भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी की दो सपाट कवितायेँ - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी की दो सपाट कवितायेँ


 वह नव यौवना

वह
खूबसूरत है
रूप लावण्य से भरपूर
नव यौवना है।
वह!
पढ़ी लिखी है
एक कम्पनी में काम करती है
वह!
जिस कम्पनी में काम करती है उसके
अन्य कर्मचारी कामचोर
और निकम्मे हैं
वह
अन्य कर्मचारियों
से कम पगार पाती हैं।
वह
समय की पाबन्द है
अपना कार्य बड़ी तन्मयता
लगन से करती है।
वह!
मुझे नव व्याहता प्रतीत हुई
मेरी अनुभवी
नजरें धोखा नहीं खा सकती हैं।
वह
यह जानती है कि
सेवा प्रदाता और सहकर्मियों
की आँखों में
एक बहशीपन है
उसके रूप लावण्य के प्रति
वह
सतर्क है इन आदिम
भेड़ियों से उसे देखकर
मैं सोचता हूँ
अल्प मासिक वेतन
की  बेबसी क्यों खींच लाई
उसे ऐसी जगह जहाँ
आदमखोर लोग
और बेहूदी चर्चाओं के जंगल हैं।
क्या दहेज लोभी
ससुरालजनों ने उसे ऐसा
करने को विवश किया है।
या-
महँगाई के चलते
आर्थिकमन्दी
का शिकार उसके पति का
ठप्प व्यापार है कारण।
क्या-
उसका टूट गया है
प्रेम-विवाह?
कौन सी विवशता थी
उसके सामने जिसने बाँध दिया
नव व्याहता उमंगों को
एक साधारण सी नौकरी में।
उसके शान्त चेहरे
को देखकर मेरी जिज्ञासा
बढ़ जाती है।।।
मैं
आदमकद दर्पण के सामने
खड़ा होकर
उसके बारे में सोचने
लगता हूँ
स्वयं से प्रश्न करता हूँ-
आदिम भेड़ियों के
जंगल में भटकते-भटकते
क्या मैं भी-
आदमखोर भेड़िया बनने
लगा हूँ
उसके प्रति........???

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फिर बजी बाँसुरी

बँसी बजाकर
मनमोहने वाला नन्दलाला
फिर बजाने लगा
बाँसुरी।
योगिराज कहलाने वाला
दधि, माखन
खाने वाला, रास रचाने वाला
फिर लुभाने लगा
गोपिकाओं को बाँसुरी धुन से।
राधा की नींद टूटी
वह खिंचती
चलने लगी
बाँसुरी की आवाज की ओर।
राधा-
बेसुध, बौराई, अधीर, पगलाई
सी दौड़ने लगी।
फिर-
अचंभित हो ठिठक कर
चतुर्दिक
निहारने लगी।
कशमकश में पड़ी राधा
किस दिशा में जाये
किधर जाये
कहाँ मिलेगा उसका
श्याम बाँसुरी बजइया.....?
राधा-
यह विस्मृत कर
चुकी है कि-
कण-कण में विद्यमान हैं
कन्हैया।
उसके व्यक्तित्व
में भी हैं।
यही कारण है-
उसे बाँसुरी की आवाज
निरन्तर सुनाई
पड़ रही है, और-
वह है कि कृष्ण को
अपने
अन्तर्मन में ढूंढकर
बेसुध, पगलाई
इधर-उधर भटक रही है।।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
डॉ0 भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
अकबरपुर-अम्बेडकरनगर (उ.प्र.)
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