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''हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम-विस्फोट की गूंज 'अंधा युग' में''-डॉ.रेणु व्यास

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, अगस्त 14, 2011 | रविवार, अगस्त 14, 2011

धर्मवीर भारती का गीति-नाट्य अंधा युग रंगमंच पर सर्वाधिक सफल हिंदी कृतियों में से एक है। इसमें महाभारत युद्ध के अट्ठारहवें दिन की संध्या से प्रभास-तीर्थ में कृष्ण के देहावसान के क्षणों तक की कथा है। :स्वाधीन भारत में जिस समय आशावाद चरम पर था, तब 1955 में प्रकाशित यह काव्य-नाटक अवसादपूर्ण त्रासद स्थितियों को कथ्य बनाने के कारण अपनी समकालीन अन्य कृतियों से विशिष्ट है।

जब-जब युद्ध होता है, तब-तब मानवता त्रासद स्थितियों से रूबरू होती है। प्रत्येक युद्ध के बाद मनुष्य पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित होता है कि क्या वे जीवन-मूल्य युद्ध की असाधारण परिस्थितियों में बचे रह पाए, जिनकी रक्षा के लिए उसे युद्ध में प्रवृत्त होना पड़ा। द्वितीय विश्व युद्ध मानव-इतिहास की इस सामान्य प्रवृत्ति को दोहराते हुए भी व्यापक जन-विनाश एवं उससे प्रभावित लोगों में जीवन-मूल्यों के प्रति बड़े पैमाने पर उपजी अनास्था के कारण अन्य युद्धों से गहन प्रभाव वाला है। द्वितीय विश्व युद्ध की इसी पृष्ठभूमि में अंधा युग की रचना हुई।

द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम-विस्फोट के रूप में जो अकल्पनीय मानव-त्रासदी घटित हुई, उसकी गूंज अंधा युग में भी स्पष्ट रूप से सुनाई देती है, जब व्यास अश्वत्थामा को ब्रम्हास्त्र के प्रयोग के दुष्परिणामों के प्रति चेतावनी देते हैं-

ज्ञात क्या तुम्हें परिणाम इस ब्रमास्त्र का
यदि यह लक्ष्य-सिद्ध हुआ नर पशु!

तो आगे आने वाली सदियों तक पृथ्वी पर रसमय वनस्पति नहीं होगी शिशु होंगे पैदा विकलांग और कुष्ठग्रस्त.. गेहूं की बालों में सर्प फंफकारेंगे नदियों में बह-बह कर आएगी पिघली आग।चाहे फासीवादी-नाजीवादी राष्ट्र हों या मित्र राष्ट्र, दोनों ही पक्षों की साम्राज्य-लिप्सा इस युद्ध में उभर कर सामने गई। कुछ राजनेताओं की महत्वाकांक्षाओं का मूल्य पूरी एक पीढ़ी को चुकाना पड़ा। अंधा युग के कथानक में भी कौरवों एवं पांडवों, दोनों के द्वारा युद्ध की मर्यादा का तोड़ना रेखांकित किया गया है-


है अजब युद्ध यह,
 नहीं किसी की भी जय दोनों पक्षों को खोना ही खोना है 
अंधों  से शोभित था युग का सिंहासन दोनों ही पक्षों में विवेक ही हारा दोनों ही पक्षों में जीता अंधापन भय का अंधापन, ममता का अंधापन,
अधिकारों का अंधापन जीत गया जो कुछ सुन्दर था,
शुभ था, कोमलतम था वह हार गया.
द्वापर युग बीत गया।

अश्वत्थामा की पशुवत निजी प्रतिहिंसा लेखक को जितना उद्वेलित करती है, उतना ही सत्यवादी युधिष्ठिर का यह अर्धसत्य कि अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा। इसी कारण डॉ. भारती नाट्य-संकेतों में हंस और बाज की बजाय कौए और उल्लू की लड़ाई चित्रित करते हैं, जिनकी हिंसकता में मात्र मात्रात्मक फर्क है, गुणात्मक नहीं। युद्ध के बाद पराजित जनता की निराशा, पीड़ा, अवसाद, कुंठा तो स्वाभाविक थे ही, किंतु द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विजयी राष्ट्रों की जनता ने भी यही सब महसूस किया; विशेषकर युद्धरत सैनिकों ने। अंधा युग में भी विजयी पांडव शिविर की यही स्थिति है -

