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''आज मुख्य संघर्ष सुधारवाद और क्रान्तिवाद के बीच का है''-कौशल किशोर

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अगस्त 31, 2011 | बुधवार, अगस्त 31, 2011


अन्ना के आन्दोलन की वैचारिकी और उसकी दिशा अप्रैल में ही साफ हो गई थी। यह आंदोलन ‘अराजनीति की राजनीति’ पर शुरू से ही आधारित रहा है। इसके संचालन की सारी जिम्मेदारी तथा इसके कर्ता धर्ता एन जी ओ वाले थे। राजीतिक दलों व संगठनों यहाँ तक कि रैडिकल संगठनों को आन्दोलन से दूर रखा गया था। मंच के पास फटकने तक नहीं दिया गया था। इसलिए जो लोग इस आंदोलन के पीछे एन जी ओ की बात ला रहे हैं, वे कोई नई बात नहीं ला रहे हैं। इस आन्दोलन के आरम्भ से ही यह बात साफ थी। संभव है यह बात उस वक्त उन्हें नहीं दिख रही हो। 

जरूरी सवाल यह है कि जो समाज के का्रन्तिकारी रूपान्तरण की ताकतें हैं, वे इस आन्दोलन के प्रति क्या रुख रखें, उनका नजरिया क्या हो ? किसी भी क्रान्तिकारी के लिए यह जरूरी होता है कि वह समाज में घटने वाली घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण करे, उससे सीखे और इसी आधार पर अपने व्यवहार की दिशा तय करे। इस आन्दोलन के बारे में सिर्फ यह कह देना कि सारा मीडिया व एनजीओ प्रायोजित था, यह अधूरी सच्चाई होगी। द्वन्द्ववाद यही कहता है कि किसी भी ऐसे आन्दोलन के कारण भारतीय समाज में मौजूद है जिससे इस आंदोलन ने जन्म लिया। यह भी विचार का विषय है कि क्यों वामपंथी संगठन जिनके ये स्वाभाविक मुद्दे हैं, उन पर वे कोई बड़ी पहलकदमी न ले पाये और उनकी भी हालत बहुत कुछ अन्य सत्ताधारी दलों जैसी बनी रही। क्या वजह है कि प्रकाश करात से लेकर अरुंधती राय तक मात्र आलोचना से आगे नहीं बढ़ पाते ? क्या इससे यह नहीं लगता कि आज आत्मालोचन इनके राजनीतिक व्यवहार की वस्तु नहीं रह गया है ? यही कारण है कि आलोचना करते हुए ये कोई विकल्प नहीं पेश कर पा रहे हैं। इसीलिए यह मात्र ‘आलोचना के लिए आलोचना’ है। अरुंधती राय को लेकर भी यह बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि वे भी अपने को एक्टिविस्ट के रूप में पेश करती हैं।

लेनिन ने कहा था कि जब शासक वर्ग के लिए अपने पुराने ढाँचे को बनाये रख पाना तथा पुराने तरीके से शासन कर पाना दिन दिन कठिन होता जाय तथा जनता के लिए भी इस ढ़ाँचे में रह पाना संभव न रह जाये, यह हालत व्यवस्था परिवर्तन की माँग करती है। आज हालत कमोबेश ऐसी ही हैं। उसकी सेना व अर्द्धसैनिक बलों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। देश को वह इमरजेन्सी जैसी हालतों की तरफ ढकेल रहा है। दूसरी तरफ अन्ना जैसे आन्दोलन सुधारात्मक कदम के द्वारा लोकतंत्र व शासक वर्ग को संजीवनी देने वाले हैं जिसका उद्देश्य ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के नाम पर वास्तविक परिवर्तन के संघर्ष को रोक देना है। ‘अराजनीति की रजनीति’ शासक वर्ग का ही वैचारिक हथियार है। एन जी ओ इस सुधारवाद के हाथ पांव हैं। ‘दमन की राजनीति’ और ‘अराजनीति की राजनीति’ एक ही सिक्के के दो पहलु हैं।  

इसलिए आज मुख्य संघर्ष सुधारवाद और क्रान्तिवाद के बीच का है। यह सरल न होकर जटिल संघर्ष है। और इस संघर्ष की द्वन्द्वात्मकता तथा गति विज्ञान को न समझ पाने की वजह से ही इस सम्बन्ध में अरुंधती राय कहीं न कही ‘ग्रासरुटवाद’ का शिकार हो गई हैं। अरुंधती राय अपनी प्रखरता के लिए मशहूर हैं और हमे उनसे अपेक्षा है कि वे और गहरे में जायेंगी तथा एक विकल्प के साथ आयेंगी। जनता के वास्तविक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए यह जरूरी हैं।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


कौशल किशोर,जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.
एफ - 3144, राजाजीपुरमलखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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