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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-2

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, सितंबर 23, 2011 | शुक्रवार, सितंबर 23, 2011

फूल

खामोश हरियाली के बीच
पर्वतनुमा इस जगह में
एक शांत कब्र ढकी हुई फूलों से
बार.बार निगाह जाती है उन पर
लगता है चेहरा शव का हमेशा ढका रहे
केवल फूल ही फूल दिखलाई देंए
सारे दुखों को ढक लेते हैं फूल
फूल ही हैं वे जिनकी तरफ आंखें दौड़ती हैंए
इनके ही भार से हल्का हो जाता है
किसी के भी छोड़ जाने का दुख


कीड़े
जब कीड़े घुस जाएं फल में
क्षीण हो जाता है उसका मूल्य
और जो मूल्यहीन है
फेंक दिया जाता है बाजार में।
हमने देर लगा दी
नष्ट होते हुए को देखने में
नाव में कब सुराख हुआ
मालूम ही नहीं पड़ा।
अपनी चलनी को बचाकर रखना है
तभी घुलेगी आटे की मिठास जीभ पर
जख्म हुए तो पांव में वेदना की चुभन
और निहायत जरूरी है
लोहे के बक्से तक को मजबूत रखना
मधुमक्खी अपने डंक लेकर हमेशा सावधान है
सावधान है वह भीड़
जो बार.बार तालियां बजा रही
लेकिन उतने सावधान नहीं
इसे सुनने वाले लोग
कीड़े अपना स्वभाव कभी नहीं छोड़ेंगे।




नफरत
फंसने के बाद जाल में
कितना ही छटपटा ले पक्षी
उसकी परेशानी हमेशा बनी रहेगी
और उड़ान छीन लेने वाले हाथों से
प्राप्त हुआ भोजन भी स्वीकार करना होगा।
जिसने हमें जल पिलाया
भूल जाते हैं हम उसके दिए सारे क्लेश
और जो सबसे मूल्यवान क्षण हैं खुशियों के
वे हमेशा हमारे भीतर हैं
बस हमें लाना है उन्हें
कोयल की आवाज की तरह होंठों पर।
जल की शांति हमें अच्छी लगती हैए
जब बहुत सारी चीजें प्रतिबिम्बित हो जाती हैं उसमें तब
लहरें नफरत करती हुई आगे बढ़ती हैंए
किनारे पर आकर टूट जाता है उनका दम्भ।
धीरे.धीरे सब कुछ शांत
चुपचाप जलती  मोमबत्ती में
मेरे अक्षर हैं इस वक्त कितने सुरक्षित।






तुम्हारा संगीत
कितने सारे पहाड़ देख लिए मैंने
कितनी ही नदियां
और संगीत बड़े.बड़े वादकों का
फिर भी सुनता हूं जब
तुम्हारी ढोलक की थपथपाती मधुर आवाज
लगता है जैसे मैं जाग गयाए
जाग गया हो चंद्रमा
इसके दोनों छोर के हिलने से।
सिर्फ मैं नहीं सुन रहा हूं इस आवाज को
सभी सुन रहे हैं इस आवाज को
जहां तक जाती होगी यह
सभी के कान तुम्हारी तरफ
जैसे तुम उनमें एक शक्ति का संचार कर रहे हो
भर रहे हो धडक़न धीमी.धीमी
पारे के आगे बढऩे जैसी।
तुम बार.बार बजाओ
मैं निकलता जा रहा हूं दूर तुमसे
पूरी तरह ओझल
फिर भी  तुम्हारे स्वर मुझे थपथपा रहे
जाग्रत कर रहे हैं मुझे अब तक।




मुलाकात के बाद
जब मैं चीजों को समझता हूं
वे कभी सुव्यवस्थित दिखाई नहीं देतीं
सभी में रुखड़ापन उजागर होने लगता है
एक दिन सब कुछ सही हो जायेगाए
उम्मीद छोड़ देता हूं इसकी।
मैं अब किसी से भी मिलकर
उतनी संतुष्टि से विदा नहीं हो सकता
कुछ न कुछ छूट ही जाएगा कहना
एक बार में खेतए खोद नहीं डालते हल
हर बीज को खुली मिट्टी और हवा चाहिए
मैं इसी तरह से खुलता हूं
फिर ढक लेता हूं अपने आपको
इस तरह से धीरे.धीरे वृहद हो जाता हूं मैं
मैं यहां मौजूद हूं और सबको प्यार बांटता हूं
इस तरह से मेरा हृदय हमेशा सक्रिय रहता है
हमारी इस मुलाकात के बाद थोड़े से हम स्थिर हुए
थोड़े से हम बदल गए।


हाथ
सभी संसर्ग जुड़ नहीं पाते
अगर ऐसा हो तो फिर ये अंगुलियां
अपना काम कैसे करेंगी।
मैं कभी.कभी मोहित हो जाता हूं
आटा गूंधने की कला पर
जब सब कुछ एक साथ हो जाता है
जैसे सब कुछ एक में मिल गया हो
लेकिन आग उन्हें फिर से अलग करती है
हर रोटी का अपना स्वरूप
प्रत्येक के लिए अलग.अलग स्वाद।
मैं अजनबी नहीं हूं किसी से
जिससे थोड़ी सी बात की वे मित्र हो गए
और मित्रता अपने आप खींच लेती है सबों को
दो हाथ टकराते हैं जीत के बाद
दोनों का अपना बल
और सब कुछ खुशी में परिवर्तित हो जाता है


काम
हम नौकरी में हो या व्यवसाय में
काम बंधे हुए हैं निश्चित दायरे में
उसी के अनुसार हमें काम करना और व्यस्त रहना है
सभी पर स्पद्र्धा का बोझ इतना भारी
कि हम चुपचाप बैठे नहीं सकते
चुपचाप बैठे तो
साथ काम करने वाले बैठने नहीं देंगे
क्योंकि हमारी गति से उनकी गति बढ़ती है।
इतने सारे कामों की श्रृंखला में बंधे रहने के बाद
बहुत कम समय बचता है व्यक्तिगत का
अब नयी.नयी तरकीबें और उन्नत किस्म के व्यवसायिक सृजन ही
बन गए हैं मन बहलाने के साधन
एक अनुशासन कठोरता का हमेशा हमें घेरे हुए
साधारण किस्म के आराम की गुंजाइश इसमें बहुत कम है।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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