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डॉ. नरेश अग्रवाल की कवितायेँ-3

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, सितंबर 24, 2011 | शनिवार, सितंबर 24, 2011


चित्र
चित्र से उठते हैं तरह.तरह के रंग
लाल.पीले.नीले.हरे
आकर खो जाते हैं हमारी आंखों में
फिर भी चित्रों से खत्म नहीं होता
कभी भी कोई रंग।
रंग अलग.अलग तरह के
कभी अपने हल्के स्पर्श से तो कभी गाढ़े स्पर्श से
चिपके रहते हैंए
चित्र में स्थित प्रकृति और जनजीवन से।
सभी चाहते हैं गाढ़े रंग अपने लिए
लेकिन चित्रकार चाहता है
मिले उन्हें रंग
उनके व्यक्तित्व के अनुसार हीए
जो उघाड़े उनका जीवन सघनता में।
अक्सर यादें रह जाती हैं अच्छी कलाकृतियों की
रंग तक भी याद आते रहते हैं
लेकिन जो अंगुलियां गुजर गयी हजारों बार
इन पर ब्रश घुमाते हुए
कितना मुश्किल है समझ पाना
कौन सी भाषा में वे लिख गयी
और सचमुच क्या कहना चाहती हैं वे।



एक दुर्घटना के बाद
अनाज के दाने निकाल लेने के बाद
हल्की हो जाती हैं फसलें
बचा.खुचा मवेशियों के लिए या आग तपने के लिएए
सूरज के डूब जाने के बाद
नष्ट हो जाता है रंग किसी भी भूखंड के
तापमान गिरा और कठिन हो गयी सर्दभरी रात।
इस रात की तहस.नहस भरी जिन्दगी में
कहां पर ठौर मिल सकती हैए
मालूम नहीं है उन्हें
वे अकेले नहीं हैंए वे बहुत सारे लोग हैं एक साथ
जो अभी.अभी यहां पहुंचे हैं
उन्हें न तालाब की चिन्ता है न ही पेड़ देखने का मनए
सब की एक ही चिंता है
कि अगर उनकी खुशियां बचेंगी भी तो
न जाने वे किसी तरह की होंगी।



युद्ध
फुर्तीले शरीर और शानदार घोड़े
दिशाओं में सिहरन पैदा करते हुए
एक इशारे से जंग की ओर दौड़ते हुए
और बिल्कुल साफ.सुथरी वेशभूषा लड़ाकों की
सभी की एक जैसीए वातावरण में प्राण फूंकती हुई
सभी एक जैसे कि एक गिरे तो
दूसरा ठीक उसी तरह से उठ खड़ा हो
वे दौड़ते हैं जैसे कोई भयानक आग को रोकने को
सभी तरफ आग ही आग
और यह शरीर से निकलती युद्ध की आग
प्राण ले लेती है अपनों के ही
युद्ध खत्म होने पर बच जाते हैं सिर्फ अवशेषए
थके हुए घोड़े और रोष से पीडि़त वेशभूषा वाले लोग
किसी में कोई चमक नहीं अब
अब आंखें उन्हें देखने से भी कतराती हैं।


भविष्य के लिए
एक परिवर्तन की चाह जैसे डालियां अधिक प्रौढ़ हो गयी हों
वह धीरे से सर झुकाता फिर उठा लेता था
जैसे अभी बहुत अधिक भार ले सकता है
वह एक नयी दिशा तलाशने लगा था
जहां रुचिकर काम और अच्छी तनख्वाह होए
इतने अधिक सुदृढ़ आधार वाला काम
कि कम से कम पांच वर्षों तक दूसरी ओर झांकना न पड़े
अपने लिए अत्यधिक चिंता कर रहा था वो
कल बच्चे होंगे और परिवार बूढ़ा हो चला होगा
अभी एक शक्ति है कि किसी भी काम को वो सीख ले
नये काम को भी पुराने की तरह कर सकता है वो
इस बार जो काम मिलेगा उसे
उसी पर भविष्य का आधार होगा
पुरानी जगह बस समय कटता रहा
सिर्फ लोभ था अत्यधिक अनुभव पाने का
अब लोभ है अपना भविष्य संवारने का।


इच्छाएं
जब इच्छाएं छोटी.छोटी हों
कितना आसान हो जाता है उन्हें पूरा करना
मैं जल्दी ही उन्हें छू सकता  हूं
इसलिए अत्यधिक उत्साह है मुझमें
दूरी इतनी कम है कि निराश नहीं हो सकते हम
मेरी घड़ी को कितना कम चलना पड़ेगा
पैरों को विश्राम की जरूरत नहीं
दिनों को अंगुलियों पर गिन सकता हूं
एक घूंट में सब कुछ पी गए
और तृप्ति ठीक हमारे सामने है।


शब्द
सभी के साथ सलाह मशविरा
कितनों का ही अनुभव सर आंखों पर
खून तक में उतर आता है एक अच्छी पुस्तक के प्रति प्यार
छोटे.छोटे बच्चे तक
प्यार करते हैं नयी.नयी किताबों को
वे जिल्द चढ़ाकर रखते हैं सुरक्षित सभी को
इनमें लिखी एक.एक चीज का महत्व
और उत्तर ही उत्तर मांगते हैं हर पाठ।
जो कम पढ़े. लिखे हैं
उनकी दुनिया में थोड़े से शब्द हैं
फिर भी जीवन यापन तो हो ही जाता है
मैं भी लिखता हूं हर दिन थोड़े से शब्द
जो हैं मेरी आत्मा से निकले हुए
दूसरों से आत्मीय होने के लिए
वे ढूंढ़ते हैं लोगों के बीच उनके फुर्सत के क्षण।


एक बात
जागने वालों के लिए एक पुकार ही काफी है
सोने वालों के लिए सहारा किसी कुर्सी का भी
एक ही इशारा चुप रहने के लिए
एक ही इशारा बोलने के लिए
हम कभी कितने अपने लगते हैंए दूसरों को
और कभी कितने पराये
और यह कितनी सुन्दर बात है.
कितने ही तीखे स्वाद से झल्लायें हम
लेकिन दोष अपनी जीभ पर कभी मढ़ा नहीं हमने।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


नरेश अग्रवाल

वर्तमान में जमशेदपुर में रहते हुए 
राजस्थानी पर आधारित पत्रिका 'मरुधर' का सम्पादन
 कर रहे हैं. कविता करते हुए एक लेखक 
के रूप में भलीभांति पहचाने जाते हैं.-
उनसे संपर्क हेतु 
पता:-9334825981,
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