सब विजयी थे लेकिन सब थे विश्वास-ध्वस्त


इसका कारण यह था कि द्वितीय विश्व युद्ध में व्यापक जन-हानि तो हुई ही, इसने व्यक्ति के विश्वास, आस्था और मूल्यों को झकझोर कर रख दिया। युद्धरत सैनिकों और जनता ने अनुभव किया कि राष्ट्रीयता, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता, जिनके नाम पर यह युद्ध लड़ा गया, वे आदर्श खोखले हैं। सत्ता द्वारा साम्राज्यवादी उद्देश्यों को छिपाने का मुखौटा भर हैं। अंधा युग का आरंभ भी इसी विडंबना के साथ होता है-

सत्ता होगी उनकी/
जिनकी पूंजी होगी जिनके नकली चेहरे होंगे
 केवल उनको महत्व मिलेगा राजशक्तियां लोलुप होंगी/
जनता उनसे पीड़ित होकर गहन गुफाओं में छिप-छिप कर दिन काटेगी 
(गहन गुफाएं! वे सचमुच की या अपने कुंठित अंतर की?)

इस प्रकार युद्ध के उपरांत अंधा युग अवतरित हुआ, जिसमें स्थितियां, मनोवृत्तियां, आत्माएं सभी विकृत हैं। अश्वत्थामा, जो इस नाटक का सबसे महत्वपूर्ण पात्र है, इसी स्थिति से उपजा प्रतीक-पात्र है, जिसका कहना है

वध मेरे लिए नहीं रही नीति
वह है अब मेरे लिए मनोग्रंथि

संजय, जिसके पास दिव्य दृष्टि है, वह आधुनिक लेखक, पत्रकार या बुद्धिजीवी का प्रतीक है। धृतराष्ट्र सत्ता का प्रतीक हैं। उनका अंधापन, पुत्रमोह और सत्ता िलप्सा इस प्रतीक को और अर्थवान बनाते हैं। गांधारी सत्ता की निकटस्थ वह पात्र है, जिसके पास विवेक रूपी आंखें तो हैं, किंतु उन पर जान-बूझ कर पट्टी बांध रखी है। विदुर उस चुके हुए और अप्रासंगिक राजनेता के प्रतीक हैं, जो नीतिज्ञ तो हैं, किंतु उनकी नीति साधारण स्तर की है और युग की सारी स्थितियां असाधारण हैं। कृष्ण, प्रत्येक मनुष्य के भीतर स्थित शुभत्व का प्रतीक हैं। इसी कारण लेखक कृष्ण के मुख से कहलवाते हैं

अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में 
कोइ नहीं, केवल मैं ही मरा हूंकरोड़ों बार

लेखक मानते हैं कि एकमात्र उन्हीं में वह शक्ति है, जो इस अंधे युग से मानव जाति को बाहर निकाल सके।
अंधा युग की त्रासदी यह है कि अश्वत्थामा, जो सबसे सक्रिय और गतिशील पात्र है, वह बर्बर पशु है, शब्दों का शिल्पी संजय दिव्य दृष्टि होते हुए भी निष्क्रिय, तटस्थ और कर्मलोक से बहिष्कृत है।

सत्तासीन धृतराष्ट्र और गांधारी अंधे हैं या उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है, दोनों प्रहरी, दासवृत्ति से चालित उस सामान्य जन के प्रतीक हैं, किसी भी सत्ता-परिवर्तन से जिनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं होता।वे स्थितियों के दर्शक मात्र हैं। इस अंधेरे में कृष्ण ही सबकी एकमात्र उम्मीद हैं, किंतु वे स्वयं शापग्रस्त हैं। उनका यदुवंश आपस में लड़ िभड़ कर मर रहा है और वे उस धुरी की तरह एकाकी बच गए हैं, जिसके सारे पहिए नीचे उतर चुके हैं। विडंबना तब और गहरी हो जाती है, जब नरपशु अश्वत्थामा बूढ़े भविष्य की हत्या कर देता है और सत्य का पक्ष लेने का साहस करने वाला युयुत्यु अपनों की घृणा से आत्महीनता का शिकार होकर आत्महत्या कर लेता है। कृपाचार्य के मुख से लेखक ने इस त्रासदी के प्रति चेतावनी दी है-

रक्त ने युयुत्सु के/
लिख जो दिया, इन हमलों की भूमि पर
समझ नहीं रहे हैं, उसे ये आज
यह आत्महत्या होगी प्रतिध्वनित
 इस पूरी संस्कृति में
 दर्शन में, धर्म में, कलाओं में, शासन- व्यवस्था में
आत्मघात होगा बस अंतिम लक्ष्य मानव का


