वर्षा:कभी मुग्धा नायिका की तरह हो जाती है तो कभी प्रौढ़ प्रगल्भा - अपनी माटी

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शनिवार, अगस्त 06, 2011

वर्षा:कभी मुग्धा नायिका की तरह हो जाती है तो कभी प्रौढ़ प्रगल्भा


यशवन्त कोठारी का व्यंग्य:-

वर्षा का आना एक खबर है। वर्षा का नहीं आना उससे भी बड़ी खबर है। वर्षा नहीं तो अकाल की खबर हो जाती है। कल तक जो अकाल को लेकर चिल्ला रहे थे वे ही आज वर्षा के आगमन पर हर्ष की अभिव्यक्ति कर बाढ़ बाढ़ खेल रहे है। जो नेता अफसर अकाल की सेवा में थे वे ही अब बाढ़ की व्यवस्था कर अपना घर भरने में लग गये है।आसमान में उमड़ते धुमड़ते बादल, चमकती बिजली, मेध गर्जन और तेज बौछारें मन को गीला कर जाती हैं। उदासी कहीं दूर पीछे छूट जाती हैं। मन मयूर नाचने लग जाता हैं। सरकार में तबादलों की वर्षा है, पहाड़ों पर हरियाली है, प्रियतमा चूरमा खाने पहाड़ो की आड़ में चली गई है।यही तो समय होता है वर्षा के आगमन का ,कालिदास मेधदूत लिखते हैं,ऋतू संहार में वर्षा का अलौकिक वर्णन करते है,और मन बौरा जाता है। वर्षा कभी स्वयं प्रेमिका बन जाती है कभी मानिनी पत्नी बन जाती है, कभी स्वयं दूती सा व्यवहार करने लग जाती है कभी मुग्धा नायिका की तरह हो जाती है तो कभी प्रौढ़ प्रगल्भा की तरह बनने सॅवरने लग जाती है। कभी वर्षा सौतन हो जाती है तो कभी कठोर सास या फिर सावन के झूले पर बैठी इठलाती भारतीय परम्परागत नारी बन सबको लुभाती है। गीत, सावन की बूॅदें, लेहरिया,गेबर, चूरमा आभूषण, वस्त्रालंकार, मेहन्दी रचे हाथ, मुॅह पर चॉदनी की शोभा, म्रणाल बाहों में झूलता झूला सब मिलकर वर्षा को वर्षा बनाते हैं।

मगर आज की वर्षा, हे भगवान, ! राज्य पानी के लिए लड़ रहे हैं, वर्षा होते ही बिना मॉगे पानी दे रहे हैं। कृष्णा कावेरी से लगाकर पंजाब की नदियों से पानी बिना मांगे मिल रहा है।आधी रात का बेला महकते हैं, वर्षा आती हैै।पिया बिन डरपत मोरा, रामचरित मानस में राम कहते हैं। और पिया की खोज में वानर सेना को लगा देते हैं।वर्षा है तो मेढ़क हैं, केंचुए है, हाथियों की चिघाड़ है, वर्षा नही तो कोयल तक नहीं कूकती।रात को उमस की गर्मी से परेषान रहता हू सुबह आषढ़ का बादल देखकर मन प्रसन्न होना चाहता हैं मगर, अखबार में बाढ़ के समाचार देखकर वर्षा का हर्ष काफूर हो जाता है। मेधों से धिरा मैं स्वयं को बाढ़ से घिरा पाता हूँ.। शायद वर्षा के स्वागत में मन अधीर है।

हवा में खुनक है वो मन्द मन्द बादलों को ले जा रही है जल के बादल रंग बदल रहे हैं, गिरगिट की तरह या भारतीय राजनेताओं की तरह वे बहे चले जा रहे हैं। दिषाहीन नहीं हैं बादल। वे प्रिया के देष उड़ कर जा रहे हैं, मन है कि उनके पीछे भागता चला जा रहा है। तेज वर्षा के कारण, बादल फटने के कारण, बिजली गिरने के कारण बाढ़ में बह जाने के कारण, बस गरीब ही मारा जाता है।चिड़िया दाना ढ़ूॅढ़ रही हैं,गरीब के आषियाने में पानी भर गया है, क्योंकि वर्षा हो रही है। नदी, नाले,झीलें, तालाब, बॉध सब में पानी ही पानी है चारों तरफ से पानी बह कर वर्षा का आनन्द दे रहा है। वर्षा हो तो अच्छा लगता है बच्चे उछल कूद कर रहे हैं। छत पर सड़क पर नालों में नंगे बदन नहा रहे हैं।ै कम उम्र लड़कियॉं भी नहा रही हैं, प्रौढ़ाएॅं उन्हें बरज रही हैं। मगर मन है कि मानता नही हैं.।वर्षा ऋतु का आना सर्वत्र साक्षी होता है। पेड़ों पर, जंगलों में,घरों में, तालाबों में सर्वत्र वर्षा दिखाई देती है साक्षी ऋतु सर्वत्र हर्ष को बिखरा देती है। हे ! वर्षा तुम मरूधरा की वसुन्धरा पर जमकर बरसो।वर्षा में राजनीति ठंडी पड़ जाती है। अफसरी दुबक जाती है। छतें टपकने लग जाती हैं। साहित्य में सीलन आ जाती है। चोर उचक्के नये नये बितान तान कर अपने धन्धे पर चल पड़ते हैं।

