यशवन्त कोठारी का आलेख:-अन्ना के बहाने हाथ साफ़ करते लोग - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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यशवन्त कोठारी का आलेख:-अन्ना के बहाने हाथ साफ़ करते लोग

अन्ना को प्रणाम। भारतीय जनतन्त्र को प्रणाम! अन्ना नहीं आंधी है। आज का गान्धी है। हर पीढ़ी अपना नायक ढूढंती है, आज अन्ना के रुप में नई पीढ़ी ने अपना नायक ढूढं लिया है। अपना चरित्र ढूढं लिया है सत्ता के मखौटे टूट गये है। बिखर गये है। अन्ना ने साबित कर दिया कि श्रृद्धा निष्ठा व आस्था के साथ, सत्य, अहिंसा से लड़ाई जीती जा सकती है। हर युग की लड़ाई का अन्त है अनशन । अहिंसा और जन सैलाब। जो जन सैलाब उमड़ कर आया उसे देख कर गान्धी के आन्दोलनों की यादे लोगों के जेहन में उभर कर आ गई।

जनता की जय हुई। भ्रष्टाचार की पराजय हुई। एक रावण फिर मारा गया। ईमानदारी, सत्यनिष्ठा से यदि कोई आगे बढ़े जो जनता उसे नायक बना कर उसका साथ देती है। जनता जानती है त्रासदी का अन्त कभी तो होगा। त्रासदायक जीवन के साथ साथ चलते चलते मंजिल को ढूढंना पड़ता है। रास्ता लम्बा है। कंटकाकीर्ण है। लेकिन चलते जाना है। बरसो पहले महात्मा गांधी ने राह दिखाई थी, फिर जयप्रकाश नारायण ने मशाल जलाई फिर अब अन्ना के रास्ते पर एक अरब जन चल पड़े। सरकारे जल्दी जल्दी झुक जाती है। चुक जाती है। हार जाती है। पूरी दुनिया में अहिंसक आन्दोलनों के उदाहरण ज्यादा नहीं है, हम हिंसक सरकार को अहिंसा से जीतते है। और फिर मीडिया का सहयोग जैसे सोने पर सुहागा। 

कुर्सियां हिलने लगी। बड़े बड़े लोग मंच झपटने को दौड़ पड़े। सेलेब्रिटी, बुद्धिजीवी सब ने हवा का रुख भांपा और मंच पर चढ़कर जयकारे लगाने लगे। सत्ता के विचार का चिन्तक बुद्धिजीवी, कलाकार सब दौड पड़े, अन्ना की हवा के रुख के सहारे खड़े हो गये। अन्ना को बल मिला। ईमानदारी, सत्य, अहिंसा को ताकत मिली। एक अच्छी सोच में सब साथ चल पड़े। मगर मंजिल अभी भी काफी दूर है। हमें तो बस चलते जाना है। सफलता की परिभापा हर व्यक्ति की अलग होती है। हर व्यक्ति की आंखों पर लगा चष्मा उसे अपने हिसाब से दुनिया को देखने का मौका देता है। हम एक पड़ाव पार कर चुके है और अभी कई माइलस्टोन आने है।

युवाओ की पहवान है ये आंधी। मशाल को हाथ में लेकर बढ़ते चले जाना है। युवा ही अब कुछ करेगा। हर परिवर्तन, हर क्रान्ति, हर रास्ता युवाओं के सहारे ही चलता है। करोड़ों हाथों में रोषनी है। रोषनी के रथ को अन्धकार के पहियों से बचाना है। हमें एक नये युग को बनाना है। अन्ना की मषाल वक्त की आवाज है। वक्त का तकाजा है। युवा उत्साह की आवष्यकता है। जब जब धर्म की हानि होगी कोई न कोई अन्ना रास्ता दिखायेगा, वो राजधर्म से उपर उठ कर जन-धर्म का निर्वाह करेगा। अन्ना को फिर प्रणाम। शुभकामनाएं ।  


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

तीक्ष्ण व्यंग्यकार 

86, लक्ष्मी नगर,
ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर
फोन - 2670596ykkothari3@yahoo.com
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