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पुस्तक समीक्षा:उद्भ्रान्त एकदम से प्रचलित मिथकों को सिरे से खारिज नहीं करते

Written By Manik Chittorgarh on बुधवार, अगस्त 31, 2011 | बुधवार, अगस्त 31, 2011


सच है कि हर इन्सान, हर शायर, हर लेखक अपने आप में अलग होता है। लेकिन एक सचाई यह भी है कि वह अलग नहीं भी होता। जो सम्बन्ध् जो समाज, जो पारिवारिक दायरे एक कवि या लेखक के होते हैं लगभग वैसे ही दूसरों के भी होते हैं। लगभग एक से परिवेश में रहते हुए जो अनुभव, अहसास या दृष्टिकोण किसी एक लेखक के हो सकते हैं वे किसी दूसरे के भी हो सकते हैं। इन अनुभवों या अहसासों को कविता में उतारने के ढंग अवश्य जुदा-जुदा होंगे। इसीलिए ग़ालिब अपने अन्दाजे़ बयां को और ही तरह का ठहराते हैं। इसे उनका बड़बोलापन कहा जा सकता है। लेकिन सचाई यही है। ग़ालिब जानते थे कि दो लोगों के अहसास कभी कभार एक जैसे हो सकते हैं। लेकिन दोनों के कहने का ढंग कदापि एक जैसा नहीं हो सकता। उदाहरण के लिये काव्य में इसकी अभिव्यक्ति सदा से होती आई है लेकिन हर कवि की कविता में इसकी प्रस्तुति अलग ही ढंग से हुई है। इसीलिये पाठक अलग-अलग तरह से आस्वाद ग्रहण करता है।

उद्भ्रान्त की कविताओं की अपनी एक अलग दुनिया है। वे प्रचलित मिथकों को सिरे से खारिज नहीं करते बल्कि उन्हें समकालीन परिवेश में उनकी उपस्थिति किस रूप में हो सकती है इसकी खोज करते हैं। उनका इसी वर्ष में प्रकाशित बृहत्काय कविता संकलन ‘अस्ति’ अपने आप में कुल 476 पृष्ठ समेटे हुए है। यदि रचनावलियों और क्लासिक महाकाव्यों को छोड़ दें तो मुझे लगता है इतना बड़ा संकलन आज तक किसी कवि का नहीं आया होगा। ‘अस्ति’ के पहले खण्ड को कवि ने शीर्षक दिया है- ‘जैसे सपना एक चकमक पत्थर है।’ सपना देखना एक स्वाभाविक क्रिया है। लेकिन कभी-कभी मनुष्य कोई ऐसा सपना भी देखता है जो उसकी ज़िन्दगी को ही बदल देता है। इसीलिये माना जाता है कि हर परिवर्तन को भी व्यक्ति प्रथमावस्था में एक स्वप्न के रूप में देखता है। उसका सपना जब यथार्थ से टकराता है तो चिनगारी छोड़ता है। यह चिनगारी उसे तब तक चैन नहीं लेने देती जब तक वह स्थितियों में बदलाव लाने की लालसा पूरी नहीं कर लेता या यह भी हो सकता है कि वह अधूरी लालसा ही लिये दृश्य पटल से हट जाय। 

उदभ्रांत जी 
140 कविताओं वाला यह खण्ड जहां माँ, दादाजी, पतंग, आज़ादी, पेपरवेट, पिता, टॉर्च, मोमबत्ती, कर्ज़, जेल, आत्महत्या और बचपन जैसे सामान्य विषयों पर कवितायें लिये हुए है वहीं प्रेम, मृत्यु, मुक्ति, उड़नतश्तरी, ब्रह्मांड, ब्लैकहोल, समय, बोधीवृक्ष जीवन, प्रकृति आदि में कवि की दार्शनिक सोच की झलक मिलती है। मनुष्य जीवन के बाह्य और अन्तरंग को उन्होंने विस्तार और गहराई तक पैठ कर देखा है। इसलिये उनके वर्णन से सूक्ष्मातिसूक्ष्म डिटेल भी बच नहीं पाई है। इस खण्ड की शुरुआत ही इसके शीर्षक वाक्य से होती है। इसकी व्याख्या वे इस प्रकार करते हैं-‘जैसे सपना/एक चकमक पत्थर है/संघर्ष की तीली से रगड़ खा/भीतर की आग को/विकीर्णित करता/पफैला देता/समस्त दिशाओं में/एक अद्भुत/ और सर्वथा अछूता/प्रकाश लोक’। समय की यह व्याख्या भारतीय कालगणना को अलग रूप में प्रस्तुत करती है।