वर्षा आई तो मन हर्षा । अफसर की बेबी बाढ में पिकनिक मनाने चल पड़ती हैं। सरकारी गाड़ी सरकारी ड्राइवर, सरकारी पेट्रोल, सरकारी अरदली, सरकारी खाना पीना। उन्हें बाढ़ सुन्दर, ब्यूटीफुल और क्यूट दिखाई पड़ती है और गरीब कच्ची बस्ती की मलिका के साथ फोटो खिंचवा कर अखबार में दे आती है। आह वर्षा का वर्णन बड़ा सुहाना, वाह वर्षा के क्या कहना, बाढ़ के लिए खरीद में जीमो चूरमा बाटी की गोठ करो और हाय वर्षा तुम अभी क्यों आई। कुछ समय ठहरती या फिर कब आओगी। मेरे मन में यही सब घुमड़ रहा हैं।और बाहर मेढ़क टर्र टर्र कर रहे हैं।केंचुए अफसरों की शक्ल में सचिवालय में रेंग रहें हैं।बरसाती मेढ़कों की तरह लोग समर्थ की विरूदावलियॉं गा रहें हैं। वाह वर्षा वाह।

कालिदास तो श्रंगार के अप्रतिम कवि हैं। वर्षा, मेढ़क, सुन्दर स्त्रियां, कामदेव उनके प्रिय विषय हैं, वो बताते हैंकि “ बरसात में नदियॉं बहती हैं, बादल बरसते हैं, मस्त हाथी चिंघाड़ते हैं, जंगल हरे-भरे हो जाते हैं और अपने प्रियतमों से बिछुड़ी स्त्रियॉं दुखी होती हैं, मोर नाचते हैं, और बन्दर गुफाओं में छिप जाते हैं।” सैकड़ों झरने, हजारों नदियॉं, नाले सब लबालब भर जाते हैं। और सर्वत्र पानी हो जाता है समुद्र की प्यास को बुझाने चल पड़ती है सैकड़ों नदियॉं, और समुद्र है कि फिर भी प्यासा ही रह जाता है वह प्यासा ही अगली वर्षा का इंतजार करने लगता है। धरती पर बिछ गई है एक हरी चादर। वर्षा की बूॅंदें सूर्य की किरणों के कारण हीरों सी चमक रही हैं। वीर बहूटियों से धरती अटी पड़ी हैं। चारों तरफ वर्षा की झड़ी लगी हैं। धरती और समुद्र की प्यास बुझाने वर्षा फिर आयेगी। इन्दर भगवान की कृपा रहेगी। कृष्ण गोवर्धन पर्वत को वर्जनी पर उठा लेंगे और व्रन्दावन ही नहीं संपूर्ण विष्व को आनन्द देंगे ।

वर्षा ऋतु सबसे सुन्दर लगती हैं लोकगीतों में इस सुन्दरता का बड़ा मनोहारी वर्णन है। मैं एक लोकगीत के अंषों के साथ इस प्रबंेध को समाप्त करने की इजाजत चाहता हूँ.

कच्ची नीम की निबौरी,
सावन कब आवेगो ?
बाबा दूर मत दीजो हमकू
कौन बुलावेगो ?

हे वर्षा ! मैं तुम्हारा फिर आहृान करता हूँ.। आओ और मुझे भिगोओ।


 योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

तीक्ष्ण व्यंग्यकार 

86, लक्ष्मी नगर,
ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर
फोन - 2670596ykkothari3@yahoo.com
यशवंत कोठारी के बारे में विस्तार से जानकारी यहाँ क्लिक कर देखें.
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