विश्वयुद्धों के बाद की ठीक यही स्थिति थी, जब अस्तित्ववाद जैसे दर्शन का प्रसार हुआ। कविता का अंत, साहित्य का अंत, इतिहास का अंत जैसी उत्तर-आधुनिक भविष्यवाणियां की गईं।अंधा युग द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखा गया काव्य है, लेकिन इस पर लगभग उसी समय हुए त्रासद भारत-विभाजन और भयंकर सांप्रदायिक दंगों की भी छाया है। गांधारी के शाप के कारण यदुवंशियों का मदिरापान कर आपस में लड़-भिड़ कर विनष्ट होना इन दंगों को ध्वनित करता है। इस अमानवीय विभीषिका से व्यक्तिगत प्रतिशोधकामी अश्वत्थामा जैसे जाने कितने नरपशु पैदा हो गए और सत्य का पक्ष लेने वाले युयुत्सु अलग-थलग पड़कर आत्महीनता का शिकार हो गए।

स्वाधीन देश के प्रधानमंत्री युधिष्ठिर की तरह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए और महात्मा गांधी शापग्रस्त कृष्ण की तरह अपने ही लोगों को लीलने वाले सांप्रदायिक हिंसा और घृणा के इस ज्वार को रोकने में स्वयं को असमर्थ पाने लगे। धर्मवीर भारती अंधा युग में वृद्ध भविष्यवक्ता याचक से कहलवाते हैं -


हाँ, यह दूसरा रथ
जिसकी गति को मैं तो क्या कृष्ण भी नहीं रोक पायेंगे
यह रथ है, मेरे वधिक अश्वत्थामा का/
 कौए के कटे पंख सी काली/
 रक्तरंगी घृणा है भयानक उसकी/ अदम्य


मोरपंख उससे हारेगा या जीतेगा? घृणा के उस नए कालिया नाग का दमन/ अब क्या कृष्ण कर पायेंगे?अंतत: गांधी की हत्या की तरह ही अंधा युग में भी व्याध के हाथों कृष्ण को लगे घाव के बहते खून ने अश्वत्थामा की घृणा का शमन कर उसमें पुन: आस्था जगाई। अनास्था से आस्था की ओर यह यात्रा अंधायुग की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। भारती स्वयं कहते हैं - यह कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।आस्था, विश्वासों के ध्वंस और उससे उपजी तमाम कुंठा, निराशा के बावजूद भारती मनुष्य के भविष्य के प्रति आशावादी हैं-


अंधा संशय है,
लज्जाजनक पराजय है पर एक तत्व है,
बीजरूप स्थित मन में साहस में,
 स्वतंत्रता में, नूतन सर्जन में वह है निरपेक्ष, उतरता है पर जीवन में दायित्वयुक्त,
 मर्यादित मुक्त आचरण में उतना जो अंश हमारे मन का है वह अर्धसत्य से,
ब्रमास्त्रों के भय से मानव भविष्य को हरदम रहे बचाता अंधे संशय,
 दासता, पराजय से।


आस्था का यही स्वर अंधा युग को एक सार्थक और अमर कृति बनाता है।

धर्मवीर भारती (1926-1997) अंधा युग केवल ऐसा गीति-नाट्य है, जो महाभारत जैसी ऐतिहासिक घटना और द्वित्तीय विश्वयुद्ध के समय की परिस्थितियों का तर्कसम्मत विवेचन करता है, बल्कि हमारे मौजूदा समय की परतें भी खोलता है। युद्ध के दौरान और युद्ध के बाद की अकल्पनीय त्रासदी के जरिए नीति और मानवीय गलतियों की गूंज इसमें पुरजोर ढंग से सुनाई देती है। विश्वास और आस्था के स्वरों के बीच अनास्था की स्थितियों को विवेचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है धर्मवीर भारती ने।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :--
डॉ.रेणु व्यास
चित्तौड़शहर की युवा प्रतिभा,इतिहासविद ,विचारवान लेखिका,गांधी दर्शन से जुड़ाव रखने वाली रचनाकार हैं.वे पत्र-पत्रिकाओं के साथ ही रेडियो पर प्रसारित होती रहीं हैं,उन्होंने अपना शोध 'दिनकर' के कृतित्व को लेकर पूरा किया है.
29,नीलकंठ,सैंथी,
छतरीवाली खान के पास,
चित्तौडगढ,राजस्थान 

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ये समीक्षा मूल रूप से जनवाणी ई-पपर यहाँ प्रकाशित हुई.जिसे साभार पाठक हित में छाप रहे हैं.
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