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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-1

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, सितंबर 22, 2011 | गुरुवार, सितंबर 22, 2011

 चित्रकार 
मैं तेज प्रकाश की आभा से
लौटकर छाया में पड़े कंकड़ पर जाता हूं
वह भी अंधकार में जीवित है
उसकी कठोरता साकार हुई है इस रचना में
कोमल पत्ते मकई के
जैसे इतने नाजुक कि वे गिर जाएंगे
फिर भी उन्हें कोई संभाले हुए है
कहां से धूप आती है और कहां होती है छाया
उस चित्रकार को सब कुछ पता होगा
वह उस झोपड़ी से निकलता है
और प्रवेश कर जाता है बड़े ड्राइंग रूम में
देखो इस घास की चादर को
उसने कितनी सुन्दर बनाई है
उस कीमती कालीन से भी कहीं अधिक मनमोहक।


मकान
ये अधूरे मकान लगभग पूरे होने वाले हैं
और जाड़े की सुबह में कितनी शांति है
थोड़े से लोग ही यहां काम कर रहे हैं
कई कमरे तो यूं ही बंद
खूबसूरती की झलक अभी बहुत ही कम
दिन ज्यूं.ज्यूं बढ़ते जाएंगे
काम भी पूरे होते जाएंगे।
खाली जगह से इतना बड़ा निर्माण
और चांद को भी रोशनी बिखेरने के लिए
एक और नई जगह
बच्चे खुश हैं दौड़.दौडक़र खेलते हुए
अभी उन्हें कोई रोकने.टोकने वाला नहीं
एक अच्छे भविष्य की ओर बढ़ता हुआ मकान
जैसे एक छोटी सी चीज को
बहुत अच्छी तरह से सजाया जा रहा है
हाथ की मेंहदी तो एक छोटा सा भाग होती है दुल्हन का
फिर भी इसके दरवाजे उतने ही महत्वपूर्ण
जिन पर पौधों की शाखाएं झूलने लगी हैं
कुछ आगन्तुक गुजरते हैं पास से
इसे देखते हुए
कोई सम्मोहन उन्हें रोक लेता है
सभी थोड़ी.थोड़ी झलक लेते हैं
लम्बी हो या छोटी।
सारी थकान के बाद यह एक पड़ाव है
और कोई कैसे बढ़ता है सफलता की ओर
हर पल दिखला रहा है यह निर्माण।
       



कितने जमाने से
कितने जमाने से वह
एक ही चीज बना रहा है
पहले मिट्टी को रोंदकर मुखौटे की शक्ल देता है
फिर उसका साथी उसमें रंग भरता है
सारे मुखौटों का आकार और रंग.रूप एक जैसा
एक ही तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त होती है
सभी के चेहरें सेए
सभी में एक भोली हंसी
और चेहरा जैसे बेवजह हंसता हुआ
शायद खुश आदमी इसी तरह से हंसते रहते होंगे।
आदिम जाति में कोई बनावट नहीं थीं
और अब तो चेहरे कितने बदल गए हैं
खुशियां भी लाती हैं हंसी क्षण भर  को
और इस मुर्झाती हंसी में
होता है भय किसी दूसरी परेशानी के आने का
यह हंसी जैसे बीमारी से तो बचेए लेकिन मौत से नहीं
लेकिन अब वो कलाकार
नये सांचे कहां से लाये नये आदमी की हंसी के
बड़े सस्ते हैं ये मुखौटे
दस रुपये भी कोई दे दे तो उसका एहसान हो
लगातार बनाता जा रहा है वो मुखौटे
लगातार बदलती जा रही है लोगों की हंसी
वो खुद भी शामिल है इसमें।


विज्ञापन
तरह.तरह के विज्ञापन के कपड़ों से ढका हुआ हाथी
भिक्षा नहीं मांगेगा किसी से
वो चलेगा अपनी मस्त चाल से
बतलाता हुआए शहर में ये चीजें भी मौजूद हैं
जिन्हें पहुंचाया जा सकता है
घर तक मिनटों में।
वह बढ़ता है सडक़ के दोनों ओर स्थित पेड़ों के बीच से
अपना खाना चुराता हुआ।
महावत को गर्व है
नहीं जाना पड़ेगा उसे घर.घर मांगने
भीड़ भरी सडक़ों पर करता रहेगा वह यात्राएं
और कौतूहलवश लोग उसे देखते रहेंगे
धीरे.धीरे दरें भी बढ़ती जाएंगी
और हाथी अक्सर दिखायी देते रहेंगे
जंगल छोडक़र सडक़ों पर
यह उनका अच्छा उपयोग।



खिलाड़ी
गजब सा खेल है यह
इसमें खिलाड़ी हवा में गुलाटी लगाता है
फिर सीधे पांव खड़ा हो जाता है डंडे की तरह
बेहद कठिन है यह
इसलिए लोग खड़े हैं इसे देखने
रोमांच जाग पड़ता है सबों के शरीर में
कई बार तो लगता है
वह ठीक से नहीं कर पायेगा इस खेल को
तुड़वा बैठेगा अपनी हड्डिड्ढयां
और गिर जाएगा कमर के बल टेढ़ा होकर
लेकिन सबकी इच्छा है
वह कभी गिरे नहीं
खेल उसका चलता रहे।
सांस रुक जाती है लोगों की
जब वह लगभग जमीन छूने को होता है
और जमीन छूते ही वापस शुरू कर देता है
अपने खेल को
आनंद उतर आता है दर्शकों में
सभी थोड़े.थोड़े रुपये उसे दे देते हैं
हालांकि वह किसी से कुछ नहीं मांगता
सिर्फ सारा ध्यान केंद्रित करता है खेल में।


नियंत्रण
जिन रातों में हमने उत्सव मनाये
फिर उसी रात को देखकर हम डर गए
जीवन संचारित होता है जहां से
अपार प्रफुल्लता लाते हुए
जब असंचालित हो जाता है
कच्चे अनुभवों के छोर से
ये विपत्तियां  हीं तो हैं।
कमरे के भीतर गमलों में
ढेरों फूल कभी नहीं आयेंगे
एक दिन मिट्टी ही खा जाएगी
उनकी सड़ी.गली डालियां।
बहादुर योद्धा तलवार से नहीं
अपने पराक्रम से जीतते हैं
और बिना तलवार के भी
वे उतने ही पराक्रमी हैं।
सारे नियंत्रण को ताकत चाहिए
और वो मैं ढूंढ़ता हूं अपने आप में
कहां है वोघ् कैसे उसे संचालित करूंघ्
कभी हार नहीं मानता किसी का भी जीवन
वह उसे बचाये रखने के लिए पूरे प्रयत्न करता है
और मैं अपनी ताकत के सारे स्रोत ढूंढक़र
फिर से बलिष्ठ हो जाता हूं।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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