के साथ साथ सह्वर्धित होता है?क्या भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद से जुड़ा है और निजी प्रभावों का अभ्यास है? यदि अंतिम दो प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक  है , तब भ्रष्टाचार जाति और वर्ग से और पितृसत्तात्मकता तथा बहुसंख्यकवाद से किस प्रकार जुड़ता है?और भी क्या यह राष्ट्रीय संपदाओं के बड़े  पैमाने पे लूट से लेकर  रिश्वतखोरी तक के छोटे बेजान से मुद्दों को सुलझाता  है या उन्हें भ्रमित करता है? आखिर में किसी को यह भी पूछना  चाहिए कि भ्रष्टाचार को वैधानिक या नैतिक स्तर पे परिभाषित किया जा सकता है क्या?

भ्रष्टाचार जिस अर्थ का संकेत करता है उसकी कोई फौरी परिभाषा नहीं है और विशेषकर भ्रष्टाचारविरोधी मुहीम में जैसा इसका प्रयोग किया जाता है. इन सवालों का को उठाना केवल  थोथी नारे बाज़ी नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार-विरोध की राजनीति के केंद्र से जुड़ा है.किस चीज़ के खिलाफ हम लड़ रहे हैं, और किस प्रकार हम भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहे हैं. यह बहुत कुछ इस बात पे निर्भर करता है कि हम किन प्रश्नों को उठा रहे हैं और उनका क्या जवाब है.... इसके बजाये, इन सवालों को पूछना, भ्रष्टाचार का हल दो व्यापक रणनीतियों में सीमित होजाता है. पहला, नैतिक निंदा तथा किसी के निज तथा किसी के समाज को सुधार के लिए सदोपदेश देना, कभी कभी यह बढ़ कर स्कूली  प्रशिक्षण तथा पब्लिक प्रोपेगेंडा भी हो जाता है. दूसरा, क़ानून और नियमों का व्यवस्थापन करना. पहला जहाँ असाधारण ढंग से गिर जाता है वहीँ  दूसरा व्यापक पैमाने पे असफल रहता है.भ्रष्टाचार अत्यधिक नौकरशाही कि प्रक्रिया  के ज़रिये अपना रास्ता पाता है और रुकी हुयी प्रक्रिया  को अपना अनजान सहयोगी बनाता है. आज भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सहयोगी कानूनों, नियमों और प्रक्रियाओं का आधिक्य है, जो सीधे साधे प्रशासनिक मामलों को भी आपरदर्शी बनाकर आम जन को उससे दूर करदेता है.यह आर्थिक रूप से मज़बूत तथा राजनीति से जुड़े लोगों के लिए राह खोल देता है कि वह जो चाहे वो करे. और .शक्तिहीन और प्रभावहीन आम जनता कि मूल भूत आवश्यकताओं को जब चाहें तब  नकार दें. 
      
दूसरा सवाल जो पूछा जाना चाहिए लेकिन जो कभी ही इसके  निष्कर्ष तक पहुँचने  की तलाश  करे कि वह कौन लोग हैं जो भ्रष्टाचार के जारी  रहने से सबसे ज्यादा लाभान्वित होंगें. निशचय ही राजनितिक रूप से ताक़तवर लोग, लेकिन साथ ही आर्थिक रूप से ताक़तवर लोग भी-उद्योग तथा व्यापार तथा बहुत से लोग. इनसे हट कर भी, बहुत से सर्विस  ग्रुप हैं-फिर से नौकरशाह,सलाहकार, शिक्षाविद, वकील, डोक्टरों  तथा छोटे उद्योगपति, बहुत से लोग- जो या तो टैक्स से बचना चाहते हैं या अपने काम  के बदले अतिरिक्त फीस वसूलना चाहते हैं.आश्चर्यजनक रूप से इनमें से अधिकांश ''सर्विस ग्रुप'' के लोग हैं- जो प्रायः  मध्य वर्ग के हैं- जो बढ़ते  भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे ज्यादा रोते हैं..

यदि कोई भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन के राजनीतिक परिणामों को देखेतो यह देखना आसान होजायेगा कि क्यूँ मध्य वर्ग भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन का समर्थन करता है-वह राजनीति में दक्षिण  पंथ  को निर्देशित करता है. इस प्रकार का भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन गरीबों और असहायों को दुःख  ही देता है.......


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
शाहबाज अली खान 
ये प्रगतिशील उदभव के सह सम्पादक है. इनकी उच्च शिक्षा अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय में ही हुई है.फिलहाल इनका पता 64/1निशांत अपार्टमेन्ट,शमशाद मार्केट,ए.एम्.यूं. अलीगढ है
  • alikhan.shahbaz@gmail.com

SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

सह सम्पादक:सौरभ कुमार

सह सम्पादक:सौरभ कुमार
अपनी माटी ई-पत्रिका

यहाँ आपका स्वागत है



यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template