आधुनिक उदार अर्थव्यवस्था ने जिस तरह मानव जाति का वर्तमान और भविष्य बाजार के हाथों गिरवी रख दिया है उससे एक ऐसी प्रतियोगितात्मक संस्कृति का विकास हुआ है जो शक्तिमत्ता को ही जीवन की शर्त मानती है। प्रतियोगिता की यह एक अंधी दौड़ है। इसमें निर्बल, निरीह को जीने का अधिकार नहीं रहा है। ऐसे लोग या तो हाशिये की और ध्केले जा रहे हैं या उन्हें आत्महत्या के लिये विवश किया जा रहा है। आश्चर्य है कि इस तरह की मौत को आत्महत्या की संज्ञा दी जा रही है जबकि वह सरासर बाजारवादी व्यवस्था द्वारा की जाने वाली हत्या है। कवि कहता हैµ‘उसने आत्महत्या की/सीलिंग पफैन से लटककर/परीक्षा की तैयारी नहीं थी पूरी/और जीवन की परीक्षा में/असपफल होने का भय था उसे।’ बाजार की मांग के अनुरूप बदलती शिक्षा प(ति में न केवल असपफल होना बल्कि कम नम्बरों से पास होना तक भयावह हो गया है कि उससे मुक्ति मौत को गले लगाने के अतिरिक्त कहीं नहीं मिल पाती। लोगों को क्रूर सच का ज्ञान करा दिया गया है कि शिक्षा व्यवस्था द्वारा निर्धरित परीक्षा में असपफल होना या अच्छे अंकों से पास न होना जीवन की परीक्षा में भी असपफल हो जाना है।

इस बर्बर व्यवस्था ने व्यक्ति को जीवन के जिस संग्राम में भाग लेने के लिये मजबूर कर दिया है उसे उसी के हथियारों से जीता जा सकता है। इसमें न्याय-नैतिकता के लिये कोई स्थान नहीं हे। इसमें जीत उसी की होती है जो क़ामयाब होता है। चाहे वह क़ामयाबी किसी भी तरह के छलकपट से क्यों न प्राप्त की गई हो।स्कूल जाते एक बच्चे ने- 

‘जीवन में संघर्ष का/
पहला सबक़ पाया/
और कड़ी धुप में आग बरसाते/
सूर्य  से बचने की सीमा से गुज़रते ही/
किनारे खड़ी बबूल की/
घनी झाड़ियों की ओट को ही/
बनाया साया/
पिफर उसी/
काँटे को तोड़ पाँव में/
अन्दर तक धंसे शूल को/
बाहर निकाला।’ 

काँटे से काँटा निकालना ही आज के जीवन की समस्याओं का चरम समाधन है। दूसरे खण्ड को लेखक ने ‘उलट बाँसी’ का नाम दिया है और इसकी शुरुआत भी इसी शीर्षक की कविता से की गई है। लेकिन इस खण्ड में अयोध्या को लेकर दी गई सात कवितायें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दरअसल पिछली सदी के अन्तिम दशक में हुआ बाबरी मस्जिद का ध्वंस और राम जन्मभूमि की पुनः प्रतिष्ठा का प्रयास एक ऐसी दुखद घटना है जिसने हमारे धर्म निरपेक्ष राष्ट्रीय चरित्रा और सह अस्तित्त्व को मानने वाली संस्कृति को इस तरह कलंकित किया है कि हम दुनिया के सामने अपनी गौरवपूर्ण थाती को गँवा कर शर्मसार होने के लिये विवश हो गये हैं। जो गरिमा हमने सदियों से सम्भाल कर रखी थी, जिससे सारी दुनिया के लोग ईर्ष्या करते थे, उसे हमने एक दिन के चन्द घण्टों में ध्ूलि ध्ूसरित करके रख दिया है। और अब भी इसे अपने ही लोग अपने र्ध्म की असाधरण विजय के रूप में प्रशंसित करने में लगे हैं। 

इस क्रम की पहली ही कविता ‘बिंब’ की ये पक्तियां दृष्टव्य हैं- 

‘शब्द अयोध्या/
पड़ता कान में तो/
मस्तिष्क का कम्प्यूटर/
अपनी स्मृति में/
तत्क्षण जो बिंब/
उपस्थिति करता आजकल/
क्या है वैसा ही/
जो कि कौंध् जाता था/
एक डेढ़ दशक पूर्व/
भारत के किसी भी/
नागरिक के मन में।’ 

इस बिंब को खंडित किया है उन लोगों ने जो सांप्रदायिकता की आग सुलगाकर अपनी राजनीति की रोटियां सेकने के लिये प्रयत्नरत हैं। राम के वन गमन को कवि प्रचलित अर्थों में नहीं देखता। इसे वह राम की एक ऐसी यात्रा मानता है जो वनवासी आदिम जातियों के साथ वहां विचरने वाले पशु पक्षियों और वनस्पतियों से संवाद स्थापित करने और उनके प्रति अपनी संवेदना विकसित करने के लिये की गयी थी। सीता की वह चिरन्तन छवि जो अब भी लोगों के मन में बसी है, और जिसमें उन्हें एक आदर्श स्त्री के रूप में दिखाया गया है, उसमें कवि की ऐसी नारी की झलक देखता है जो अपनी पहचान बनाने के लिये संघर्ष कर रही है-

