कितना ज़रूरी है हस्तक्षेप - अपनी माटी

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सोमवार, अगस्त 29, 2011

कितना ज़रूरी है हस्तक्षेप


कितना ज़रूरी है हस्तक्षेप
व्यवस्था में इस दौर 
फटती पेंट के पिछवाड़े
लगे ठेगरे की मानिंद

सोचना निहायत ज़रूरी है 
अटरम-शटरम के आलम में
छानी हुई चाय की मानिंद
फिर बैखोफ लेना चुस्कियां 

कितनी ज़रूरी हो गयी है 
असल की पहचान और 
नक़ल को नकारना यूं
छाजले से कंकडों को पारना

कितना ज़रूरी है ऊंची उठती
हवेलियों को यथासमय छांगना
सौ गालियों को पारते 
शिशुपाल वधने की मानिंद


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



माणिक,
वर्तमान में राजस्थान सरकार के पंचायतीराज विभाग में अध्यापक हैं.'अपनी माटी' वेबपत्रिका सम्पादक है,साथ ही आकाशवाणी चित्तौड़ के ऍफ़.एम्.  'मीरा' चैनल के लिए पिछले पांच सालों से बतौर नैमित्तिक उदघोषक प्रसारित हो रहे हैं.

उनकी कवितायेँ आदि उनके ब्लॉग 'माणिकनामा' पर पढी जा सकती है.वे चित्तौड़ के युवा संस्कृतिकर्मी  के रूप में दस सालों से स्पिक मैके नामक सांकृतिक आन्दोलन की राजस्थान इकाई में प्रमुख दायित्व पर हैं.
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