‘सीता का/
कनक महल में उभरा हुआ रूप/
आज की युवा कर्मठ/
 नारी में प्रतिबिंबत होकर/
काल की तराजू पर/
न्याय की कसौटी को कसता हुआ/
एक नई क्रांति का/
उद्घोष कर रहा है।’ 

अपनी ‘सीता रसोई’ कविता में कवि रसोई में प्रयुक्त सभी उपकरणों में सीता के जीवन की विभिन्न झांकियां देखता है। और अन्त में वह रामजन्म भूमि के आसपास तैनात सैन्य शक्ति को देखकर सोचता है कि क्या वे राम, जिन्होंने परम पराक्रमी राक्षसों को बिना विशेष तैयारी के मौत के घाट उतार दिया था, आज इतने निश्शक्त हो गये हैं कि उन्हें इन बन्दूकधरी जवानों को अपना रक्षा कवच बनाना पड़ा है? आखिर उन्हें किस का डर है-

‘अयोध्या में/
मैंने देखा/
दोनों समुदायों में/
वैमनस्य/
प्रीति देखी सच्ची।’ 

वास्तविकता यही है कि अयोध्यावासियों में रामजन्मभूमि को लेकर किसी प्रकार का न तो पहले विवाद था न आज है। यह विवाद तो अयोध्या के बाहर रहने वाले धर्मांध लोगों ने पैदा किया है और उसे तब तक बनाये रखना चाहते हैं जब तक उनके स्वार्थ पूरे नहीं होते। आज भी यदि रामजन्मभूमि को अयोध्यावासियों के ही हवाले कर दिया जाय तो इस आरोपित समस्या का स्वतः समाधन हो सकता है।

तीसरा खण्ड है ‘नींद में जीवन’। लेकिन इसकी शुरुआत इस तरह के शीर्षक वाली कविता से नहीं हुई है। इसमें कुल 148 कवितायें समाहित हैं। इनमें ‘वर्जित पफल’, ‘किराये का मकान’, ‘तवायप़फ’, ‘नये घर का उपेक्षित कोना’, ‘नास्तिक’, ‘रक्त सम्बन्ध्’, ‘बाबा मार्क्सः गांधी बाबा’, ‘नींद में जीवन’, और ‘अर्थ का टिमटिमाता ब्राह्मांड’ आदि कई कवितायें पठनीय हैं। लेकिन यहां मैं ‘पहल’ में छपी कविता ‘बकरामण्डी’ पर कुछ चर्चा करना चाहूंगा। ईद का त्यौहार मनाने के लिये सैकड़ों बकरे सजा ध्जा कर लाये गये हैं। इनके मालिक और खरीददार दोनों ही इनके मोल भाव में लगे हैं। मालिक चाहता है उसे अपने बकरे का अध्कि से अध्कि दाम मिले जबकि खरीददार की कोशिश है कि कम से कम दाम में उसे अध्कि हृष्ट-पुष्ट बकरा मिल जाय। पहले व्यक्ति को अपना बकरा बेचकर अपनी रोटी का जुगाड़ करना है जबकि दूसरा इसका खुद स्वाद लेना चाहता है और अपने लोगों को भी दिलाना चाहता है। लेकिन मासूम बकरे नहीं जानते कि उनके साथ क्या होने वाला है। उन्हें अच्छा चारा खिलाया गया है, नहला धुलाकर सजाया गया है तो इसका मतलब है आज का दिन देखने को नहीं मिलेगा। उध्र बेचने वाला सोच रहा है-

‘क्या अपने बकरे की क़ीमत/
उसको इतनी मिल पायेगी/
कि वह इसी मण्डी से/ 
कम क़ीमत वाला बकरा एक/
अपने बीबी-बच्चों के वास्ते/
खरीद सकेगा और/
यों कुर्बानी दे सकेगा/
अपने हिस्से की।’

 इस तरह यह कविता समाज की उन विषम स्थितियों से परदा उठाती है जिनमें कुछ लोग दूसरों की क़ुर्बानियों से अपनी मौज मस्ती करते हैं।संक्षेप में जो कुछ ऊपर लिखा गया है वह तो एक ट्रेलर मात्रा है, असली स्वाद तो आप तब पायेंगे जब पुस्तक की शेष कविताओं को भी पढ़ेंगे।

समीक्षित पुस्तक: ‘अस्ति’ ;कविता संग्रहद्ध, कवि: उद्भ्रांत, प्रकाशक: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, 2/35, अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली-110002, पृष्ठ: 700, मूल्य: 750 रुपये मात्रा


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुरेश पंडित 

383, स्कीम नं. 2, लाजपत नगर, 
अलवर-301001
मोबाइल: 08058725639
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